बस! जलती तीली अपने पैरों में छुआ दो
Just touch burning stick on your leg
एक्जिमा का सबसे सरल इलाज
एक वन अधिकारी के पैरों में तीव्र एक्जिमा रोग हुआ था। इसका एक सबसे सरल उपाय यों सुझाया गया।
""एक अत्यन्त सरल उपाय है, रोग एक दम ठीक हो जाएगा। आपके भी एकदम सुन्दर हो जाएँगे, बिल्कुल फिल्मी हीरोईन के पैरों की तरह।"
उन्होंने पूछा-- "तो फिर जल्दी बताइए ना।"
उत्तर था-- "जी! बस अपने पैरों पर जरा-सा पेट्रोल लगा कर माचिस की एक तीली जलाकर छुआ दें। सारा इन्फेक्शन, वायरस, कीटाणु, ऊपर की गन्दी चमड़ी जल कर एकदम साफ हो जाएगी। घबराइए नहीं, पैरों को कोई नुकसान नहीं होगा। बस, एक बर्षात् होने दीजिए, नीचे से इतनी नर्म नर्म, सुन्दर, गुलाबी चमड़ी निकल आएगी। आपके पैर एकदम स्वस्थ और सुन्दर हो जाएँगे।"
जैसे को तैसा के रूप में यह जबाब क्यों दिया गया, यह जानने के लिए यहाँ देखें!
16 Jun, 2009
बस! जलती तीली अपने पैरों में छुआ दो
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हरिराम
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बढ़ती वैश्विक गर्मी - जलते जंगल
बढ़ती वैश्विक गर्मी - जलते जंगल
Global Warming - Burning Forests
विश्व का तापमान (global warming) निरन्तर बढ़ता जा रहा है। इसके खतरों से आगाह करते हुए अनेक सचेतनता लाने के कार्यक्रम, सेमिनार, प्रचार आदि किए जा रहे हैं।
वैश्विक तापवृद्धि के अनेक कारणों में से एक प्रमुख कारण है, जंगलों में आग। विशेषकर पतझड़ की ऋतु, अप्रेल-मई के महीने में जंगलों में आग लगी दिखाई देती है। कहते हैं कि गर्मी के कारण हवा से डालियों के परस्पर रगड़ने से चिन्गारी पैदा होकर आग लग जाती है। यह तथ्य काफी हद झूठ और जंगल कर्मचारियों द्वारा प्रचारित बहाना है।
सच तो यह है कि लोग, विशेषकर जंगल के कर्मचारी ही जान-बूझकर जंगल में आग लगा देते हैं। पतझड़ की ऋतु में पेड़ों के पुराने पत्ते झड़ कर पेड़ों के नीचे भारी परिमाण में बिछे रहते हैं। बसन्त ऋतु में नए पत्तों के आगमन के पूर्व वन-कर्मी तथा आसपास के लोग जानबूझ कर इन सूखे पत्तों में आग लगा देते हैं। ताकि परिश्रम नहीं करना पड़े और जंगल साफ हो जाए।
एक फॉरेस्ट रेंजर से इसका कारण पूछा गया -- तो वे बड़ी हेकड़ी के साथ डींग हाँकते हुए कहने लगे -- "अजी साहब! इन पत्तों में लगी आग से पेड़ों का कोई नुकसान नहीं होगा। बस नीचे का कूड़ा-करकट जलकर साफ हो जाएगा। साँप-बिच्छू आदि जहरीले जानवर भी मर-खप जाएँगे। पूरा जंगल साफ हो जाएगा। पेड़ों में लगी दीमक भी खतम हो जाएगी। बस! एक बर्षा होने दीजिए, फिर देखिएगा, असंख्य नई नईं कोंपलें निकलेगी और पूरा जंगल पहले से ज्यादा हरा-भरा हो जाएगा।"
हमने देखा जंगल में पेड़ों के नीचे सूखे पत्तों के ढेर में लगी आग से पूरा जंगल धू-धू कर जल रहा था। ऊपर अनेक हरी-भरी डालियाँ भी झुलस कर मुरझाने लग गईं थी।
यह कैसा सरल उपाय है? जंगल से कूड़ा करकट साफ करने का? अगले पूरे दो महीनों तक पूरा जंगल काली राख से भरा झुलसी हुई डालियों को लिए भूमण्डलीय ताप (global warming) को बढ़ाता रहेगा। कब बर्षात् होगी? कब नईं कोंपलें निकलेंगी?
जबकि जंगल के अपशिष्ट, (Forest waste, Agro waste) सूखे पत्तों, टहनियों, घास-फूस आदि से अनेक तरह के व्यावसायिक उपयोग होते हैं। इनसे प्लाईवुड, पार्टिकल बोर्डस्, कृत्रिम लकड़ी बनती है, बहुमूल्य कम्पोस्ट खाद बनाई जा सकती है। आज अनेक उद्योग जंगली और वनस्पतीय अपशिष्ट, कूड़े को कम्प्रेस करके एक प्रकार के उपले जैसे केक बनाते हैं, जिनको जलाकर बड़े-बड़े कारखानों के पॉवर प्लांट चलते हैं। उनमें कोयला, तेल आदि मूल्यवान ईंधनों की जरूरत नहीं होती, भारी बचत होती है।
सिर्फ जरा-से परिश्रम करने से बचने के लिए इस प्रकार अरबों रुपये के बहुमूल्य वन-अपशिष्ट की ऊर्जा को यों बेकार जलाकर नष्ट कर देना कहाँ की बुद्धिमानी है? जब पूछा जाता है तो वन-कर्मी बहाना बना देते हैं कि साहब आग तो अपने आप लग गई थी। कोई बदमाश सिगरेट पीकर यों ही फेंक गया होगा। तेज धूप के विकिरण से आग लग गई होगी।
कुछ देर बाद देखा कि रेंजर महोदय अपने गन्दे, कुरूप से पैरों को खुजला रहे थे। उन्हें भयंकर खुजली हो रही थी, देखा पैरों में एक्जिमा हो रखा है। हमने पूछा- "क्या कोई इलाज करवाते हैं?" उन्होंने कहा-- "अजी साहब! सारी दवाएँ ले लीं, एलोपैथिक, होमियोपैथिक, आयुर्वेदिक... ठीक ही नहीं हो रहा।"
हमने उनसे कहा-- "एक अत्यन्त सरल उपाय है, रोग एक दम ठीक हो जाएगा। आपके भी एकदम सुन्दर हो जाएँगे, बिल्कुल फिल्मी हीरोईन के पैरों की तरह।"
उन्होंने पूछा-- "तो फिर जल्दी बताइए ना।"
हमने बताया-- "जी! बस अपने पैरों पर जरा-सा पेट्रोल लगा कर माचिस की एक तीली जलाकर दिखा दें। सारा इन्फेक्शन, वायरस, कीटाणु, ऊपर की गन्दी चमड़ी जल कर एकदम साफ हो जाएगी। घबराइए नहीं, पैरों का कोई नुकसान नहीं होगा। बस, एक बर्षात् होने दीजिए, नीचे से इतनी नर्म नर्म, सुन्दर, गुलाबी चमड़ी निकल आएगी। आपके पैर एकदम स्वस्थ और सुन्दर हो जाएँगे।"
उनका चेहरा देखने लायक था, कोई जबाब नहीं दे पा रहे थे।
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10 Jun, 2009
धिक्कार! पर्यावरणविदो!
So called Environmentalists
धिक्कार! पर्यावरणविदो!
उन पर्यावरणविदों को धिक्कार है, जो कूड़ा-करकट जलाकर बिजली बनानेवाले संयंत्रों की स्थापना तथा प्रचालन का विरोध करते हैं। आन्दोलन करके उन्हें बन्द करवा देते हैं। किन्तु सड़कों के किनारे, घनी बस्ती व बाजार के बीच यत्र-तत्र-सर्वत्र कूड़े के ढेर इकट्ठा कर आग लगानेवाले लोगों, नगरपालिका के कर्मचारियों का विरोध नहीं करते। ऐसे तथाकथित पर्यावरण-प्रेमी चुल्लू भर पानी में डूब मरें!!!!
अक्सर देखा जाता है कि नगरपालिका के कर्मचारी ही रोज सुबह सड़कों आदि पर झाड़ू बुहारकर जगह जगह सड़क किनारे कूड़े के ढेर इकट्ठा कर उसमें आग लगाकर भाग जाते हैं। इस कूड़े में प्लास्टिक कचरा भी होता है तो कागज व गीले वनस्पतीय अपशिष्ट भी। जो घंटों तक सुलग सुलग खारा, जहरीला धुआँ तथा दुर्गन्ध फैलाते रहते हैं। कूड़ा ढोकर लेने के साधनों के अभाव में, या परिश्रम करने से कतराकर वे जहाँ तहाँ जलाकर कूड़ा नष्ट कर देने का प्रयास करते हैं। इससे निकलनेवाले जहरीले धुएँ को साँस में जाते से सर्दी, गले व आँखों की बीमारियाँ, दिल की बीमारियाँ, रक्त की अशुद्धता, हृदयरोग, पेट के रोग, हड्डियों के रोग आदि अनेकानेक बीमारियाँ फैलती रहती है। दुर्गन्ध के कारण राहगीरों, जनता को सिरदर्द, नजला, उलटी शिकायतें आदि होते रहते हैं। ऊपर से आसपास का तापमान बढ़ता है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती है।
जबकि कूड़ा-करकट को बिजली बनानेवाले संयंत्रों में वैज्ञानिक एवं तकनीकी तरीके से भट्ठियों में जलाया जाता है, हवा पम्प की जाती है, ऊँची चिमनी से धुआँ दूर आकाश में छोड़ा जाता है। जिससे बस्ती/बाजार के लोगों के सीधे श्वसन व स्वास्थ्य पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। कूड़ा जलकर ताप सृजित होता है, वाष्प बनती है, जो टर्बाईन घुमाकर बिजली बनाने में सहयोग करती है। कोयला, तेल आदि ईँधन की बचत होती है।
बैंगलोर आदि कुछ शहरों में सड़कों के किनारे, बस्ती/बाजार के बीच कूड़ा-करकट जलाने पर पाबंदी लगाई गई है। भारी जुर्माना प्रभारित किया जाता है। ऐसा सभी गाँवों और शहरों में अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए।
पर्यावरण को बचाने के लिए आवश्यक है कि राष्ट्रीय स्तर पर हर सरकारें ऐसे आदेश जारी करें कि जितने भी कारखाने आदि हैं, ताप-बिजली संयंत्र हैं, जिनमें कोयला, पेट्रोलियम आदि जलाकर ताप सृजित किया जाता है, वे अनिवार्य रूप से अपने कारखाने के कम से कम एक यूनिट में कूड़ा-करकट जलाने की सुविधा स्थापित करें।
हर नगरपालिका, नगर निगम आदि द्वारा कड़ा करकट ढोकर उन कारखानों तक पहुँचाने की अनिवार्य व्यवस्था की जाए, ऐसे कठोर आदेश जारी किए जाएँ।
भूमण्डलीय ताप वृद्धि, (global warming), सर्वजन स्वास्थ्य (public health), पर्यावरण सुरक्षा (environment safty) के लिए ऐसे कठोर आदेश जारी किए जाने और इनका कड़ाई से अनुपालन किया जाना आवश्यक है।
धिक्कार है! ऐसे तथाकथित पर्यावरणविदों को, जो कूड़ा करकट को कारखानों में जलाने का तो विरोध करते हैं, किन्तु शहरों, बस्तियों, सड़कों, बाजारों के बीच कूड़े के ढेर को जलानेवाले मूर्ख तथा आलसी लोगों को रोकते नहीं। चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए ऐसे पर्यावरण-प्रेमियों को।
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12 Jul, 2008
पूर्णविराम का प्रयोग करें, फुलस्टॉप का नहीं
Use PurnaViram not Fullstop
पूर्णविराम का प्रयोग करें, फुलस्टॉप का नहीं
अखबारों (बीबीसी, टाइम्स ग्रूप, सरिता-मुक्ता ग्रूप आदि) में पूर्णविराम की जगह Fullstop का प्रयोग सिर्फ सुविधा और शीघ्रता की दृष्टि से किया जाता है। क्योंकि कीबोर्ड लेआऊट में fullstop सामान्य की से टाइप हो जाता है, किन्तु पूर्णविराम के लिए शिफ्ट की दबाए रखकर टाइप करना पड़ता है (inscript में)। जिससे अतिरिक्त भार पड़ता है और कुछ मिलिसेकेण्ड की टंकण गति कम होती है।
किन्तु Advanced कम्प्यूटिंग यथा NLP के प्रयोगों में यह गलत है और अनेकानेक भयंकर समस्याओं को जन्म देता है---
यथा--
एक वाक्य का उदाहरण लें-
"Mr. A.B.Strong has paid a sum of Rs.5,678.50 by online payment through hdfcbank.com.”
यहाँ dot (.) का प्रयोग अनेक अर्थों में हुआ है
"Mr. A. (abbreviation) B. (abbreviation) Strong has paid a sum of Rs. (abbreviation) 5,678.(Decimal point)50 by online payment through hdfcbank.(dot)com. (full stop)”
इससे शब्दबोध में काफी परेशानी होती है। और CAT(Computer Aided Translation) हेतु वाक्यखण्ड बनाने के दौन गलत स्थान पर वाक्य विच्छेद हो जाता है।
अंग्रेजी के फुलस्टॉप (.) period का प्रयोग अनेक अर्थों में होता है
(1) Fullstop या वाक्यान्त(U002E)
(2) संक्षिप्ति चिह्न abbreviation
(3) .(DOT) वेबसाइट पतों तथा ईमेल मे विशेष पहचान हेतु
(4) Math में multiply के लिए ( 2.2=4) (5) Rs.1234.50 Decimal point के रूप में
(6) paragraph end के लिए
अन्य प्रयोग और भी हैं.... यथा dotted line के लिए......
अतः पूर्णविराम के स्थान पर फुलस्टॉप का प्रयोग करना सर्वथा गलत है...
-- अनजाने में भयंकर समस्या पैदा करना है
-- तकनीकी रूप से अवैज्ञानिक है।
इसके विपरीत हिन्दी (देवनागरी) यूनीकोड में
(1) वाक्य-अन्त हेतु पूर्णविराम/दण्ड (। - U0964) निर्धारित है।
(2) पैराग्राफ-अन्त(छन्द) हेतु डबल-दण्ड (॥ - U0965) निर्धारित है, जिसका सामान्यता कविता/पद्य में तुकबन्दी के अन्त में (पैरा के अन्त में होता है।), किन्तु हरेक पैराग्राफ के अन्त में डबल दण्ड टाइप किया जाए तो पाठ अधिक वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से परिशुद्ध होगा।
(3) संक्षिप्ति हेतु (॰ – U0966) को निर्धारित किया गया है। सामान्यतया लोग गलती से फुलस्टाप का ही प्रयोग करते हैं, "ए.बी.सिंह" लिखना गलत है, "ए॰बी॰सिंह" लिखना सही है।
(4) दशमलव चिह्न के लिए middle Dot (U00B7) का प्रयोग किया जाना चाहिए जो Numeriacl Key pad में Del key के ऊपर है। जबकि Full stop के लिए सिर्फ (U002E) कोड निर्धारित है।
अतः प्रचलित सामान्य अंग्रेजी से हिन्दी में मशीनी अनुवाद काफी कठिन हो जाता है, जबकि हिन्दी से अंग्रेजी अनुवाद अपेक्षाकृत रूप से काफी सरल होता है।
अतः लोगों को यह जानकारी देना बहुत जरूरी है कि अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर आज हिन्दी पहुँच गई है।
अतः प्रयोग में यथासम्भव सही वर्णों व चिह्नों का प्रयोग करें।
सन्दर्भ :
(1) श्री सुयश सुप्रभ जी का आलेख
(2) हिन्दी वर्तनी शोधक (spell-checker) विकासकर्ताओं के लिए कुछ सूत्र
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15 Feb, 2008
पेड़ लगाना भी अपराध है?
पेड़ लगाना भी अपराध है?
Planting a tree is also a crime?
आश्चर्य की बात है कि भारत में पेड़ काटना नहीं, बल्कि एक पेड़ लगाना अपराध है।
भारतीय दण्ड विधान की धारा के अन्तर्गत भले ही पेड़ काटने को गम्भीर अपराध माना जाता है, फिर भी गरीब आम जनता ही नहीं, सरकारी संस्थान, ठेकेदार और राजनेता मिलकर धड़ल्ले से पेड़ काट/उखाड़ कर लड़कियाँ बेच मिल बाँट खा-पी डालते हैं, उनपर कोई कार्रवाई नहीं होती। लेकिन यदि कोई व्यक्ति सड़क के किनारे ऐसे स्थान पर भी एक पेड़ लगा दे, जहाँ किसी को कोई समस्या न आए, तो भी यह एक अपराध माना जाता है। भले ही उसका उद्देश्य इतना ही हो कि शीत-ताप से रक्षा के लिए राहगीरों को थोड़ी-सी छाया उपलब्ध हो या प्रदूषण से मुक्ति के लिए यह पेड़ कार्बन-डाई-ऑक्साइड को सोख कर ऑक्सीजन प्रदान करे।
सड़क के किनारे पेड़ लगाने के लिए भी नियम/कानूनों के अनुसार नगरपालिका या नगर निगम की अनुमति लेनी पड़ती है। एक पेड़ लगाने के लिए भी बाकायदा आवेदन करना पड़ता है, महीनों तक नगर पालिका के चक्कर काटने पड़ते हैं। घूस देनी पड़ती है, फिर अनेकानेक जाँच-पड़ताल, अनेकानेक प्रक्रियाओं, औपचारिकताओं के बाद कहीं एक पेड़ उगाने की अनुमति मिल पाती है।
इस सन्दर्भ में कई प्रश्न उठते हैं कि क्या ये नियम पर्यावरण संरक्षण या पारिस्थितिकी विकास के लिए भयंकर बाधक नहीं? क्या इन नियमों, प्रक्रियाओं को सरल नहीं बनाया जा सकता? क्या किसी व्यक्ति को आवेदन करने पर पेड़ लगाने की अनुमति उसे घर बैठे नहीं मिल सकती? क्या तुक है ऐसे कठोर नियम-कानून बनाने की? क्या यह मानवता के विरोधी नहीं हैं?
उल्लेखनीय है कि पेड़ केवल गर्मी से ही रक्षा नहीं करते, बल्कि शीतलकाल में ठण्ड कम करने में भी मदद करते हैं। सम-शीतोष्ण जलवायु को संतुलित करते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, हाल ही, में जो संसार भर में शीत लहर का प्रकोप हुआ, जिसे अखबारों ने फिर से हिमयुग की शुरूआत बताया, जिस ग्लोबल वार्मिंग तथा जलवायु परिवर्तन के भयंकर खतरों से आज विश्व गुजर रहा है, उनके कारणों में से एक प्रमुख कारण है, बड़े वृक्षों की भीषण हानि, अन्धाधुन्ध बनों की कटाई।
अतः आज जरूरत है वृक्षारोपण, वृक्षों के संरक्षण, वृक्षों की सिंचाई और सुरक्षा के लिए हर प्रकार का प्रोत्साहन देने की। अधिकाधिक लोगों को इस कार्य के लिए प्रेरित करने की। काश कि आम जनता, पर्यावरणविद्, पर्यावरण-प्रेमी मिल कर इस धरती को बचाने के लिए वृक्षारोपण हेतु अनुमति पाने के लिए नगरपालिका के चक्कर काटने के इन नियमों को संशोधित करवाने के लिए मिल कर आन्दोलन करें।
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हरिराम
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