27 Feb, 2007

जवाब : टैग-वार्ता के

ईपण्डित जी ने अपने चिट्ठे पर मुझे टैग कर पाँच यक्ष-प्रश्न पूछे हैं, जिनका सरल, सपाट, जवाब देने का प्रयास कर रहा हूँ।

१. कम्प्यूटर पर हिन्दी टाइपिंग के बारे में सबसे पहले आपने कब सुना और कैसे, अपने कम्प्यूटर में हिन्दी में सबसे पहले किस सॉफ्टवेयर में/द्वारा टाइप किया और कब, आपको उसके बारे में पता कैसे चला ?

उत्तर : सर्वप्रथम 1986 में Apple Machintos कम्प्यूर में हिन्दी डी.टी.पी. में सहयोग करना पड़ा था। 1990 में। जब हमारे कार्यालय में पी.सी. (XT), स्थापित हुए, उस काल में रैम सिर्फ 640K, हार्ड डिस्क सिर्फ 20 MB की आती थी। इस सीमित रिसोर्सेस में जटिल भारतीय भाषाओं/लिपियों का संसाधन सम्भव न था। अतः कानपुर आई.आई.टी. तथा सी-डैक द्वारा विशेष हार्डवेयर (GIST) कार्ड विकसित किया गया था, जिसके रोम-चिप्स में भारतीय भाषाओं के फोंट्स तथा प्रोग्रामों को सज्जित किया गया था। 1986 में भारत सरकार द्वारा सभी कम्प्यूटर प्रणालियाँ द्विभाषी (हिन्दी-अंग्रेजी) ही लगाने के आदेश जारी हो चुके थे। जिसके अनुपालन में 1991 में एक कम्प्यूटर में सी-डैक का हार्डवेयर GIST कार्ड लगाया गया था, जो डैटाबेस को PC-ISCII कूटों में तथा भारतीय भाषाओं के पाठ (Text) ISCII-1991 कूटों में संसाधित करता था।

इस पर सिर्फ INSCRIPT कुँजीपटल में ही काम हो पाता था। पहले से हिन्दी टाइपराइटर में अच्छी गति से टाइप का अभ्यस्त होने के कारण अत्यन्त कष्टकर अनुभव हुआ। हिन्दी टाइपराइटर कुञ्जीपटल को भूलने में काफी परिश्रम करना पड़ा। लगभग दो वर्ष लग गए।

२. आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में आगमन कैसे हुआ, इसके बारे में कैसे पता लगा, पहला हिन्दी चिट्ठा/पोस्ट कौन सा पढ़ा/पढ़ी ? अपना चिट्ठा शुरु करने की कैसे सूझी ?

उत्तर : हिन्दी चिट्ठे पिछले दो वर्षों से देखता/पढ़ता आया था। पहला चिट्ठा किसे कहूँ... किसे नहीं... याद नहीं कर पाता। लेखन का नशा तो बचपन से था। पत्र-पत्रिकाओं प्रकाशित कुछ शोध लेखों की प्रतियों की भारी मांग होती थी। अतः प्रतियाँ भेजने के झण्झट से बचने के लिए अपने कुछ उपयोगी लेख किसी वेबसाइट पर डालने की सोची। पहले याहू के जियोसिटिज में प्रयास किया, किन्तु सफलता न मिली, याहू में हिन्दी ई-मेल के बिगड़ने तथा बारम्बार view->encoding->Unicode/utf8 पर क्लिक करने से से तंग आकर जब जी-मेल में खाता खोला अनुनाद जी के निमन्त्रण पर तो अपना ब्लॉग बनाने का खुल-जा सिम-सिम हुआ। इसके पहले 'हिन्दी देवलोक' नाम ब्लॉग बनाया था old blogger से, id खो जाने के कारण फिर पहुँच नहीं पाया।


३. चिट्ठा लिखना सिर्फ छपास पीडा शांत करना है क्या ? आप अपने सुख के लिये लिखते हैं कि दूसरों के (दुख के लिये ;-) क्या इससे आप के व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन या निखार आया ? टिप्पणी का आपके जीवन में क्या और कितना महत्त्व है?

उत्तर : जिन्दगी में कुछ ठोकरें खाने के तो कुछ गाय की पूँछ पकड़कर आराम से लक्ष्य पर पहुँचने के जो अनुभव हुए हैं, उन्हें दूसरों को बाँट देना चाहता हूँ, ताकि दूसरे लोगों को वैसी ठोकरें न खानी पड़े और वे भी लक्ष्य तक आराम से पहुँच सकें।

टिप्पणियाँ ब्लाग में वैसी ही लगती हैं = जैसे कवि-सम्मलेन में आपकी कविता सुनकर स्रोताओं की तालियाँ

४. अपने जीवन की कोई उल्लेखनीय, खुशनुमा या धमाकेदार घटना(एं) बताएं, यदि न सूझे तो बचपन की कोई खास बात जो याद हो बता दें।

एक बार एक पहाड़ी पर एक पूर्णिमा की शाम को एक और सूर्यास्त हो रहा था, दूसरी ओर चन्द्रोदय। योग और ध्यान में मग्न था कुछ बन्धुओं के साथ... कुछ मिनटों तक सूर्य और चन्द्रमा दोनों ही बिल्कुल एक समान, एक जैसे दिखाई दिए... दिशाभ्रम-सा हो गया... अन्तर ही नहीं कर पाया कोई कि कौन-सा चाँद है और कौन-सा सूरज? दोनों की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से मन-मस्तिष्क के तरल-तन्त्रिका-तत्वों के सरिता-सागर में इतना बड़ा, इतना विशाल ज्वार आया..., आनन्दातिरेक छाया..., मन मस्ताया..., कुण्डलिनी जाग उठी.... सह्स्र-दल-कमल खिलने लगा... ... ...

बस... शब्दों में कैसे?... आप स्वयं अनुभव की परिकल्पना कर सकते हैं...

५. यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे?

उत्तर : हिन्दी समग्र विश्व-ब्रह्माण्ड की मौलिक भाषा हो..., समस्त कम्प्टूर प्रोग्रामिंग सिर्फ हिन्दी में हो.


अब मेरे कुछ प्रश्न हैं जिनका उत्तर अपेक्षित है सभी हिन्दी के विद्वानों से-- (अभी हिन्दी ब्लागिंग गुरुओं से सम्पर्क स्थापित कर रहा हूँ, जिन्हें टैग बाद में करूँगा।)

1. हिन्दी(देवनागरी) में कुल कितने अक्षर हैं? (सन्दर्भ: इस परिचर्चा में देखें।)

2. देवनागरी संगणन की दृष्टि के जटिल complex script में क्यों रखी गई हैं?

3. हिन्दी(देवनागरी) को अंग्रेजी से भी सरल बनाने के लिए क्या सुझाव देना चाहेंगे आप?

4. आपका सपने में किसे देखना पसन्द करेंगे?

5. अंग्रेजों ने भारतीय जनता पर अंग्रेजी थोपने के पहले क्या किया था?

24 Feb, 2007

कम्प्यूटर स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग? - व्यंग्य

कार्यालय में नया कम्प्यूटर आया तो अनुभाग प्रमुख श्री दिनेश अग्रवाल को अंग्रेजी स्टेनो सुश्री डी॰ शान्ता ने आकर सूचना दी--

शान्ता: "सर! नई कम्प्यूटर आई है"।

दिनेश : "नया कम्प्यूटर आया है" बोलो, "आई है" नहीं।

शान्ता: "क्यों? इसमें क्या गलती है?"

दिनेश: "कम्प्यूटर" पुल्लिंग है, इसलिए आया है कहा जाएगा।"

शान्ता: "नहीं जी, यह तो एक मशीन है, इसलिए कम्प्यूटर स्त्रीलिंग होगी, "मशीन चलती है" कहते हैं, चलता है नहीं।"

दोनों आपस में झगड़ने लगे। दोनों के झगड़े का कोई भी तर्कपूर्ण समाधान नहीं कर पाया। कार्यालय प्रमुख के बाद यह बात मंत्रालय, और अन्ततः मन्त्री महोदय श्रीमान लालू जी के पास पहुँची सही निर्णय के लिए।

लालू ने पूछा- : "अच्छा! ई कम्प्यूटर है कहाँ, पहले हमें दिखाओ तो।"

लोग उन्हें टेबल पर रखे कम्प्यूटर के पास ले गए। देखकर लालू जी कहा--

लालू : "अरे! इस पर तो कवर ढँका हुआ है, इसे उतार कर सबलोग खुद ही देख लो ना!"

22 Feb, 2007

एड्स से बचाती हैं या बढ़ाती है- डिस्पोजेबल सीरिंज?

संयुक्त राष्ट्र एड्स विरोधी अभियान के हिन्दी जालपृष्ठ पर एड्स से बचने के लिए जीवाणुहीन की गई सूई (injection) का प्रयोग करने की सलाई दी गई है। आजकल तो हरेक डॉक्टर या कम्पाउण्डर जब सूई के माध्यम से दवा को शरीर में प्रवेश कराते हैं, तो प्रयोज्य सूई (डिस्पोजेबल सीरिंज) का ही उपयोग करते हैं, जिसकी नली प्लास्टिक की बनी होती है तथा इसके मुहाने पर पतली सूई जंगरोधी इस्पात (स्टेनलेस स्टील) की बनी होती है। बारम्बार उपयोग की जा सकनेवाली काँच की सींरिज अब पुराने जमाने की बात हो गई है। किसी पुराने ग्रामीण अस्पताल में ही शायद देखने को मिले।

इस सूई का दुबारा उपयोग नहीं किया जाता। एक व्यक्ति को लगाने के बाद यह सूई तोड़कर फेंक दी जाती है। इससे किसी एक व्यक्ति के खून में यदि कोई विषाणु हों तो वह दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता। यही इसका लक्ष्य है?

किन्तु प्रश्न उठता है कि क्या यह अपने लक्ष्य में सफल हुई है या असफल? यदि सफल हुई है तो दिनों दिन एड्स आदि महामारियाँ बढ़ती क्यों जा रही है? एड्स से पीड़ित रोगी तो फिर भी कुछ दिन, कुछ माह या कुछ वर्ष तक जी सकता है। किन्तु इससे भी भयंकर और शीघ्र जानलेवा सार्स, चिकनगुनिया, डेंगू आदि बीमारियाँ भी दिनोंदिन क्यों फैलती जा रही हैं?

वास्तविकता क्या है?

प्रत्यक्ष रूप से देखें तो कूड़ेदान में फेंक दी गई इन (use and throw) सीरिंज को पूरी तरह नष्ट नहीं किया जा सकता। वैसे भी विज्ञान के नियम के अनुसार कोई वस्तु कभी नष्ट नहीं होती, सिर्फ उसका रूप ही परिवर्तित होता है।

इन सीरिंजों का भी पुनःचक्रण(recycling) हो जाता है। कूड़ेदान से नगरपालिका के कचरे के डिब्बे में और वहाँ से बड़े-बड़े कूड़े के भण्डारों में फेंक दिया जाता है। किसी कूड़ेखाने के पास दिखाई देता है कि कचरे में से वस्तुएँ चुन-चुन कर उठानेवाले गरीब लोगों की भीड़ लगी रहती है। जो प्लास्टिक तथा अन्य वस्तुएँ चुनकर कबाड़ियों को बेचकर कुछ रोजी-रोटी कमा लेते हैं।

कबाड़ियों के भण्डार से प्लास्टिक, लोहा, काँच, कागज आदि वस्तुएँ विभिन्न कारखानों में पहुँच जाती है, जहाँ उनका पुनःचक्रण (re-cycling) किया जाता है। लोहा आदि धातुओं को तो फिर से उच्च ताप (लगभग 200 से 600 डिग्री सेंटीग्रेड) पिघलाकर पुनरुपयोग किया जाता है। जिससे इनमें विषाणु के रहने के मौके नगण्य ही होते हैं।

लेकिन प्लास्टिक-कूड़े को अल्प ताप (लगभग 45 डिग्री से 75 डिग्री सेंटीग्रेड तक) में ही पिघलाकर पुनरुपयोगी बनाया जाता है। जिसमें विषाणुओं के रहने का खतरा भरपूर रहता है। क्योंकि इससे अधिक ताप पर प्लास्टिक जल जाता है। जलकर प्लास्टिक भयंकर विषैली गैसों में बदलता है, जो वातावरण के लिए अत्यन्त हानिकारक होती हैं।

प्लास्टिक-कचरा तो बहुत ही टिकाऊ वस्तु है। प्लास्टिक बहुकाल तक नष्ट नहीं होती है और शहरों-गाँवों-पर्यटन स्थलों यहाँ तक की हिमालय में भी यत्र-तत्र-सर्वत्र प्लास्टिक-कचरा फैला पाया जाता है। प्लास्टिक का पुनरुपयोग (recycling) ही इससे निपटने का एकमात्र उपाय है।

अल्प ताप पर पिघलाकर रिसाइकल किया हुआ प्लास्टिक विषाणुओं से कदापि मुक्त नहीं हो पाता। प्लास्टिक के धारकों में खाद्य पदार्थ तो आम बात है, प्लास्टिक से निर्मित थैलियों, बर्तनों, कंटेनरों, बोतलों में औषधियाँ तक पैकिंग करके आपूर्ति की जाती है, यहाँ तक कि खून की बोतलें/पाउच भी प्लास्टिक के बने होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा जारी नियमों के अनुसार यह प्लास्टिक मेडिकली रूप से जीवाणुरहित किया गया आई॰एस॰ओ॰/आई॰एस॰आई॰ छाप का होने का दावा किया जाता है। किन्तु चूक हर कहीं होती है। अनेक मामलों में अधिकांश आपूर्तकों द्वारा इनमें प्रयोग किया जानेवाला प्लास्टिक भी पुनःचक्रित (recycled) प्लास्टिक होता है।

हाल ही में एड्स की रोकथाम के सम्बन्ध में आयोजित एक सम्मेलन में यह प्रश्न उठाया गया था। बुद्धिजीवियों ने हरेक खाद्य पदार्थ, औषधि या चिकित्सकीय कल-पुर्जों में प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगाने मांग की।

प्लास्टिक के उपयोग का हर कहीं विरोध हो रहा है। किन्तु यही एकमात्र सस्ता और सुलभ साधन है- मुख्यतः पैकिंग आदि का। अतः इसके उपयोग को बन्द करना सम्भव नहीं हो पा रहा है। इसके कुछ विकल्प आविष्कृत तो हुए हैं, किन्तु व्यावसायिक रूप से सम्भाव्य और सफल नहीं हो पाए हैं।

अतः यहाँ इस सन्दर्भ में विशेषकर डिस्पोजेबल इंजेक्शन सीरिंज में प्लास्टिक के उपयोग को वर्जित किया जाना नितान्त आवश्यक है। इसके विकल्पों पर अनेक चर्चाएँ चलीं।

इस सम्बन्ध में कुछ ठोस तथ्य निम्नवत् हैं--

आजकल आधुनिक सभ्यता के अनुयायी शिक्षित नागरिकों में देखा जाता है कि वे अपने बच्चों के नाक या कान में छेद करवाने डॉक्टरों के पास ले जाते हैं, जो मेडिकली सुव्यवस्थित तरीके से जीवाणु रहित सूई से नाक-कान में छेद करते हैं और प्रोलीन का तार बाँध देते हैं, जो एण्टीसेप्टिक होता है। फिर भी देखा जाता है कि इसे निकालने के कुछ दिन बात नाक-कान के छिद्र में संदूषण (infection) हो जाता है या नाक-कान के छिद्र के घाव पक कर काफी तकलीफ पहुँचाते हैं।

दूसरी ओर प्राचीन परम्पराओं का अनुसरण करनेवाले नागरिक अपने बच्चे को सुनार के पास ले जाकर नाक-कान बिँधवाते हैं। सुनार शुद्ध सोने (लगभग 24 कैरेट) का तार अति गर्म करके ठण्डा करता है और उष्म तार की नोंक से नाक-कान में छेद करके उसी तार को मोडकर तत्काल रिंग जैसा बनाकर नाक या कान में पहना देता है। ऐसे छिद्रित किया नाक-कान संदूषित (infected) होकर कभी नहीं पकता, शायद ही इसके अपवाद स्वरूप एकाध उदाहरण सामने आए हों।

विज्ञान-सम्मत विचार है कि सोना(Gold) सर्वोधिक संदूषण-रोधी (anti-septic) धातु है। दूसरा नम्बर चाँदी(Silver) का आता है। तीसरा नम्बर ताम्बे(Copper) का आता है। आजकल भी कई कम्पनियों के महंगे विभिन्न जलशोधन यन्त्रों (water-filters) में चाँदी का उपयोग किया जाता है। राजा-महाराजा सोने-चाँदी के बर्तनों में भोजन करते थे। कई घरों में देखा जाता है कि वे पीने के पानी के घड़ों में तथा जलशोधकों (water-filters) में सोने या चाँदी तथा ताम्बे के चम्मच या छोटे टुकड़े डालकर रखते हैं। ताकि पानी शुद्ध रहे और उसका स्वाद भी अच्छा महसूस हो और शक्तिवर्द्धक खनिज लवण युक्त हो। इसके विपरीत लोहा सर्वाधिक संदूषण-प्रभावी होता है। वास्तु, फेंगसूई, प्राकृतिक चिकित्सा के नियमों के अनुसार आजकल अनेक सम्पन्न लोग ताम्बे के जग में रखा हुआ पानी चाँदी के गिलास से पीते दिखाई देते हैं। स्टेनलेस स्टील भले ही जंगरोधी हो किन्तु संदूषण-रोधी नहीं।

अधुनातम प्रयोगों में प्लाटिनम् धातु को सर्वाधिक महंगा, मजबूत, टिकाऊ और संदूषण-रोधी माना जाता है। दाढ़ी व बाल काटनेवाली महंगी ब्लेड प्लाटिनम के लेप-युक्त (platinum coated) आती हैं। जो सामान्य ब्लेड की तुलना में अनेक दिनों तक प्रयोग की जा सकती है।

अतः हमारा विनम्र विचार है कि चिकित्सा के क्षेत्र में प्रयोग की जानेवाली सूई (injection syringe) प्लाटिनम् लेपयुक्त शुद्ध सोने (24 कैरेट) की तथा इसकी नली शुद्ध चाँदी की होनी चाहिए, ताकि प्राकृतिक रूप से संदूषण-रोधी हो। सामान्य आग में इसे सामान्य गर्म करके या विभिन्न एण्टी-सेप्टिक औषधियों/रसायनों (chemicals) से धोकर जिसे पूर्ण शुद्ध बनाकर फिर से उपयोग किया जा सके। वैसे भी कोई सोने-चाँदी को कदापि फेंकेगा तो नहीं।

डिस्पोजेबल, प्रयोग करो और फेंको (use and throw) के विचार को जड़ से ही मिटाना आवश्यक है, हर ऐसी वस्तु चाहे वह लिखनेवाली पेन, डॉन पेन की रिफिल्ल ही क्यों न हो। क्योंकि ये हमारी प्यारी पृथ्वी पर सिर्फ कूड़े-करकट के ढेर ही बढ़ाती हैं।

समस्त बुद्धिजीवियों, चिकित्सकों, विश्व स्वास्थ्य संगठन और सभी सम्बन्धित महानुभावों का ध्यानाकर्षण करते हुए अनुरोध है कि यदि संसार भर में बढ़ते जा रहे रोगों को वास्तव में रोकना चाहते हैं तो प्लास्टिक की बनी डिस्पोजेबल सीरिंजों के उपयोग पर तत्काल प्रतिबन्ध लगाया जाए, तथा शुद्ध सोने-चाँदी से निर्मित इंजेक्शन सीरिंज को प्रचलित करने की व्यावहारिकता, व्यावसायिक सम्भाव्यता और कार्यकारिता की ओर खुले दिमाग से विचार करके निर्णय लेकर यथाशीघ्र आदेश जारी किए जाएँ।

21 Feb, 2007

एड्स की प्राकृतिक चिकित्सा

संयुक्त राष्ट्र एड्स रोकथाम अभियान का हिन्दी वेबपन्‍ना देखा। हिन्दी में इस बारे में जानकारियाँ पाकर भारतीय जनता अवश्य ही लाभान्वित होगी। महामारी एड्स अभी तक लाइलाज है और दिनों दिन अधिकाधिक लोगों में फैलती जा रही है। जन्मजात बच्चे भी इससे बचे नहीं रह सकते।

एड्स की रोकथाम हेतु विभिन्न अभियान फिलहाल इससे बचने की जानकारियों प्रदान करने तक सीमित हैं। हजारों अनुसन्धान अवश्य चल रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई सही इलाज या उपचार या टीका सफलता के साथ घोषित नहीं हो पाया है।

किसी समस्या के समाधान या निवारण के पूर्व उसके कारण जानना आवश्यक हैं। अतः देखें कि एड्स के कारण क्या है?

एड्स का कारण है- मानवीय रोग-प्रतिरक्षा न्यूनता विषाणु (Human Immuno deficiency Virus)

जैसा कि इसके नाम के प्रथम शब्द "मानवीय... (Human)" से ही स्पष्ट है- यह सिर्फ मनुष्यों पर ही आक्रमण करता है। किसी अन्य पशु-पक्षी, कीट-पतंग, मच्छर आदि पर प्रभाव नहीं डाल पाता। आखिर क्यों? इसका क्या कारण है--

देखा जाता है कि पशु-पक्षीगण प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं। पशु-पक्षी अपनी संगम-ऋतु (Mating season) में ही समागम करते दिखाई देते हैं।

कोयल बसन्त ऋतु में ही मधुर स्वर में कूकती है - अपने साथी को पुकारने हेतु।

कुत्ते-बिल्लियाँ भी अपनी ऋतु में ही संगम करते दिखाई देते हैं। कहते हैं कि शेर तो वर्ष में सिर्फ एक ही बार संगम करता है। सुना है कि मोर की तो अत्यन्त पावन रूप से प्रजनन क्रिया होती है। मच्छर आदि कीट का प्रजनन भी विशेष ऋतु में ही अधिक तीव्रता से बढ़ता दिखाई देता है।

किन्तु इसके विपरीत आजकल अधिकांश मानव न तो पूर्णिमा, अमावस्या, एकादशी आदि तिथियों, वृहस्पतिवार जैसे वार, रामनवमी, जन्माष्टमी, गोपाष्टमी, दीपावली आदि पावन उत्सवों के अवसरों पर संयम आदि का कोई धार्मिक नियम का पालन करते हैं, न ही संगम के पूर्व शास्त्रों की विधि अनुसार स्नान या शुद्धता को व्यवहार में लाते हैं। प्राकृतिक रूप से ऋतु विशेष में ही संगम के नियम का अनुपालन तो बहुत दूर की बात है।

आगे के शब्दों "रोग-प्रतिरक्षा न्यूनता (Immuno deficiency)" से स्पष्ट है कि मानव की स्वाभाविक रोग-प्रतिरक्षा क्षमता में कमी होना ही एड्स का कारण है। अतः यदि किसी प्रकार मानव की रोग-प्रतिरक्षा क्षमता को बढ़ाया जा सके तो एड्स को काफी हद तक निष्प्रभावी किया जा सकता है।

प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार यहाँ कुछ प्रभावी उपाय दिए जा रहे हैं, जो सरल एवं काफी हद तक कारगर पाए गए हैं।

(1) संयम पालन

सर्वप्रथम आवश्यकता है कि मन को यथासंभव संयमित रखने, मन को आध्यात्मिक चिन्तन में लगाए रखने, सकारात्मक निश्चयात्मक सोच में व्यस्त रखने और शरीर के सबसे मूल्यवान शक्ति-तत्व (वीर्य) को और बेकार नष्ट करने से बचे रहने की। प्रकृति के नियमों का पालन करना इस सन्दर्भ में सर्वाधिक उपयोगी होता है।

(2) अंकुरित अन्न का प्रयोग :

प्राकृतिक चिकित्सा के मूल सिद्धान्त में प्रमुख है प्राकृतिक आहार। यथासंभव प्राकृतिक रूप में ही शुद्ध शाकाहारी आहार लिया जाना चाहिए। जैसे- पके हुए ताजा फल, बिना उबाले गए, या पीसे गए अन्न आदि।

आजकल लोग अधिकांशतः अप्राकृतिक या कृत्रिम आहार लेते हैं। डिब्बा-बन्द, प्लास्टिक की थैलियों में बन्द फास्ट फूड आदि आजकल बच्चों-बच्चों में लोकप्रिय हो गए हैं। जो मानव शरीर को ही नहीं, व्यवहार को भी कृत्रिम बना गए हैं।

उदाहरण के लिए किसी अन्न को लीजिए- मूँग या गेहूँ के दाने? इन्हें यदि हम तोड़ दें, पीस दें या उबाल दें। फिर जमीन में बोयें तो क्या उनके अंकुर निकलेंगे? नहीं। क्यों? क्योंकि ये मर चुके होंगे। इनका प्राणतत्व निकल चुका होगा। इसप्रकार देखें तो मानव का आजकल अधिकांश आहार पकाया गया, पीसा गया, तला गया होता है। अर्थात् मृत आहार, जिसमें जीवनी शक्ति नहीं होती।

इसके विपरीत अंकुरित अन्न में प्रबल जीवनी शक्ति होती है तथा कई प्रकार के विशेष विटामिन तथा तत्व पाए जाते हैं। कहा गया है कि यदि प्रतिदिन भलीभाँति चबाकर अंकुरित अन्न खाया जाए तो नपुंसक भी बलवान बन जाता है, नेत्रज्योति वापस आ सकती है, चश्मा छूट सकता है।

अंकुरित अन्न (मूँग, चना, गेहूँ, सोयाबीन आदि) को कम से कम 12 घण्टे सादे पानी में भिगाने के बाद किसी कपड़े में बाँध कर लटका दिया जाता है। अगले दिन उसमें अंकुर निकल आते हैं। इस अंकुरित अन्न में स्वाद अनुसार अल्प नमक, चीनी या नीम्बू का रस मिलाकर धीरे धीरे भली भाँति चबाकर खाना चाहिए।

(3) सोया दुग्ध-कल्प

सोयाबीन में प्रचुर परिमाण में प्रोटीन तथा रोग-निरोधक तत्व पाए जाते हैं। सोयाबीन का दूध बनाकर इसे लेने पर रोग-निरोधक शक्ति काफी परिमाण में बढ़ती पाई गई है।

विधि:

सोयाबीन के बीजों को कम से कम 24 घण्टे तक पानी में भिगो दें। फिर ग्राईँडर में डालकर या सिल-बट्टे पर एकदम महीन पीस लें। इसमें उचित मात्रा में पानी मिलाकर साफ कपड़े से छान लें। यह तरल द्रव बिल्कुल दूध जैसा होगा। इसे उबाल कर स्वाद अनुसार चीनी मिलाकर हल्का गर्म-गर्म पीया जाता है। किन्तु पीने का तरीका अत्यन्त धीमा होना चाहिए। बिल्कुल धीरे धीरे चुस्की ले-लेकर। एक पाव दूध पीने में आधे घण्टे से कम समय न लगे जैसे। पूरी तरह मुँह की लार के साथ मिलकर पूर्व-पाचित रूप में पेट में जाना चाहिए।

सामान्य दुग्ध-कल्प में देशी गाय का दूध लिया जाता है। इसके प्रयोग से (प्रतिदिन 2 लीटर से 3 लीटर दूध तक) अत्यन्त दुर्बल एवं पतले व्यक्ति का भी 15-20 दिनों में ही वजन 5 से 10 किलो तक बढ़ता देखा गया है। एड्स की रोकथाम हेतु रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए सोयाबीन का दूध अधिक प्रभावी होगा।

(4) भाप स्नान, धूप-स्नान आदि

भाप का स्नान कराकर पसीने के माध्यम से रोगी के शरीर से विषैले तत्वों को पर्याप्त मात्रा में बाहर निकालने पर उसकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता स्वतः बढ़ती है। धूप-स्नान में रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए बारी बारी से लाल एवं हरे रंग के पारदर्शी (सैलोफैन पेपर आदि के) परदे के नीचे रोगी को लिटाकर सेंक देने से काफी लाभप्रद परिणाम मिलते हैं।

(5) प्राणायाम, योगासन एवं मुद्राएँ :

हालांकि यह प्राकृतिक चिकत्सा के सामान्य क्षेत्र से बाहर की बात होगी, किन्तु कुछ सरल एवं व्यावहारिक प्राणायाम, योगासन और योगमुद्राओं से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता निश्चित रूप से काफी हद तक बढ़ने के अनेक प्रमाण मिले हैं। इनका विवरण अलग लेख में दिया जाएगा।

उपर्युक्त कुछ उपायों से भले ही एड्स पूरी तरह दूर न हो पाए, किन्तु निश्चित रूप से शरीर की रोग-निरोधक क्षमता अवश्य ही बढ़ेगी, मा.रो.न्यू.वि.(HIV) के प्रकोप में कमी आएगी और रोगों का मुकाबला करते हुए अधिक काल तक जीया जा सकेगा।

16 Feb, 2007

तब, सब भगवान नहीं बन जाते??

चाँद बहुत सुन्दर है।
पर उस पर दाग है॥
गर दाग मिटाना तुम्हारे वश में नहीं।
दाग देख चाँद पर थूको नहीं॥

तुम्हारा थूक तुम्हीं पर पड़ेगा।
और तुम्हें पागल कहा जाएगा॥


घोड़ा, बैल, भैंसा, ऊँट हैं,
बड़े पुष्ट और बलवान।
पर, गाड़ी में जोते जाते,
कोमल नाक में नकेल डाल॥

सागर है अनन्त विशाल,
पर, उसका जल है खारा।
दीपक चारों ओर प्रकाश फैलाता,
पर उसके आधार तले, बसे अन्धेरा॥

हीरा है बहुत मूल्यवान,
पर वह होता है जहरीला।
उसे जब कोई चाट लेता,
खत्म हो जाती उसकी इहलीला॥

मोर के पंख बहुत सुन्दर,
पंख फैला कर वह झूम नाचता।
पर अपने बेडौल बदसूरत,
पैर देख वह रो पड़ता॥

कछुए की पीठ पर कठोर ढाल,
तलवार से मारो तो टूट जाती तलवार।
पर पेट है कितना नरम,
नन्हें काँटें में फँस होता शिकार॥

हाथी जानवरों में सबसे विशाल,
विशाल सूँड से छोड़ता फुहार।
पर नन्हीं-सी चींटी उसमें घुसने पर,
हो जाता उसका अकाल संहार॥

राम, कृष्ण, गाँधी, नेहरू, लाल, बाल, पाल।
अनेक महापुरुष कर गए अनेक कार्य महान॥
पर, उनसे भी कोई न कोई भूल हुई थी।
उनकी भी कोई न कोई कमजोरी तो थी॥

हर इन्सान में होते हैं अनेक विशेष गुण।
तो हरेक में है कमी, कोई न कोई अवगुण॥
यदि किसी से कभी कोई गलती न होती?
यदि किसी की कोई कमजोर नस न होती??

अहंकार से चूर रावण कहलाते।
या जब वे स्वयं को सम्पूर्ण पाते॥
तो फिर वे काबू में कैसे आते?
तब, सब भगवान नहीं बन जाते??

किसी में कोई कमजोरी देखकर।
दूसरों की किसी गलती को पकड़॥
उन पर हँसकर छीँटे कभी कसो नहीं।
यदि उसे सुधारना तुम्हारे वश में नहीं॥

हंस बनो, पर कौवा नहीं।
मोती चुगो, गन्दगी नहीं॥
दाग दूर करना तुम्हारे वश में नहीं।
दाग देख, कभी चाँद पर थूको नहीं॥

15 Feb, 2007

इण्टरनेट में हिन्दी : समस्याएँ एवं सम्भावनाएँ

आज सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में कम्प्यूटर और इण्टरनेट के अनुकूल हुए बिना किसी भाषा या लिपि के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा। युनिकोड कोन्सोर्टियम (http://www.unicode.org/) द्वारा सूचना विनिमय के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मानक-कूट निर्धारित किए जाने के बाद संसार की लगभग सभी लिखित लिपियों के अक्षर-चिह्नों को अनुपम पहचान मिल गई है और अब ये सूचना विनिमय के लिए अमेरिकी मानक कूटों (ASCII) के सबसेट कोडपेज पर आश्रित नहीं हैं। हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के लिए भी युनिकोड मानक कूट निर्धारित हो चुके हैं तथा सभी कम्प्यूटर प्रचालन प्रणालियों, इण्टरनेट सेवा प्रदाताओं, वेबसाइट होस्टिंग करनेवाली संजाल-संस्थाओं द्वारा कार्यान्वित किए जा रहे हैं। इससे हिन्दी भाषा एवं देवनागरी लिपि में विश्व-संचार का मार्ग प्रशस्त हुआ है। हिन्दी में वेबसाइटों, ब्लॉग, ईमेल-समूह, ऑन-लाइन-परिचर्चा-समूह आदि की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है तथा भारी मात्रा में साहित्य तथा सूचना सामग्री इण्टरनेट पर आम व्यक्ति को हिन्दी में भी उपलब्ध हो रही है। संसार भर के लोग एक-दूसरे को वेबमेल पोर्टलों तथा चर्चा समूहों के माध्यम से भी हिन्दी में ई-मेल सन्देश भेज रहे हैं।अनेक हिन्दी पुस्तकें और रोचक साहित्य, कविताएँ, ज्ञान-विज्ञान की सूचनाएँ हिन्दी में भी इण्टरनेट पर मिल रही हैं। अनेक हिन्दी अखबारों के भी वेब-एडिशन इण्टरनेट पर उपलब्ध हैं।

अब हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में भी मोबाईल फोन पर संक्षिप्त सन्देश (SMS) की सुविधा उपलब्ध हो गई है। भारत सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा सी-डैक के सहयोग से प्रस्तुत किए गए ऑन-लाइन हिन्दी प्रशिक्षण के पाठ्यक्रम मोबाईल फोन पर भी उपलब्ध कराए गए हैं।

इससे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी का महत्त्व बढ़ा है और अनेक देशों के लोग इण्टरनेट पर विभिन्न वेबसाइटों और ई-मेल समूहों के माध्यम से हिन्दी सीख रहे हैं तथा हिन्दी में अपने विचारों का आदान-प्रदान कर रहे हैं। हिन्दी से जुड़ी समस्याओं के बारे में परस्पर चर्चा करके समाधान पाते हैं।

विश्व के प्रसिद्ध ज्ञानकोश एन्साईक्लोपीडिया के अनुरूप इण्टरनेट पर ऑनलाइन बहुभाषी ज्ञानकोश में "http://hi.wikipedia.org/wiki/" तथा "http://wikisource.org/wiki/हिन्दी" वेबसाइटों पर समग्र हिन्दी ज्ञानकोश निःशुल्क रूप से सर्वसुलभ कराने का कार्य स्वयंसेवकों द्वारा जारी है। 10 सितम्बर 2006 तक विभिन्न ज्ञान-विज्ञान के विषयों पर 1716 संख्यक हिन्दी लेख विकिपीडिया में उपलब्ध थे। विकि की सबसे बड़ी विशेषता यह सबके लिए मुक्त है तथा कोई भी व्यक्ति इसमें कोई नया पाठ जोड़ सकता है तथा उपलब्ध पाठ को बिना किसी रोक-टोक के सुधार भी सकता है। इसलिए यह विकास के लिए उन्मुक्त है और निरन्तर इस ज्ञानकोश की सामग्री बढ़ती तथा सुधरती जा रही है।

इसी प्रकार विभिन्न भाषाओं की लिपियों के पाठों को दूसरी भाषा की लिपि में बदलने के लिए भी कुछ ऑन-लाइन प्रोग्राम उपलब्ध हो गए हैं। सिर्फ एक क्लिक करते ही देवनागरी से अन्य भारतीय भाषाओं में और इसके विलोमतः बदलनेवाला एक ऑनलाइन प्रोग्राम भी "http://www.devanaagarii.net/hi/girgit/" वेबसाइट पर श्री आलोक कुमार जी द्वारा उपलब्ध कराया गया है। हालांकि इसमें कुछ खामियाँ हैं, जिनके समाधान का प्रयास जारी है।

भारत के सूचना प्रोद्योगिकी मन्त्री माननीय मारन जी की पहल पर हिन्दी सॉफ्टवेयरों के संकलन की एक सीडी भी निःशुल्क जारी की जा चुकी है। ये www.ildc.in/hindi पर भी उपलब्ध हैं, जो एक स्तुत्य प्रयास है। किन्तु इनमें अधिकांश ओपेन सोर्स नहीं हैं और इनमें कुछ त्रुटियाँ/भूल पाई गई हैं, जिनका अगले संस्करणों में सुधार किया जाएगा। इनमें लिखित हिन्दी पाठ को बोलकर सुनाने के लिए "वाचक" नामक सॉफ्यवेयर भी शामिल है। 'लिनक्स' एक मुफ्त और मुक्त-कूट कम्प्यूटर प्रचालन प्रणाली है, कोई भी प्रोग्रामर इसमें कुछ सुधार करके अपना योगदान कर सकता है। जिससे इसका विकास दिन दूना रात चौगुना बढ़ता जा रहा है।

लिनक्स के विश्व की अनेक भाषाओं में रूपान्तरण हो चुके हैं। हिन्दी में भी सम्पूर्ण प्रदर्शन, मीनू, सहायता सहित विभिन्न निवेश सन्देश आदि उपलब्ध हो चुके हैं। http://www.indlinux.org/" वेबसाइट से इसके हिन्दी रूपान्तरणों को निःशुल्क डाउनलोड किया जा सकता है।

युनिकोड-मानक-कूटों के प्रचलन के बाद हिन्दी तथा देवनागरी लिपि का भूमण्डलीकरण हो गया है तथा अन्तर्राष्ट्रीय मञ्च पर भारत भी अपनी भाषायी भूमिका निभाने में काफी हद तक सफल हो रहा है।युनिकोड एक 16-बिट का मानक है जिसमें संसार की लिखित लिपियों के जिनमें कुल 65536 अक्षरों, मात्राओं, चिह्नों आदि का कूट-निर्धारण हो सकता है। इतने में संसार की लगभग सभी भाषाओं के मूल वर्ण आ जाते हैं। जबकि 8-बिट होने के कारण पुराने एस्की (ASCII) आधारित कोडपेज में अधिकतम 256 कूट ही निर्धारित हो पाते थे। इसलिए हिन्दी के अक्षर-कूट अंग्रेजी के अक्षरों के ऊपर पैबन्द की तरह चिपकाकर काम चलाना पड़ता था।

लेकिन इण्टरनेट के क्षेत्र में वर्तमान हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं में कुछ तकनीकी समस्याएँ अभी भी सामने मुँह बाए खड़ी हैं, जिनके समाधान के लिए विशेष ध्यान दिया जाना जरूरी है।

इनमें से कुछ प्रमुख हैं:

जटिल प्रक्रिया

हिन्दी की 'देवनागरी' लिपि के मूल अक्षरों (स्वर एवं व्यंजन) की कुल संख्या सिर्फ 49 है। आश्चर्य की बात है कि फिर भी हिन्दी (तथा भारतीय भाषाओं -Indic) को जटिल भाषाओं (Complex Languages) की श्रेणी में रखा गया है। जबकि जापानी-चीनी-कोरियाई (CJK) तीन विशाल राष्ट्रों की संयुक्त लिपि, जिसके 25000 से ज्यादा अक्षरों को युनिकोड में कूट-निर्धारित (encoded) किया गया है, को अपेक्षाकृत सरल लिपि कहा जाएगा।

इसका कारण है: मूल अक्षरों के बायें, दायें, ऊपर, नीचे लगनेवाली मात्राओं, संयुक्ताक्षरों, वर्ण का संरेखण-क्रम कभी बायें से दायें तथा कभी ऊपर से नीचे होने तथा कुछ अतार्किक और अवैज्ञानिक प्रयोग के कारण प्रचलित रूप में पाठ का प्रदर्शन (rendering) काफी जटिल होता है।

इसका प्रमुख कारण है कि युनिकोड मानक-कूटों में मूल अक्षरों और मात्राओं को ही स्थान दिया गया है। संयुक्ताक्षरों तथा बारह-खड़ी (मात्रायुक्त वर्ण) को प्रकट करने के लिए कम्प्यूटर के आन्तरिक संसाधन हेतु जटिल दोमुँही प्रक्रियाएँ अपनानी पड़ती हैं। कम्प्यूटर में देवनागरी डैटा का भण्डारण एवं संसाधन सिर्फ मूल कूटाक्षरों (Encoded characters) में होता है, जबकि परम्परागत रूप में संयुक्ताक्षरों आदि को प्रकट करने तथा मुद्रण के लिए ओपेन टाइप फोंट्स का उपयोग करना पड़ता है। देवनागरी लिपि के लिए ओपेन टाइप फोंट्स में अनेक जटिल नियमों का उपयोग करना पड़ता है, जिनमें प्रमुख हैं : वर्णखण्डों के पुनःस्थापन (glyph positioning) तथा वर्णखण्डों के विकल्पन (glyph substitution) की प्रक्रियाएँ।

अधिक लागत

16 बिट कूट होने के कारण युनिकोड कूटों के पाठ व डैटा को पुराने आपरेटिंग सीस्टम् वाले कम्प्यूटर कार्यान्वित नहीं कर पाते। विण्डोज एक्सपी के बाद तथा लिनक्स आदि में भी यूनीकोड पूरी तरह कार्यान्वित करने में कई तरह की समस्याएँ हैं। युनिकोड को सही रीति लागू करने के लिए कम्प्यूटर की क्षमता, स्पीड, मेमोरी, हार्डडिस्क, प्रोसेसर सभी का आधुनिकीकरण करना होगा, अर्थात लगभग पूरा कम्प्यूटर और आपरेटिंग सीस्टम बदलना होगा, जिसमें भारी लागत आती है।

महंगा होना

युनिकोड पाठ व डैटा एस्की डैटा की तुलना में दुगुना स्थान घेरता है। यूनीकोड को पुरानी 8 बिट कम्प्यूटर प्रणालियों के मध्य तालमेल आवश्यकता के मद्देनजर इसके 8-बिट प्रतिबिम्ब रूपक यूटीएफ-8 कूट निर्धारित किए गए हैं। लेकिन इसमें एक अक्षर एक बाईट से वजाए तीन से चार बाईट का स्थान घेरता है। जिससे पाठ का आकार तीन से चार गुना हो जाता है।

उदाहरण के लिए मोबाइल फोन पर अंग्रेजी में भेजे गए 150 अक्षरों तक के एक लघु सन्देश (SMS) की लागत (भारत संचार निगम की तत्कालीन दर अनुसार) एक रुपया होती है। किन्तु हिन्दी में 150 अक्षरों तक के एक लघु सन्देश की लागत 3 से 4 रुपये तक आएगी। एक हिन्दी लघु सन्देश 3 या 4 सन्देशों में विभाजित होकर प्रेषिती के मोबाइल में पहुँचता है। क्योंकि हिन्दी सन्देश यूटीएफ-8 (UTF8) कूटों में बदलकर सम्प्रेषित होते हैं और हिन्दी का एक अक्षर (syllable) एकाधिक वर्णों (Alphabet) से मिलकर बना होता है। इस प्रकार हिन्दी का प्रयोग उपयोगकर्ता का काफी महंगा पड़ता है। अतः लोग रोमन लिपि में सन्देश भेजने को प्राथमिकता देते हैं। आज के भागम् दौड़ के युग में लोग कम से कम अक्षरों में अपने भाव व्यक्त करते हैं। जैसे : How are you? के बदले
"How r u" लिखा जाने लगा है।

हिन्दी ई-मेल सन्देशों का पाठ विकृत हो जाना:

युनिकोड कूटों में सम्प्रेषित हिन्दी ई-मेल सन्देश अक्सर अन्य कूटों में विकृत होकर मिलते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी ने एक सन्देश में तीन अक्षर (कखग) 16 बिट शुद्ध युनिकोड में लिखकर भेजे हैं। तो वह प्रेषिती के पास कभी यूटीएफ-8-कूट में बदलकर यों ( कखग) प्रकट होता है। तो कभी वेब प्रोग्रामिंग भाषा एचटीएमएल के दशमलव कूटों में बदलकर (जैसे "कखग" के बदले "कखग") प्रकट होता है तो कभी प्रश्नवाचक चिह्न बनकर (???) प्रकट होता है, तो कभी अन्य कूटों में बदल कर हिन्दी सन्देश कूड़ा-करकट जैसे प्रकट होते हैं। जिससे भारी समस्या पैदा होती है। सन्देश प्राप्तकर्ता परेशान होकर रोमन लिपि में हिन्दी सन्देश भेजने को मजबूर होते हैं। इसका कारण है विभिन्न वेब-पोर्टाल एवं ई-मेल सेवा प्रदाताओं ने अभी तक युनिकोड/यूटीएफ8 को डिफॉल्ट रूप में पूर्व-निर्धारित करने के लिए उपयोक्ता को कोई विकल्प प्रदान नहीं किया है। लेकिन प्रसिद्ध इण्टरनेट सर्च इंजन गूगल द्वारा प्रदान की जा रही "gmail.com" द्वारा उपयोक्ताओं को डिफॉल्ट रूप में सन्देश यूटीएफ-8 रूप में भेजने का विकल्प प्रदान किया है। जिससे जीमेल से भेजी गई हिन्दी ई-मेल सही रूप में प्रकट होती है। सभी ई-मेल सेवा-प्रदाताओं को ऐसे विकल्प प्रदान करना चाहिए, लेकिन इसमें और कुछ वर्षों का समय लग सकता है।

मुक्त कूट या मुफ्त न होना :

विभिन्न कम्प्यूटर