15-Sep-2009

हिन्दी जी-मेल को बिगड़ने से कैसे रोकें?

हिन्दी जी-मेल को बिगड़ने से कैसे रोकें?
How to stop Hindi Gmail being Corrupted


हिन्दी एवं अन्य युनिकोडित भाषाओं में लिखी गई ईमेल अक्सर गंतव्य तक पहुँचने तक बिगड़ जाती है तथा अन्य कूटों में बदलकर कूड़ा (Garbage) दिखाई देती है। जिसका कारण है -- कई पुराने ईमेल सर्वर युनिकोड (UTF8) एनकोडिंग को सम्भालने में सक्षम नहीं होते।

लेकिन जीमेल (Gmail) अर्थात् google mail पूर्णतः युनिकोड सक्षम है। इसके सर्वर नए और आधुनिक हैं।

फिर भी कई लोगों की Gmail से भेजे गए हिन्दी ईमेल भी गंतव्य तक बिगड़कर पहुँचते हैं। इसका कारण है उन्होंने अपने जीमेल खाते की सेटिंग settings ठीक से नहीं की है।

इस प्रकार सेटिंग्स करें :

Gmail में ऊपरी पंक्ति में स्थित settings पर क्लिक करें, यथा--








इसके पश्चात नीचे दिए गए चित्र अनुसार

Use Unicode (UTF8) encoding for outgoing messages के पहले वाले गोल स्विच को क्लिक करें-





फिर नीचे Save Settings बटन पर क्लिक करें।

अब आपके Gmail से भेजे गए हिन्दी में लिखे सन्देश गंतव्य तक पहुँचकर बिगड़ेंगे नहीं।

16-Jun-2009

बस! जलती तीली अपने पैरों में छुआ दो

बस! जलती तीली अपने पैरों में छुआ दो
Just touch burning stick on your leg

एक्जिमा का सबसे सरल इलाज

एक वन अधिकारी के पैरों में तीव्र एक्जिमा रोग हुआ था। इसका एक सबसे सरल उपाय यों सुझाया गया।

""एक अत्यन्त सरल उपाय है, रोग एक दम ठीक हो जाएगा। आपके भी एकदम सुन्दर हो जाएँगे, बिल्कुल फिल्मी हीरोईन के पैरों की तरह।"

उन्होंने पूछा-- "तो फिर जल्दी बताइए ना।"

उत्तर था-- "जी! बस अपने पैरों पर जरा-सा पेट्रोल लगा कर माचिस की एक तीली जलाकर छुआ दें। सारा इन्फेक्शन, वायरस, कीटाणु, ऊपर की गन्दी चमड़ी जल कर एकदम साफ हो जाएगी। घबराइए नहीं, पैरों को कोई नुकसान नहीं होगा। बस, एक बर्षात् होने दीजिए, नीचे से इतनी नर्म नर्म, सुन्दर, गुलाबी चमड़ी निकल आएगी। आपके पैर एकदम स्वस्थ और सुन्दर हो जाएँगे।"

जैसे को तैसा के रूप में यह जबाब क्यों दिया गया, यह जानने के लिए यहाँ देखें!

बढ़ती वैश्विक गर्मी - जलते जंगल

बढ़ती वैश्विक गर्मी - जलते जंगल
Global Warming - Burning Forests

विश्व का तापमान (global warming) निरन्तर बढ़ता जा रहा है। इसके खतरों से आगाह करते हुए अनेक सचेतनता लाने के कार्यक्रम, सेमिनार, प्रचार आदि किए जा रहे हैं।

वैश्विक तापवृद्धि के अनेक कारणों में से एक प्रमुख कारण है, जंगलों में आग। विशेषकर पतझड़ की ऋतु, अप्रेल-मई के महीने में जंगलों में आग लगी दिखाई देती है। कहते हैं कि गर्मी के कारण हवा से डालियों के परस्पर रगड़ने से चिन्गारी पैदा होकर आग लग जाती है। यह तथ्य काफी हद झूठ और जंगल कर्मचारियों द्वारा प्रचारित बहाना है।

सच तो यह है कि लोग, विशेषकर जंगल के कर्मचारी ही जान-बूझकर जंगल में आग लगा देते हैं। पतझड़ की ऋतु में पेड़ों के पुराने पत्ते झड़ कर पेड़ों के नीचे भारी परिमाण में बिछे रहते हैं। बसन्त ऋतु में नए पत्तों के आगमन के पूर्व वन-कर्मी तथा आसपास के लोग जानबूझ कर इन सूखे पत्तों में आग लगा देते हैं। ताकि परिश्रम नहीं करना पड़े और जंगल साफ हो जाए।

एक फॉरेस्ट रेंजर से इसका कारण पूछा गया -- तो वे बड़ी हेकड़ी के साथ डींग हाँकते हुए कहने लगे -- "अजी साहब! इन पत्तों में लगी आग से पेड़ों का कोई नुकसान नहीं होगा। बस नीचे का कूड़ा-करकट जलकर साफ हो जाएगा। साँप-बिच्छू आदि जहरीले जानवर भी मर-खप जाएँगे। पूरा जंगल साफ हो जाएगा। पेड़ों में लगी दीमक भी खतम हो जाएगी। बस! एक बर्षा होने दीजिए, फिर देखिएगा, असंख्य नई नईं कोंपलें निकलेगी और पूरा जंगल पहले से ज्यादा हरा-भरा हो जाएगा।"

हमने देखा जंगल में पेड़ों के नीचे सूखे पत्तों के ढेर में लगी आग से पूरा जंगल धू-धू कर जल रहा था। ऊपर अनेक हरी-भरी डालियाँ भी झुलस कर मुरझाने लग गईं थी।

यह कैसा सरल उपाय है? जंगल से कूड़ा करकट साफ करने का? अगले पूरे दो महीनों तक पूरा जंगल काली राख से भरा झुलसी हुई डालियों को लिए भूमण्डलीय ताप (global warming) को बढ़ाता रहेगा। कब बर्षात् होगी? कब नईं कोंपलें निकलेंगी?

जबकि जंगल के अपशिष्ट, (Forest waste, Agro waste) सूखे पत्तों, टहनियों, घास-फूस आदि से अनेक तरह के व्यावसायिक उपयोग होते हैं। इनसे प्लाईवुड, पार्टिकल बोर्डस्, कृत्रिम लकड़ी बनती है, बहुमूल्य कम्पोस्ट खाद बनाई जा सकती है। आज अनेक उद्योग जंगली और वनस्पतीय अपशिष्ट, कूड़े को कम्प्रेस करके एक प्रकार के उपले जैसे केक बनाते हैं, जिनको जलाकर बड़े-बड़े कारखानों के पॉवर प्लांट चलते हैं। उनमें कोयला, तेल आदि मूल्यवान ईंधनों की जरूरत नहीं होती, भारी बचत होती है।

सिर्फ जरा-से परिश्रम करने से बचने के लिए इस प्रकार अरबों रुपये के बहुमूल्य वन-अपशिष्ट की ऊर्जा को यों बेकार जलाकर नष्ट कर देना कहाँ की बुद्धिमानी है? जब पूछा जाता है तो वन-कर्मी बहाना बना देते हैं कि साहब आग तो अपने आप लग गई थी। कोई बदमाश सिगरेट पीकर यों ही फेंक गया होगा। तेज धूप के विकिरण से आग लग गई होगी।

कुछ देर बाद देखा कि रेंजर महोदय अपने गन्दे, कुरूप से पैरों को खुजला रहे थे। उन्हें भयंकर खुजली हो रही थी, देखा पैरों में एक्जिमा हो रखा है। हमने पूछा- "क्या कोई इलाज करवाते हैं?" उन्होंने कहा-- "अजी साहब! सारी दवाएँ ले लीं, एलोपैथिक, होमियोपैथिक, आयुर्वेदिक... ठीक ही नहीं हो रहा।"

हमने उनसे कहा-- "एक अत्यन्त सरल उपाय है, रोग एक दम ठीक हो जाएगा। आपके भी एकदम सुन्दर हो जाएँगे, बिल्कुल फिल्मी हीरोईन के पैरों की तरह।"

उन्होंने पूछा-- "तो फिर जल्दी बताइए ना।"

हमने बताया-- "जी! बस अपने पैरों पर जरा-सा पेट्रोल लगा कर माचिस की एक तीली जलाकर दिखा दें। सारा इन्फेक्शन, वायरस, कीटाणु, ऊपर की गन्दी चमड़ी जल कर एकदम साफ हो जाएगी। घबराइए नहीं, पैरों का कोई नुकसान नहीं होगा। बस, एक बर्षात् होने दीजिए, नीचे से इतनी नर्म नर्म, सुन्दर, गुलाबी चमड़ी निकल आएगी। आपके पैर एकदम स्वस्थ और सुन्दर हो जाएँगे।"

उनका चेहरा देखने लायक था, कोई जबाब नहीं दे पा रहे थे।

10-Jun-2009

धिक्कार! पर्यावरणविदो!

So called Environmentalists
धिक्कार! पर्यावरणविदो!

उन पर्यावरणविदों को धिक्कार है, जो कूड़ा-करकट जलाकर बिजली बनानेवाले संयंत्रों की स्थापना तथा प्रचालन का विरोध करते हैं। आन्दोलन करके उन्हें बन्द करवा देते हैं। किन्तु सड़कों के किनारे, घनी बस्ती व बाजार के बीच यत्र-तत्र-सर्वत्र कूड़े के ढेर इकट्ठा कर आग लगानेवाले लोगों, नगरपालिका के कर्मचारियों का विरोध नहीं करते। ऐसे तथाकथित पर्यावरण-प्रेमी चुल्लू भर पानी में डूब मरें!!!!

अक्सर देखा जाता है कि नगरपालिका के कर्मचारी ही रोज सुबह सड़कों आदि पर झाड़ू बुहारकर जगह जगह सड़क किनारे कूड़े के ढेर इकट्ठा कर उसमें आग लगाकर भाग जाते हैं। इस कूड़े में प्लास्टिक कचरा भी होता है तो कागज व गीले वनस्पतीय अपशिष्ट भी। जो घंटों तक सुलग सुलग खारा, जहरीला धुआँ तथा दुर्गन्ध फैलाते रहते हैं। कूड़ा ढोकर लेने के साधनों के अभाव में, या परिश्रम करने से कतराकर वे जहाँ तहाँ जलाकर कूड़ा नष्ट कर देने का प्रयास करते हैं। इससे निकलनेवाले जहरीले धुएँ को साँस में जाते से सर्दी, गले व आँखों की बीमारियाँ, दिल की बीमारियाँ, रक्त की अशुद्धता, हृदयरोग, पेट के रोग, हड्डियों के रोग आदि अनेकानेक बीमारियाँ फैलती रहती है। दुर्गन्ध के कारण राहगीरों, जनता को सिरदर्द, नजला, उलटी शिकायतें आदि होते रहते हैं। ऊपर से आसपास का तापमान बढ़ता है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती है।

जबकि कूड़ा-करकट को बिजली बनानेवाले संयंत्रों में वैज्ञानिक एवं तकनीकी तरीके से भट्ठियों में जलाया जाता है, हवा पम्प की जाती है, ऊँची चिमनी से धुआँ दूर आकाश में छोड़ा जाता है। जिससे बस्ती/बाजार के लोगों के सीधे श्वसन व स्वास्थ्य पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। कूड़ा जलकर ताप सृजित होता है, वाष्प बनती है, जो टर्बाईन घुमाकर बिजली बनाने में सहयोग करती है। कोयला, तेल आदि ईँधन की बचत होती है।

बैंगलोर आदि कुछ शहरों में सड़कों के किनारे, बस्ती/बाजार के बीच कूड़ा-करकट जलाने पर पाबंदी लगाई गई है। भारी जुर्माना प्रभारित किया जाता है। ऐसा सभी गाँवों और शहरों में अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए।

पर्यावरण को बचाने के लिए आवश्यक है कि राष्ट्रीय स्तर पर हर सरकारें ऐसे आदेश जारी करें कि जितने भी कारखाने आदि हैं, ताप-बिजली संयंत्र हैं, जिनमें कोयला, पेट्रोलियम आदि जलाकर ताप सृजित किया जाता है, वे अनिवार्य रूप से अपने कारखाने के कम से कम एक यूनिट में कूड़ा-करकट जलाने की सुविधा स्थापित करें।

हर नगरपालिका, नगर निगम आदि द्वारा कड़ा करकट ढोकर उन कारखानों तक पहुँचाने की अनिवार्य व्यवस्था की जाए, ऐसे कठोर आदेश जारी किए जाएँ।

भूमण्डलीय ताप वृद्धि, (global warming), सर्वजन स्वास्थ्य (public health), पर्यावरण सुरक्षा (environment safty) के लिए ऐसे कठोर आदेश जारी किए जाने और इनका कड़ाई से अनुपालन किया जाना आवश्यक है।

धिक्कार है! ऐसे तथाकथित पर्यावरणविदों को, जो कूड़ा करकट को कारखानों में जलाने का तो विरोध करते हैं, किन्तु शहरों, बस्तियों, सड़कों, बाजारों के बीच कूड़े के ढेर को जलानेवाले मूर्ख तथा आलसी लोगों को रोकते नहीं। चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए ऐसे पर्यावरण-प्रेमियों को।