15-Feb-2007

वाहनों के प्रदूषण से बचाव का - एक उपाय

आज तीव्रगामी संसार में आरामपूर्ण जीवन शैली के प्रचलन के साथ स्वचालित वाहनों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है, जिनमें मुख्यतः पेट्रोल एवं डीजल का ईंधन रूप में उपयोग होता है। इन वाहनों से निकलनेवाले धुँए में कार्बन-डाई-ऑक्साइड, कार्बन-मोनो-आक्साइड जैसी विषैली गैसे होती हैं, जो मानव एवं जीव जन्तुओं के स्वास्थ्य के लिए घातक होती हैं। वायु में निरन्तर घुलते भारी जहर के कारण लोगों को श्वासजनित अनेकानेक बीमारियाँ लग जाती हैं। साँस उठना, नज़ला, गले व नाक-कान की बीमारियाँ, हृदय रोग, फेंफड़ों का खराब होना आदि अनेकानेक जानलेवा रोगों से शहरों में रहनेवाले अधिकांश लोग पीड़ित रहने लगे हैं, जिनका कोई सही इलाज संभव नहीं होता या ये बीमारियाँ लाइलाज होती हैं।

विशेषकर महानगरों एवं शहरों में वाहनों की संख्या अत्यधिक होने के कारण उनसे निकलनेवाले धुँए से चहुँओर वायु प्रदूषित रहती है। सड़कों तथा चौराहों पर तो साँस लेना तक दूभर हो जाता है। आँखों में जलन होना तो आम बात है।

वाहनों का धुँवा इनकी साईलेन्सर की नली के छोर से निकलता है, जिसका मुँह वाहनों के पीछे की ओर रहता है। पीछे की ओर हवा में जहरीले पदार्थ घुलते जाते हैं। और फिर इस नली का मुँह नीचे ओर झुका होने के कारण धुँए का तेज झोंका पहले सड़क पर टकराता है और अपने साथ सड़क की गन्दी धूल को भी लेकर हवा में उड़ाकर जहरीले तत्वों को कई गुना बढ़ा देता है। लोगों की नाक में यह धुँआ एवं गन्दी धूल घुसकर घातक प्रभाव डालती है।

सड़कों पर वाहन चलाते वक्त हमसे आगे चल रहे वाहन से निकलता धुँआ हमें अत्यन्त खराब लगता है और उस वाहन चालक पर क्रोध भी आता है कि वह अपनी गाड़ी का अनुरक्षण व देखभाल नहीं करता। मोबिल ऑयल सही प्रतिशत में क्यों नहीं डालता या ट्युनिंग ठीक नहीं करवाता। किन्तु हम यह बात नहीं सोचते कि हमारे वाहन से निकलनेवाला धुँवा हमारे पीछे चलनेवाले को कितनी हानि पहुँचाता होगा।

सबसे बुरी स्थिति होती है, जब चौराहों पर लाल बत्ती होने के कारण प्रतीक्षारत वाहन खड़े रहते हैं तो उनका इंजन स्टार्ट रहता है तथा उनसे निकलता धुँवा इतना अधिक गहरा होता जाता है कि आँखों में जलन होने के साथ साथ खाँसी भी आने लगती है एवं साँस उठना शुरू हो जाता है।

महानगरों के अत्यधिक ट्राफिक वाले कुछ चौराहों पर इतना अधिक प्रदूषण व्याप्त रहता है कि व्यक्ति को अपने नाक-मुँह पर मास्क लगाने के बावजूद शुद्ध हवा नहीं मिल पाती। गैस-मास्क का फिल्टर भी कुछ ही मिनटों में धूल व गन्दगी से अवरुद्ध होकर बेकार हो जाता है। विशेषकर चौराहों पर यातायात पुलिस कर्मियों का हाल सर्वाधिक बुरा होता है। गैस-मास्क भी उन्हें बचा नहीं पाते।

लगता है कि अब उन्हें अपनी पीठ पर ऑक्सीजन सीलेण्डर लादे यातायात नियन्त्रण की ड्यूटी निभानी पड़ेगी। जैसे समुद्र में गोताखोर अपनी पीठ पर ऑक्सीजन सीलेण्डर लादे नाक पर नली बाँधे गहरे समुद्र में उतरते हैं, जैसे अन्तरिक्ष यात्री अपने साथ ऑक्सीजन सीलैण्डर लटकाए रहते हैं, वैसे ही जोखिम भरा कार्य होगा चौराहों पर ट्रॉफिक पुलिस या होमगार्डों के लिए वाहनों के संचालन को नियंत्रित करना।

कुछ लोग मजाक में कहते हैं कि यदि किसी को मृत्युदण्ड देना हो तो गोली मारने या फाँसी देने की जहमत उठाने कोई आवश्यकता नहीं, उसे बस दिल्ली के आई.टी.ओ. चौराहे पर खड़ा कर देना चाहिए। वहाँ के भयंकर प्रदूषण से डरकर उसके प्राण स्वतः निकल भागेंगे।

प्रदूषण की इस जानलेवा समस्या को मद्देनजर रखते हुए यातायात पुलिस के लिए सौर-ऊर्जा चालित वातानुकूलित केबिन बनाए गए हैं, जिनमें बैठकर वे यातायात नियंत्रण कर सकें। लेकिन ये काफी मंहगे होने एवं इनकी अत्यन्त सीमित आपूर्ति होने के कारण पर्याप्त बचाव नहीं कर सकते। और फिर ट्राफिक नियमों का उल्लंघन कर भाग निकलने का प्रयास करनेवालों को पकड़ने या रोकने के लिए कुछ पुलिस कर्मियों को तो हर सड़क के जेबरा क्रॉसिंग के पास चहलकदमी करनी ही पड़ती है।

पेट्रोल एवं डीजल के धुँए से प्रदूषण को रोकने के लिए उच्चतम न्यायालय ने वाहनों को सी.एन.जी. से चलाने के आदेश जारी किए हैं, किन्तु इस सुविधा को वाहनों में लगाने के लिए भारी लागत आती है तथा सी.एन.जी. की आपूर्ति भी पर्याप्त न होने के कारण इस आदेश का कार्यान्वयन कठिन है। सी.एन.जी. का मूल्य भी हाल ही में काफी बढ़ा दिया गया है।

प्रदूषण से बचने के लिए आजकल मध्यमवर्ग के लोग भी मंहगी वातानुकूलित कारों या अन्य वाहनों का उपयोग करने लगे हैं। इनमें बैठे व्यक्ति तो प्रदूषण से बच जाते हैं किन्तु दूसरे लोगों के लिए पहले से दुगुना प्रदूषण फैला देते हैं। क्योंकि वातानुकूलन यन्त्र के संचालन के लिए इंजन द्वारा लगभग दुगुने ईंधन की खपत होती है और दुगुना प्रदूषण फैलता है।

संयुक्त राष्ट्र संघ की पर्यावरण परिषद ने भी यूरो-2/यूरो-3 मानक निर्धारित किए हैं जो वाहनों से निकलनेवाले प्रदूषण के स्तर को निम्नतम रखने की तकनीकी की सिफारिश करते हैं। हालांकि नए निर्मित होनेवाले वाहनों में ऐसी तकनीकी लगाई जा रही है। लेकिन संसार भर में अरबों की संख्या में चलनेवाले अरबों वाहनों को फेंका तो नहीं जा सकता। जैसे 15 वर्ष से पुराने वाहनों को दिल्ली जैसे महानगरों में चलाने पर प्रतिबन्ध लगाया गया है। लेकिन फिर भी उनका उपयोग पूर्णतः बन्द नहीं हो पाया है। अतः पुराने वाहनों को महानगरों से निकाल कर अन्य शहरों एवं गाँवों में चलाया जाता है, जो वहाँ के वातावरण को प्रदूषित कर जहरीला बनाते हैं।

प्रदूषण कालियदमन नाग साँप की तरह समग्र संसार रूपी यमुना नदी को जहरीला बना चुका है। इससे मुक्ति के लिए लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं किसी कृष्णावतार की जो इसके मस्तक पर नाच-नाच कर इसे संसार से निकाल भगा दे तो संसार के लोग चैन की साँस लें।

वाहनों से निकलनेवाले पेट्रोल एवं डीजल के विषाक्त धुँए से लोगों को काफी हद तक बचाने के लिए एक सरल एवं कारगर उपाय यहाँ प्रस्तुत हैं ---

जिस प्रकार कल-कारखानों की चिमनी को काफी ऊँचा बनाया जाता है ताकि उनसे निकलने वाला धुँआ मानव, जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों को हानि न पहुँचाए और गहरी ऊँचाई पर हवा के तेज प्रवाह से ऊपरी स्तर में घुलकर निष्क्रिय हो जाए। उसी प्रकार यदि वाहनों के साईसेन्सर-पाइप को ऊपर की ओर मोड़ कर यथासंभव ऊँचाई तक बढ़ा दिया जाए तो धुँआ ऊपर की ओर प्रवाहित होगा। पीछे आनेवाले लोगों के नाक-मुँह से टकराकर सीधे साँस द्वारा फेंफड़ों में प्रवेश नहीं करेगा।

इसके उदाहरण-स्वरूप ट्रेक्टर वाहन को देखें, जिसका साईलेन्सर पाइप ऊपर की ओर निकला रहता है, और धुँआ ऊपर की ओर उड़ता है। न तो पीछे आनेवाले व्यक्ति की साँसों में सीधे जाता है और न ही धरती पर हवा के निचले स्तर को प्रदूषित करता है।

इस उपाय को कार्यान्वित करने में कोई तकनीकी जटिलता भी तो नहीं दीखती है। साईलेन्सर पाइप में ऐसा एक एक्सटेन्शन पाइप मात्र जोड़ने की जरूरत है सौ या दो सौ रुपये मात्र की लागत से हो सकता है।

प्रदूषण नियंत्रण विभाग द्वारा इस सम्बन्ध में तत्काल एक आदेश जारी करके सर्वप्रथम भारी वाहनों -- ट्रक, बस, डोजर, डम्पर आदि इसे लागू किया जाना चाहिए कि उनके साईलेन्सर पाइप में एक्सटेन्शन पाइप जोड़कर धुँए को यथासंभव ऊपर की निष्कासित करने की व्यवस्था की जाए। फिर कार, जीप आदि में इसी उपाय को लागू किया जा सकता है। दुपहिया व तिपहिया वाहनों में भी इस संबंधी आदेश को तत्काल लागू किया जाना चाहिए। क्योंकि वे भी वातावरण को कोई कम प्रदूषित नहीं करते।




नए बननेवाले समस्त वाहनों की साईलेन्सर निकास नली को मूलतः फैक्टरी से ही यथासंभव अधिकाधिक ऊपर की ओर निकालने के बारे में आदेश जारी किए जाने चाहिए।

हालांकि इस उपाय से धरती का प्रदूषण तो कम नहीं होगा, लेकिन सड़कों पर चलते या चौराहों पर लाल बत्ती के कारण खड़े वाहनों से निकलनेवाला प्रदूषक जहरीला धुँवा यथासंभव ऊपर की ओर उड़ेगा तथा कम से कम पीछे खड़े वाहन या व्यक्ति की नाक से सीधे टकराकर उसके फेंफड़ों में जहर नहीं घोलेगा। ट्राफिक पुलिस कर्मियों को साँस लेने में कोई कठिनाई नहीं होगी और वे अपना कर्त्तव्य सही रीति निभा पाएँगे।

यह सरल एवं कारगर उपाय विश्वभर के लोगों को त्रस्त कर देने वाली अनेक बीमारियों एवं तकलीफों से बचा सकता है। क्योंकि धरती से कम से कम 6 से 10 फुट की ऊँचाई तक का हवा का स्तर प्रत्यक्ष प्रदूषण से बचा रह सकेगा, जिसमें अधिकांशतः मानव पैदल चलते हैं, साईकल, रिक्शा जैसे प्रदूषण-रहित वाहनों से यात्रा करते हैं।
इस सरल एवं सस्ते उपाय को कार्य में परिणत करवाने तथा इस बारे में जन-जागृति हेतु व्यापक प्रचार की जरूरत है। वायु प्रदूषण सबसे बड़ा पाप है तो इससे बचाव का प्रयास वस्तुतः सबसे बड़ा धर्म होगा। अतः जनहित में इस विचार के व्यापक प्रचार में सभी से सहयोग की अपील है।

No comments: