15-Feb-2007

श्रम विद्युत की बैटरी

"काश! भोजन अपने आप पक जाता। काश! कपड़े अपने आप धुल जाते। काश! हमें कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता। कितना अच्छा होता यदि सोचते ही कल्पवृक्ष के नीचे बैठे व्यक्ति की तरह हमारी सारी मनोकामनाएँ अपने आप पूरी हों जाती। आराम ही आराम होता हमारे जीवन में।"

आज संसार के सभी लोग यही चाहते हैं कि कम से कम परिश्रम करना पड़े और अधिक से अधिक आराम मिले। कम से कम परिश्रम करके ही सारे काम संपन्न हो जायें। बिना श्रम किए ही स्वतः फल मिल सके।

संसार के वैज्ञानिक दिनोंदिन मानव को अधिकाधिक सुख-सुविधा प्रदान करने के लिए नए नए आविष्कारों की तलाश में लगे हुए हैं। प्राचीन काल में दूर प्रांत के व्यक्ति के पास सन्देश किसी अन्य व्यक्ति को भेजकर ही पहुँचाया जा सकता था। आज चलते-फिरते-घूमते सेल्यूलर फोन के माध्यम से हम संसार भर में बातचीत कर सकते हैं। दूरदर्शन चैनलों में संसार के दृश्य घर बैठे देखते हैं। उपग्रहों और अंतरिक्ष यानों में बैठ ब्रह्मांड की सैर कर सकते हैं।

लेकिन व्यक्ति को जितनी अधिक सुख-सुविधाएँ और आराम मिलता जा रहा है, उसका मानसिक तनाव, अशान्ति और दुःख भी बढ़ता ही जा रहा है। शरीर में अनेकानेक नए-नए रोग घर करते जा रहे हैं। क्या कारण है इसका? सुख दुःख में क्यों बदलता जा रहा है?

कहावत है -- "अति सर्वत्र वर्जयेत।" अत्यधिक सुख-सुविधा भी व्यक्ति को आलसी बना देती है। उसकी कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ शिथिल पड़ती जाती हैं। जैसे कि प्रसाधित भोजन या फास्ट फूड अधिक खाने वाले शहरी व्यक्तियों के दाँत ही नहीं पाचन तंत्र भी कमजोर पड़ जाता है।

अर्थशास्त्र में उत्पादन या व्यवसाय के लिए पाँच प्रमुख तत्व बताये गए हैं -- भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन और उद्यम। इन सभी में श्रम तत्व सर्वोपरि महत्व का है, जिसके बिना कोई भी कार्य संभव नहीं हो पाता। यहाँ हमें श्रम का व्यापक अर्थ लेना होगा। अर्थात् श्रम में केवल मजदूर ही नहीं, बल्कि मालिक या प्रबंधकों का परिश्रम भी शामिल है। चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो या बौद्धिक। अगर कहीं किसी रूप में श्रम ही नहीं होगा तो कोई भी उत्पादन या विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

समस्त साधनों में श्रम एक ऐसा तत्व है जो सर्वाधिक क्षणभंगुर प्रकार का होता है। जिस प्रकार किसी विद्युत उत्पादन केन्द्र से उत्पादित विद्युत का उपयोग नहीं किया जाए, तो वह ऊर्जा बेकार नष्ट हो जाती है। यह ऊर्जा जमा करके नहीं रखी जा सकती। उसी प्रकार शरीर में चयापचय से सृजित ऊर्जा शक्ति का उपयोग नहीं किया जाए तो वह नष्ट हो जाएगी। उसे जमा करके नहीं रखा जा सकता। क्या ऐसी कोई बैटरी नहीं बनाई जा सकती, जो किसी 1000 मेगावाट के विद्युत संयंत्र से उत्पादित होनेवाली विद्युत शक्ति को कुछ वर्षों तक भंडारित करके रख सके? और जब संयंत्र बन्द हो तो उसका उपयोग किया जा सके।

अत्यन्त सीमित क्षेत्र में ही ऊर्जा को बैटरी में भंडारित किया जा सकता है। 3 वोल्ट से लेकर 12 वोल्ट तक की ही फिर से चार्ज की जा सकने वाली बैटरियाँ फिलहाल बाजार में उपलब्ध होती हैं, जो विद्युत शक्ति से चार्ज होती हैं। उसी प्रकार हमारे शरीर में भोजन के पाचन से बना रस अनन्तः शरीर में चर्बी के रूप में भंडारित होता है। जो कुछ सीमित समय तक ही भूखे रहने पर हमें ऊर्जा प्रदान कर सकता है।

यदि हम दिन भर कोई भी काम या परिश्रम न करें, तो क्या भूख नहीं लगेगी? भूख तो लगेगी ही। दिन भर आराम फरमाने पर, आलस्य से पड़े रहने पर भी भूख-प्यास तो लगेगी ही। चाहे हमारे हाथ-पैर, दिमाग काम करें या न करें, पर पेट तो निरन्तर अपना काम करते रहता है। भोजन को पचाकर शरीर को जीवित रहने के लिए ऊर्जा प्रदान करने का काम निरन्तर करते रहता है। और पेट खाली होते ही फिर भूख लग जाती है। अतः जिस प्रकार जीवित रहने के लिए भोजन अत्यन्त आवश्यक है, उसी प्रकार जीवित रहने के लिए अपने अंगों से काम लेना भी उतना ही आवश्यक समझना चाहिए। नहीं तो शरीर के अंगों में मशीनों के पुर्जों में लगनेवाली जंग की तरह अकड़न छाने लगेगी।

आलस्य बुरी बला है। इससे बचना जरूरी है। आलस के कारण हमारा बहुमूल्य समय नष्ट हो जाता है। एक बार बीता हुआ समय या अवसर हाथ से निकल जाए तो फिर हाथ नहीं आता। बीता हुआ क्षण कभी लौटकर नहीं आता। समय को किसी बन्धन में आबद्ध नहीं किया जा सकता। उसे कदापि रोका नहीं जा सकता। घड़ी निरन्तर चलती ही रहती है। अतः समय नष्ट न कर, हमें सदा कुछ न कुछ काम करना ही बुद्धिमानी है। काम करने से, परिश्रम करने से हमारा कोई नुकसान नहीं होगा, बल्कि शरीर तन्दुरुस्त बना रहेगा।

कुछ आलसी लोग कहते हैं कि बिना श्रम किए हमें दूसरों के श्रम के फल को लूट लेना चाहिए। चार्वाक नीति है कि कर्ज करके घी पीते रहना चाहिए। भगवान की बनाई सृष्टि और उसकी कृपा का उद्धरण देते हुए दास मलूक ने कहा है --

अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।।

लेकिन अगर सभी व्यक्ति श्रम करना छोड़ दें और चकोर पक्षी की तरह आकाश की ओर मुँह बाये पड़े रहें कि भगवान आसमान से अन्न-जल टपका देंगे उनके मुँह में, तो फिर सारा संसार कैसे चलेगा? समस्त चेतन प्राणी जड़ नहीं बन जायेंगे? या फिर किसी काल्पनिक वैज्ञानिक कहानी की तरह ऐसी किसी एनर्जी टेबलेट का आविष्कार किया जाए, जिससे कि न तो भूख लगे, न प्यास, न टट्टी लगे न पेशाब। इससे आगे भी कुछ ऐसे आविष्कार के बारे में सोचा जा सकता है, जिससे कि सांस भी न लेना पड़े। इसका तो बड़ा सरल उपाय है -- आत्महत्या। अर्थात चेतन से जड़ बन जाना। पत्थर बन जाना।

संसार चक्र को स्वचालित रूप से चलते रहने के लिए भगवान ने समस्त चेतन प्राणी में भूख-प्यास की भावनाएँ सृजित की हैं और कर्म करने के लिए हाथ पैर दिए हैं। हर प्राणी को अपना भोजन तलाशना पड़ता है। चींटी से लेकर हाथी तक को। इसीलिए तुलसीदास ने रामायण में स्पष्ट किया है --

कर्म प्रधान विश्व करि राखा।
जो जस करे सो तस फल चाखा।।


अतः श्रम व कर्म को सर्वोपरि महत्व देते हुए सदा कुछ न कुछ कर्म करते रहना चाहिए। ऊर्जा को भंडारित नहीं किया जा सकता। लेकिन कर्मों के फल को धन या उपज में परिणत करके भंडारित किया जा सकता है। इस श्रम ऊर्जा को संस्कारों की बैटरी में भरा जा सकता है। कमाई गई धन-संपत्ति तो हम इस जन्म भर उपभोग कर सकते हैं, हमारे कई पीढ़ियों के वंशजों के लिए छोड़ सकते हैं, देश व समाज की भलाई में खर्च कर सकते हैं। किन्तु कमाया गया पुण्य हमारे आगामी जन्मों के लिए भी धर्मराज के खाते में जमा हो जाता है, जिसका हम जन्म-जन्मान्तर तक उपयोग कर सकते हैं। अतः निरन्तर श्रम या काम करते रहना चाहिए। कभी अपनी ऊर्जा एवं श्रम को बेकार नहीं खोना चाहिए।
क्योंकि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। अतः विद्वानों की शिक्षा है--
कल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में प्रलय होयगो, बहुरि करैगो कब??


किन्तु इसका भी विपरीत श्लोक बना लिया है कुछ आलसी-विद्वानों ने...
आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों।
इतनी जल्दी क्या पड़ी है, जीना है बरसों॥
देश में आज भुखमरी फैली हुई है। क्यों? क्योंकि बेकारी फैली हुई है। लोगों के पास काम नहीं है। लोग काम की तलाश में ,नौकरी की तलाश में दर-दर भटकते हैं। श्रमिकों के दल-बल काम की तलाश में एक प्रान्त छोड़कर दूसरे प्रान्त की लम्बी यात्राएँ कर रहे हैं। रोजगार कार्यालयों में बेरोजगारों की सूचियाँ दिनों दिन लम्बी होती जा रही है।

दूसरी ओर देखें तो किसी काम के लिए हमें योग्य व्यक्ति नहीं मिलते। कभी किसी काम के लिए कोई मजदूर चाहिए तो हमें नहीं मिलता। यहाँ तक स्थिति पहुँच जाती है कभी, कि किसी पर्व पर भोजन कराने के लिए हमें कोई ब्राह्मण भी नहीं मिलता। कभी कभी तो दान लेने वाला कोई भिखारी भी कहीं दिखाई नहीं देता। देश भर में जहाँ नजर दौड़ायें, हर क्षेत्र विभिन्न परियोजनाएँ अधूरी पड़ी दिखाईं देती हैं। सारे काम अधूरे पड़े दिखते हैं। कोई काम करने वाला नहीं मिलता।

कहीं काम है, करनेवाले नहीं। कहीं करनेवाले हैं, पर काम नहीं है। कहीं काम मिल जाने पर लोग मुफ्त की रोटी पाना चाहते हैं। सरकारी नौकरी मिल जाने पर लोग आराम फरमाते हैं, अपना काम समय पर पूरा नहीं करते। कल-कारखानों में, सरकारी कार्यालयों में कर्मचारी आन्दोलन चल रहे हैं। असन्तोष व्याप्त है। श्रमिकों के अनुसार अधिकारीगण एवं मालिकगण उनका शोषण करते हैं, खुद आराम फरमाते हैं। अधिक सुख-सुविधाएँ भोगते हैं, संगठन का धन विभिन्न उपायों से हड़पते हैं और उन्हें सताते हैं। दूसरी ओर अधिकारीगण एवं मालिक यह आरोप लगाते हैं कि श्रमिक बेहक की मांग करते हैं। इतनी मजदूरी देने पर और बढ़ाने की मांग करते हैं और इसके बावजूद कामचोरी करते हैं। आलस करते हैं। कारखाने को नुकसान पहुँचाते हैं। मालिक एवं अधिकारीगण जिस प्रकार दिनरात अपने संगठन की गतिविधियों के प्रति चिन्ताग्रस्त रहते हैं, जिम्मेदारियाँ संभालते हैं, उसके विपरीत श्रमिकगणों को केवल अपनी मजदूरी मिलने से मतलब रहता है। वे संगठन के विकास के बारे में कुछ नहीं सोचते।

इन सारी समस्याओं के मूल की तलाश करने पर हम अन्त में इसी सारांश पर पहुँचते हैं कि श्रम ऊर्जा के प्रबंध में, समन्वय में, सही उपयोग करने में हमारे मानव संसाधन विकास के सिद्धान्तों या नीति में कुछ मूलभूत गलती छिपी हुई है, जो नजरों में नहीं आती। मानव-संसाधन-प्रबन्ध-शास्त्र श्रम और श्रमिक की सही परिभाषा करने में सफल नहीं हुआ है। श्रम ऊर्जा को संरक्षित करने के लिए किसी विशाल बैटरी की परिकल्पना तक नहीं कर पाया है। इसके लिए गीता में भगवान के मुख से उद्धृत कर्म की सही परिभाषा को जीवन में उतारने का प्रयास करना होगा --

कर्मण्येवाधिकारस्ते तु मा फलेषु कदाचन।

श्रमेव जयते! आइए! अब हम सब मिलकर उस विधि की तलाश करें जो हमारे समय और श्रम अर्थात् कर्म को इतनी सही रीति सरणीबद्ध कर सके कि हमारा एक भी क्षण बेकार न जाए, हमारी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक ऊर्जा जरा-सी भी व्यर्थ न हो पाए, हमारे कर्मों के फल निरन्तर संग्रहित होते रहें, इस जन्म के लिए धन - संपत्ति, सुख-शान्ति और आनेवाले जन्मों के लिए पुण्यों का अपार खजाना जमा होते रहे, और वह बैटरी निरन्तर चार्ज होती रहे।

1 comment:

Shrish said...

हार्दिक स्वागत है चिट्ठाजगत में आपका हरिराम जी। आश्चर्य है आप इतने समय से चिट्ठा लिख रहे हैं लेकिन इस बारे में किसी को मालूम नहीं। मैं आपके चिट्ठे पर पहला टिप्पणीकर्ता हूँ। आश्चर्य है कि अब तक आपको हिन्दी चिट्ठाकारों की सामुदायिक साइटों का पता कैसे नहीं चला।

आज चिट्ठाकार समूह से आपके बारे में पता चला। वहाँ आपके प्रश्न का मैंने उत्तर भी दिया है, पढ़ना न भूलें। खैर सबसे पहले आप परिचर्चा हिन्दी फोरम की सदस्यता ग्रहण कीजिए। हिन्दी लेखन संबंधी किसी भी सहायता के लिए इस सबफोरम तथा ब्लॉग संबंधी किसी भी सहायता के लिए इस सबफोरम में सहायता ले सकते हैं।

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श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'