
विण्डोज-98 में युनिकोड सक्षमता लाना
Unicode Enabling in Win98
श्रीश जी ने अपने चिट्ठे ईपण्डित पर तथा इस कड़ी पर विण्डोज-98 में युनिकोड हिन्दी की कार्यक्षमता के सम्बन्ध में कुछ ज्वलन्त मुद्दे उठाए हैं, जिनके कारण-दर्शाते हुए निवारण हेतु कुछ उपाय यहाँ दर्शाए जा रहे हैं।
पुराने कम्प्यूटरों में, जिनमें विण्डोज 95/98/ME आपरेटिंग सीस्टम् होता है, उनमें अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकृत वर्ण-कूट (character-code) युनिकोड ( UNICODE ) का समर्थन नहीं होता। ये सिर्फ ASCII (American Standard Code for Information Interchange) कोड तथा इस पर आधारित विभिन्न कोड-पेज की लिपियों में ही काम किया जा सकता है। विशेषकर हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में पाठ-संसाधन (Text processing) के लिए 8-बिट वाले हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के ट्रू-टाइप (TTF) फोंट से ही काम चलाना पड़ता है। जिनमें कई कमियाँ होती है--
1. पाठ को वर्णक्रमानुसार सजाने (alphabetical sorting) नहीं की जा सकती, क्योंकि सीमित स्थान के कारण इनमें केवल वर्णों/अक्षरों के टुकड़ों (glyphs) को शामिल करके येन-केन प्रकारेण हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में पाठ संसाधन, प्रदर्शन व मुद्रण करना पड़ता है।
2. इण्टरनेट, वेबसाइट, या पर पाठ प्रत्यक्ष रूप से डालने पर लक्ष्यित पाठके कम्प्यूटर में भी वही फोंट संस्थापित (installed) होना आवश्यक होता है। इस संस्थापना के चक्कर से बचने के लिए विकल्प प्रक्रिया का आविष्कार हुआ था, जिसमें TTF फोंट के dynamic प्रारूप (.eot) को वेब-सर्वर में स्थापित करना पड़ता है ताकि उक्त वेबसाइट को खोलने के साथ वे फोंट भी स्वतः डाउनलोड/संस्थापित होकर फोंट विशेष में पाठ को प्रदर्शित करें।
3. हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं में सीधे ईमेल नहीं की जा सकती, सिर्फ अटैचमेंट रूप में भेजी जा सकती है। और वह फोंट भी साथ में अटैच करके भेजना पड़ता है। प्राप्तकर्ता के अपने कम्प्यूटर में उक्त फोंट को संस्थापित करने के बाद ही वह ई-मेल के भाषाई पाठ को पढ़ पाता है। सीधे ई-मेल की भी जाए तो वह ASCII के ही सुपर-सेट या पर लगे पैबन्द के रूप में ही होती है।
4. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की अनुकूलता (International Compatibility) नहीं मिल पाती।
5. हर भाषा के लिए अलग-अलग फोंट का उपयोग करना पड़ता है। यदि चुने गए पाठ के लिए कोई अन्य फोंट (या अंग्रेजी या अन्य भाषा का फोंट) चयन पर माउस क्लिक हो जाए तो पूरा पाठ कूड़ा (Garbage) बनकर प्रकट हो जाता है।
प्रश्न : इसका क्या कारण है? युनिकोड समर्थन पुराने कम्प्यूटरों में क्यों नहीं हो सकता?
इसका कारण है कि पुराने कम्प्यूटरों की क्षमता(Capacity), गति(speed) और स्मृति (memory) काफी कम होती थी। Windows 95/98/ME आपरेटिंग सीस्टम् 8बिट वर्ण-कूट-समूह (character code sets) पर आधारित थे। जबकि युनिकोड 16बिट कूट है। युनिकोड से संसाधन के लिए कम्यूटर में अधिक क्षमता, गति, शक्ति और स्मृति की जरूरत होती है।
प्रश्न : 8-बिट और 16-बिट में कितना अन्तर है?
उत्तर : एक सामान्य व्यक्ति तो यही कहेगा कि 8-बिट और 16-बिट में सिर्फ दो-गुना का अन्तर होगा। 8 गुणा 2 अर्थात् 16 हुए। किन्तु, यह सच्चाई जानकर आम लोग आश्चर्य में पड़ जाएँगे कि 16-बिट क्षमता 8-बिट क्षमता से पूरी 256 गुणा अधिक होती है। इसको समझाने के लिए बिट-प्रक्रिया को समझना होगा। बिट कम्प्यूटर की संसाधन क्षमता की ईकाई है जो द्विघात-समीकरण पर आधारित प्रमेय प्रणाली अनुसार क्रियाशील होती है। कम्प्यूटर की आन्तरिक प्रणाली सिर्फ दो ही संकेत (या अंक) समझती है, 0 या 1, अर्थात् हाँ या नहीं, अर्थात् ऑन या ऑफ। दूसरे शब्दों में इसे द्वैतवाद (Binary) भी कह सकते हैं। सर्किट में इलेक्टॉनिक विद्युत प्रवाह के ऑन होने को 1 और ऑफ होने को 0 मानकर ही समस्त प्रचालन क्रिया सम्पन्न होती है। अतः बिट का हिसाब इस प्रकार होगा।
0 बिट = 2 घात 0 = 2**0 = 1
1 बिट = 2 घात 1 = 2**1 = 2 अर्थात् 0 या 1 में से कोई एक
2 बिट = 2 घात 2 = 2**2 = 4
3 बिट = 2 घात 3 = 2**3 = 8
4 बिट = 2 घात 4 = 2**4 = 16
5 बिट = 2 घात 5 = 2**5 = 32
6 बिट = 2 घात 6 = 2**6 = 64
7 बिट = 2 घात 7 = 2**7 = 128
8 बिट = 2 घात 8 = 2**8 = 256 (दो सौ छप्पन)
अर्थात् 2*2*2*2*2*2*2*2 अर्थात् 2 को 2 से 8 बार गुणा करने पर उपलब्ध होगा।
8-बिट(Bit) = 1-बाईट(Byte)
9 बिट = 2 घात 9 = 2**9 = 512
10 बिट = 2 घात 10 = 2**1 = 1024
11 बिट = 2 घात 11 = 2**11 = 2048
12 बिट = 2 घात 12 = 2**12 = 4096
13 बिट = 2 घात 13 = 2**13 = 8192
14 बिट = 2 घात 14 = 2**14 = 16384
15 बिट = 2 घात 15 = 2**15 = 32768
16 बिट = 2 घात 16 = 2**16 = 65536 अर्थात् 256*256 (दौ सौ छप्पन गुणा दो सौ छप्पन)
अर्थात् 2 को 2 से 16 बार गुणा करने से उपलब्ध होगा।
16-बिट(Bit) = 2-बाईट(Bytes)
8-बिट कोड तथा फोंट 1-बाईट के होते हैं, जबकि युनिकोड कूट तथा ओपेन टाइप फोंट 2-बाईट वाले होते हैं। पुराने कम्प्यूटर 2 बाईट वाले कोड को दो अलग अलग कोड समझ लेते हैं और सारा पाठ तथा प्रोग्राम गड़बड़ हो जाता है। कम्प्यूटर का सारी प्रणाली ही ठप्प हो सकती है।
अतः 16-बिट कूट 8-बिट कूटों से 256 गुणा अधिक क्षमता के होते हैं। 8-बिट फोंट-कोड में अधिकतम कूट-स्थान 256 होते हैं तो 16-बिट कूट में अधिकतम कूट-स्थान 65536 होते हैं।
प्रश्न : युनिकोड विभिन्न भाषाओं के अक्षरों की अनुपमता को बनाए रखने में कैसे समर्थ है? विण्डोज-98 में युनिकोड की सम्भालने की क्षमता क्यों नहीं है?
उत्तर :
8-बिट ट्रू-टाइप फोंट में कम्प्यूटर के 32 संचालन आदेशों (Control Command Codes) को मिलाकर कुल 256 कोड-स्थान के अन्दर ही किसी एक भाषा के सारे अक्षरों को सीमित करना पड़ता था। जबकि युनिकोड में कुल 65536 स्थान उपलब्ध होने के कारण एक ही फोंट में संसार की सभी भाषाओं की लिखित लिपियों के मूल अक्षर शामिल होने के बावजूद भी कुछ स्थान अभी तक खाली है।
इसलिए एक ही फोंट में संसार की समस्त लिपियों के अक्षर शामिल हो पाने के कारण किसी अन्य भाषा या लिपि में कम्प्यूटर पर कार्य करने के लिए फोंट बदलने की आवश्यकता नहीं होती। हर लिपि के अक्षर विशेष का एक अनुपम (Unique) कोड नम्बर निर्धारित होता है, जो किसी अन्य भाषा/लिपि के अक्षर का नहीं हो सकता।
अन्तर्राष्ट्रीय फोंट Arial Unicode MS
उदाहरण के लिए देखें माईक्रोसॉफ्ट के ऑफिस एक्सपी पैकेज के बहुभाषी/अन्तर्राष्ट्रीय फोंट के विकल्प के साथ संस्थापित होनेवाला Arial Unicode MS फोंट। जिसकी फाइल का आकार (size) लगभग 23 मेगावाइट (MB) की है। इसके कुछ स्क्रीनशॉट यहाँ दिए जा रहे हैं:
अंग्रेजी अक्षर
अरबी एवं हिन्दी अक्षर
कन्नड़, तमिल एवं मलयालम अक्षर
चीनी, जापानी एवं कोरियाई (CJK= Chinese, Japanese, and Korean) अक्षरयहाँ उल्लेखनीय है कि चीनी, जापानी और कोरियाई तीन राष्ट्रों की तीन भाषाओं को मिलाकर एकीकृत करके एक कोड की स्थापना की गई है। यूनिकोड मानकों में कूट-निर्धारित (encoded) CJK मूल अक्षरों कुल संख्या 29,245 है तथा बाद में शामिल 71,578 युनिफाइड आईडियोग्राफ्स 3 अतिरिक्त ब्लॉक में शामिल किए गए हैं। जबकि देवनागरी के सिर्फ 109 वर्णकूट ही शामिल किए गए हैं।
उपरोक्त Arial Unicode MS Font का लगभग 80% स्थान अकेले CJK के अक्षर घेर लेते हैं।
यदि इस फोंट को विण्डोज 98 आपरेटिंग सीस्टम वाले कम्प्यूटर में स्थापित कर दिया जाए तो चूँकि इस कम्प्यूटर में सामान्यता 64 मेगाबाट मेमोरी (MB RAM) ही होती है, तो उसमें से लगभग 40 प्रतिशत मेमोरी यही अकेला फोंट हजम करेगा। अन्य अनुप्रयोगों के लिए कम्प्यूटर में आवश्यक मेमोरी नहीं रहेगी और कम्प्यूटर हैंग हो जाएगा।
इसके विपरीत 8-बिट फोंट में भाषा/लिपि विशेष में कार्य करने के लिए कोड-पेज निर्धारित किए गए थे, जिनके आधार पर ही कार्य होता था। कोड-पेज बदलने पर पूर्व-टंकित पाठ दूसरी भाषा के कूटों में बदल कर कूड़ा-करकट जैसा (garbage) बन जाता था। उदाहरण के लिए देखें विण्डोज 98 का Arial.ttf फोंट जिसका आकार (size) लगभग 50 किलोबाइट (KB) का है।
अर्थात् विण्डोज एक्सपी का Arial Unicode MS फोंट विण्डोज 98 के Arial.ttf फोंट से आकार में लगभग 480 गुणा बड़ा है।
अतः युनिकोड अनुप्रयोगों को यदि Windows 95/98/ME में किसी प्रकार चलाने का प्रयास किया जाए तो यह उसी प्रकार भारी पड़ेगा, जैसा कि यदि एक रेलवे वैगन की क्षमता 51.2 मेट्रिक टन भार की होती है, तो उसमें लाद कर लाए गए गेहूँ को केवल 2 क्विंटल क्षमता वाले साईकल रिक्शा पर ढोकर ले जाना पड़े। अर्थात् रिक्शा 200 किलोग्राम प्रति खेप में अर्थात 2 बोरी गेहूँ ढोएगा और 51.2 मे.टन अर्थात् 5120 क्विंटल गेहूँ को ढोने के लिए 256 खेपों में अर्थात् दो दो क्विंटल करते हुए 256 बार ढोना पड़ेगा।
प्रश्न : विण्डोज-98 में युनिकोड में हिन्दी (तथा अन्य भारतीय भाषाओं) में में येन-केन-प्रकारेण ही सही, किन्तु कैसे काम किया जाए?
उत्तर :
(1) हिन्दी तथा आवश्यक भाषा का सही उपयुक्त ओपेन टाइप ttf फोंट संस्थापित करें।
सामान्यतया कोई भी व्यक्ति एक साथ संसार की सभी भाषाओं में काम नहीं करता है, इसलिए वह अन्तर्राष्ट्रीय फोंट Arial Unicode MS को संस्थापित करने के वजाए केवल उन्हीं भाषाओं, जिनमें उसे अधिकतर काम करना पड़ता है, के ओपेन टाइप फोंट इन्स्टाल करना सुचारु संचालन के लिए उपयुक्त होता है । अतः कम्प्यूटर में कम से कम फोंट इन्स्टॉल करके मेमोरी कैच का सही प्रबन्धन किया जा सकता है। Raghu8.ttf हिन्दी का एक ओपेन टाइप फोंट है और यह विण्डोज-98 के अनुकूल भी बनाया गया है। यह फोंट सै-डैक, मुम्बई (पूर्व एन.सी.एस.टी.) द्वारा विकिसित किया गया था तथा GPL लाईसैन्स के अन्तर्गत निःशुल्क तथा मुक्त रूप से उपलब्ध कराया गया। इस फोंट के सहारे विण्डोज-98 में युनिकोड में हिन्दी में काम चलाया जा सकता है। इसी का नया वर्सन विण्डोज 2000/XP/2003 के लिए Raghindi.ttf नाम से जारी हुआ। जो बीबीसी हिन्दी के वेबसाइट पर डाउनलोड हेतु उपलब्ध है।
अब भारत सरकार के डैटा सेण्टर वेबसाइट पर भी विण्डोज-98 के लिए भी अनेक हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के फोंट निःशुल्क डाउनलोड हेतु उपलब्ध कराए गए हैं।
(2) उपयुक्त वर्ड प्रोसेसर स्थापित करें
विण्डोज-98 में हिन्दी में काम करने के लिए सबसे पहला सॉफ्टवेयर वर्डप्रोसेसिंग सॉफ्टवेयर विकसित हुआ था अक्षरमाला जो ज्यादा महंगा नहीं है। किन्तु इसके लिए पहले विण्डोज-98 के कम्प्यूटर में इण्टरनेट एक्सप्लोरर-6.0 (IE6.x) ब्राऊजर को इन्स्टॉल करना जरूरी होता है। इसमें हिन्दी में अनेक सुविधाएँ, शब्दकोश आदि उपलब्ध हैं।
(3) Internet Explorer-6 स्थापित करें
विण्डोज-98 के साथ डिफॉल्ट रूप में IE5 इन्स्टॉल होता है। IE5 से IE6 अपडेट करने के लिए कम्प्यूटर में सर्वनिम्न 128 मेगाबाइट की मेमोरी होना आवश्यक होता है। अर्थात् कम से कम 64 MB मेमोरी की एक चिप ा या 128 MB वाली एक अतिरिक्त चिप खरीद कर संस्थापित करना। इसमें अतिरिक्त लागत आती है। जिसे वहन कर पाना सबके लिए सम्भव नहीं है।
IE6 में विण्डोज-2000 आपरेटिंग सीस्टम के युनिकोड को सक्षम करनेवाले प्रोग्राम-कूट (unicows.dll आदि) अन्तःनिर्मित रूप से (inbuilt) शामिल हैं, जिससे युनिकोड समर्थित संसार की विभिन्न भाषाओं/लिपियों में प्रकाशित वेबसाइट की सामग्री को पढ़ने की सुविधा इण्टरनेट उपयोगकर्ताओं को मिल गई। हिन्दी तथा अन्य भारतीय लिपियों में युनिकोड में प्रकाशित वेबपृष्ठ भी विण्डोज-98+IE6 में पढ़े तो जा सकते हैं, किन्तु स्वरूपण-क्रम या प्रदर्शन (rendering) गलत होता था। "किस्त" की जगह "कस्ति" और "कार्य" की जगह "कार्य" प्रकट होता था।
क्योंकि भारतीय भाषाओं में अक्षरों का क्रम-निर्धारण काफी कुछ अवैज्ञानिक/तर्कहीन तथा जटिल है। युनिकोड अक्षर-कूटों में पाठ संसाधन तथा भण्डारण होता है, जबकि पारम्पिक रूप में स्क्रीन पर प्रदर्शन तथा मुद्रण करने के लिए ओपेन टाइप फोंट में अन्तःनिर्मित अक्षरों के टुकड़ों या संयुक्ताक्षरों (glyphs) का ही प्रयोग करना करना पड़ता है। इनके मध्य विण्डोज-2000/XP/2003/Vista आदि आपरेटिंग सीस्टमों में अन्तःनिर्मित युनिकोड लिपि संसाधक (Unicode Script Processor, Uniscribe) को निरन्तर उड़ते-उड़ते कलाबाजी करनी (on-the-fly twisting) पड़ती है।
(4) युडिट सॉफ्यवेयर स्थापित करनासबसे अनुकूल
पुराने कम्प्यूटरों विण्डोज-95/98/ME में युनिकोड में संसार की सभी भाषाओं में काम करने की क्षमता देने वाला सबसे अच्छा तथा निःशुल्क उपलब्ध सॉफ्टवेयर युडिट है। इसके लिनक्स तथा विण्डोज दोनों वर्सन उपलब्ध है। यह एक स्वतन्त्र प्रोग्राम होने के कारण विण्डोज की किसी सीस्टम फाइल का सहारा नहीं लेता। तथा DOS मोड में भी चल सकता है। इसमें ISCII तथा कुछ 8-बिट ttf फोंट के पाठ को युनिकोड में बदलने की सुविधा (converter) भी शामिल है। साथ ही इसमें उपयोक्ता (user) के द्वारा अपनी सुविधानुसार कीबोर्ड-लेआउट (KeyMap) बनाने की सुविधा भी शामिल है। हालांकि इसका संस्थापन व अनुकूलन (configuration & customization) एक सामान्य उपयोक्ता के लिए थोड़ा कठिन लग सकता है। किन्तु कम्प्यूटर प्रोग्रामरों के लिए यह सबसे अच्छा पसंदीदा प्रोग्राम रहा है। क्योंकि यह ओपेन सोर्स है और उपयोक्ता अपनी-सुविधा तथा अपनी जरूरत के मुताबिक इसमें हर प्रकार का बदलाव भी कर सकता है।
(5) अन्य औजार
IBM द्वारा भी एक Indic IME का विकास करके अपने एक वेबसाइट पर जारी किया गया था। लेकिन उसके द्वारा केवल IE6 तथा बाद के ब्राउजरों के Edit Box में भारतीय भाषाओं में टंकण या पाठ-प्रविष्टि की जा सकती थी। और वह भी पारम्परिक रूप में हिन्दी आदि का प्रदर्शन करने में असमर्थ था। क्योंकि आपरेटिंग सीस्टम मे विण्डोज-98 में अन्तःनिर्मित युनिकोड संसाधक शामिल करना तकनीकी रूप से सम्भव न होने के कारण यह बेकार-सा रहा। अतः लोकप्रिय नहीं हो पाया और इसे रद्द कर दिया गया।
अन्य कई प्रकार के औजार भी आविष्कृत हुए थे तथा येन-केन-प्रकारेण प्रयोग करके युनिकोड समर्थित लिपियों में पाठ का संसाधन करने की सुविधा प्रदान करते थे।
(6) माईक्रोसॉफ्ट का औजार
माइक्रोसॉफ्ट द्वारा भी कुछ सॉफ्टवेयर प्रोग्रामरों को विण्डोज-98 में युनिकोड की सुविधा प्रदान करने के लिए MSLU (Microsoft Layer for Unicode on Windows 95/98/Me Systems) डाउनलोड हेतु उपलब्ध कराया गया है, जो यहाँ उपलब्ध है। किन्तु भारतीय भाषाओं के मामले में यह भी अधूरा रहा। पारम्परिक रूप में प्रदर्शन (Rendering) की समस्या बनी रहने के कारण यह पूरा समाधान नहीं दे पाया है।
वर्तमान सन्दर्भ में विण्डोज-98 की उपयोगिता
सन् 2004-2005 तक कई पुराने सॉफ्टवेयर ऐसे थे, जो 16 बिट प्रोग्राम थे, अतः विण्डोज-एक्सपी पर नहीं चल पाते थे (32बिट API होने के कारण)। अतः मजबूरन् लोग विण्डोज-98 का उपयोग करते थे। किन्तु आज लगभग सभी कम्प्यूटर प्रोग्रामों के नए 32-बिट वर्सन निकल गए हैं, अतः विण्डोज-98 को विण्डोज-एक्सपी या विस्टा में अपग्रेड करना ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है।
पुराने कम्प्यूटरों का बही-मूल्य शून्य होना
विण्डोज-98 के अब बेकार सिद्ध हो जाने का एक कारण और भी है। 1998-2000 के बीच खरीदे गए कम्प्यूटरों का बही-मूल्य(Book-value) 2005-06 तक शून्य हो गया है। क्योंकि लेखा-सिद्धान्तों (Accounting Principle rules) के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक सामानों का मूल्यह्रास (Depreciation) प्रतिवर्ष 17 से 20 प्रतिशत की दर से होता है। अतः 2006-07 में अधिकांश सरकारी संस्थानों के भी विण्डोज-98 वाले पुराने कम्प्यूटरों को रद्द करके उनके स्थान पर एक्सपी या विस्टा आपरेटिंग सीस्टम् वाले नए कम्प्यूटर खरीद लिए गए हैं या धड़ाधड़ खरीदे जा रहे हैं।
सर्वश्रेष्ठ उपाय
किन्तु सामान्य कम्प्यूटर उपयोक्ता या विद्यार्थीगण जो निम्नतम खर्च पर हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की कम्प्यूटिंग करना चाहते हैं, या ऐसे लोग जो कम्प्यूटरों को अपग्रेड करने हेतु कोई व्यय करने में समर्थ नहीं हैं, उनके लिए सबसे अच्छा तरीका यह है कि वे निम्नलिखित IME में से किसी एक का उपयोग करके पहले 8-बिट फोंट में पाठ प्रविष्टि या संसाधन करें--
ITrans
Baraha
8-Bit TTF font
WX
Roman Transliteration Scheme
फिर उसे Yudit के converter या अन्य उपलब्ध कोड-परिवर्तन करनेवाले औजारों (Tools & Utilities) का उपयोग करके Unicode कूटों में बदल लें और इण्टरनेट तथा ई-मेल आदि के लिए उपयोग करें।
मुद्रण तथा प्रकाशन उद्योग की मजबूरी
सर्वोपरि मुद्रण एवं प्रकाशन उद्योग या अखबारों को फिलहाल 8-बिट फोंट्स का ही सहारा लेना पड़ता है। क्योंकि Microsoft Publisher (2000/XP/2003/2007) के अलावा किसी डिजाइन तथा पेजलेआउट करनेवाले किसी प्रोग्राम (Adobe Pagemaker, Photoshop, InDesign, Illustrator, तथा Macromedia Freehand आदि) में हिन्दी (and Indic) युनिकोड का समर्थन उपलब्ध नहीं है। अतः समाचारों पत्रों को अपने मुद्रित अखबार को 8-बिट फोंट में मुद्रित करना पड़ता है तथा इसके इण्टरनेट वेब-संस्करण को युनिकोड में परिवर्तित करके वेबसाइट पर प्रकाशित करना पड़ता है। इसके कारण तथा निवारण हेतु कुछ उपाय अगले लेख में दिए जाएँगे।
3 Aug 2007
विण्डोज-98 में युनिकोड सक्षमता लाना
Posted by
हरिराम
at
18:16
13
टिप्पणियाँ
Labels: Indic_computing, तकनीक, भारतीय-भाषा-संगणन
11 Jul 2007
रोमन लिपि में लिप्यन्तरण हेतु मानक-निर्धारण
Standardisation of Roman Transliteration of Indic Scripts
भारतीय लिपियों के पाठ को रोमन लिपि में लिप्यन्तरण हेतु मानकों का निर्धारण
देवनागरी तथा अन्य भारतीय लिपियों के पाठ को रोमन लिपि में प्रकट करके येन-केन प्रकारेण कम्प्यूटर तथा इण्टरनेट पर संचार करने के लिए अनेक पद्धतियाँ प्रचलित हैं, जिनमें अविनाश चोपड़े जी द्वारा विकसित आईट्रान्स (ITrans) सबसे ज्यादा प्रचलन में रही है। इसके साथ विनय जैन जी का हिट्रान्स (Hitrans) भी काफी लोकप्रिय हुआ है। क्योंकि यह हाथोंहाथ (Instant) और पूर्वटंकित पाठ दोनों को युनिकोड देवनागरी में परिवर्तित करने की सुविधा प्रदान करता है। साथ ही इसका यूजर इण्टरफेस भी सरल और सुबोध है।
ओंकारानन्द आश्रम, हिमालय द्वारा विकसित आईट्रान्सलेटर (ITranslator) संस्कृत पाठ को रोमन लिपि (Roman) में तथा ISCII, True Type 8 Bit फोंट-विशेष तथा युनिकोड (तीनों रूपों) में तत्काल बदलने के लिए बहुत ही उपयोगी माना गया है।
वर्तमान भारतीय भाषाओं के कम्प्यूटर पर संसाधन के लिए दो ही मानक उपलब्ध हैं। (1) 1991 में भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा मानकीकृत (IS 13194:1991) परिशोधित इस्की (ISCII-1991) , (2) युनिकोड (Unicode)
8-Bit ISCII का कोड चार्ट यह है:
इनमें इस्की मानक तो इण्टरनेट के प्रचलन के बाद पुराने तथा बेकार (outdated) हो गए हैं, क्योंकि ये 8 bit ASCII के ही सुपरसेट थे। अर्थात् ASCII के ऊपर पैबन्द की तरह चिपके थे। ISCII सिर्फ भारत के अन्दर तक सीमित रहा। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ISCII के लिए कोई अलग कोडपेज (CodePage) निर्धारित नहीं हो पाया था।
इस्की कूटों के ही एक उपखण्ड (Subset) के रूप में रोमन लिपि में लिप्यन्तरण (Roman Script Transliteration) के लिए एक मानक निर्धारित किया गया था। जो ISCII दस्तावेज के ANNEX-F में दिया गया है। ये मानक 1988 में नेशनल लाईब्रेरी, कोलकाता द्वारा निर्धारित योजना पर आधारित थे। इसमें भारतीय लिपियों के पाठ को रोमन लिपि में लिख पाने के लिए रोमन लिपि के कुछ अक्षरों के ऊपर कुछ विशेष चिह्न लगाकर प्रकट किया गया था:
किन्तु यह सभी लिप्यन्तरण प्रणालियाँ 8-bit फोंट्स पर आधारित होने के कारण इनके प्रदर्शन तथा मुद्रण के लिए फोंट-विशेष का उक्त कम्प्यूटर में होना अनिवार्य होता था। इस कारण इण्टरनेट के लिए सक्षम साबित नहीं हो पाईँ और युनिकोड के आविर्भाव के बाद ये स्वतः मृत प्रायः हो गईं। क्योंकि इण्टरनेट एक्सप्लोर 6.0 (IE 6.x) के बाद युनिकोडित लिपियों के फोंट्स इसकी सीस्टम फाइलों में अन्तःनिर्मित (inbuilt) होते हैं। किसी प्रकार के फोंट्स को डाउनलोड तथा इन्स्टॉल करने का झमेला नहीं रहता।
युनिकोड दो बाईट वाली 16 बिट प्रणाली होने के कारण पुराने कम्प्यूटरों तथा पुराने आपरेटिंग सीस्टम्स पर नहीं चल पाती। युनिकोड में भारतीय लिपियों में वर्णक्रमानुसार छँटाई (Sorting), सूचकांकन (Indexing) तथा डैटाबेस प्रबन्धन (Database Management) में अनेक जटिल समस्याएँ हैं। भाषाओं की प्रोसेसिंग में भी कई बड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ता है। अतः ISCII और Unicode ये दोनों ही भारतीय भाषाओं की कम्प्यूटिंग के लिए पूर्णतया सरल एवं उपयुक्त नहीं हैं। यहाँ तिमंजिली सड़क पर चलने की तरह या तीन नावों में पैर रख कर समुद्र पार करने की तरह ही भारतीय भाषाओं का संसाधन (Processing) करना पड़ता है।
(1) कुंजीपटल (Key-board Input - IME) अंग्रेजी के 26+26=52 अक्षरों +अन्य चिह्नों के 101 या 104 कुंजियों वाले कीबोर्ड पर ही भारतीय भाषाओं के टंकण के लिए योजना, जो "Replace this key to that" सिद्धान्त पर आधारित है। उदाहरण के लिए यदि आपको देवनागरी का 'अ' अक्षर टाइप करना है, तो इन्स्क्रिप्ट की-बोर्ड-लेआउट में कुंजीपटल पर D (केपिटल डी अर्थात Shift key दबाए रखकर d) टाइप करना होता है। 'D' का ASCII Hex Code है '44', कम्प्यूटर में स्थापित Indic IME प्रोग्राम इसे युनिकोड की दोबाइट में बदलकर स्क्रीन पर प्रकट करेगा, जिसका युनिकोड कोड है 'U+0905'.
(2) कम्प्यूटर के आन्तरिक संसाधन के लिए सीमित Unicode में encoded अक्षरों/चिह्नों की सीमाओं के अन्दर संसाधन, जो पारम्परिक रूप में प्रकट होनेवाली देवनागरी लिपि से बिल्कुल अलग होंगें, सिर्फ मूल अक्षर ही इसमें शामिल किए गए हैं। इन्हें के अन्दर समग्र संसाधन करना होगा।
(3) पारम्परिक/प्रचलित रूप में देवनागरी(तथा अन्य भारतीय लिपियों) के अक्षरों, संयुक्ताक्षरों, मात्राओं युक्त अक्षरों को स्क्रीन पर प्रदर्शित करने (rendering) और कागज पर मुद्रित करने (Printing) के लिए लिए ओपेन टाइप फोंट्स में (Open Type Fonts ) Glyph Substitution, Glyph Positioning इत्यादि जैसे जटिल algorithms का प्रयोग
अतः भारतीय आई.आई.टी. संस्थानों द्वारा उन्नत कम्प्यूटर संसाधन (Advannced Computing) तथा प्राकृतिक भाषा संसाधन (Natural Language Processing) के लिए WX encoding को विकसित करके इनका उपयोग करना पड़ा है। इसका नामकरण WX देने का कारण यह था कि सामान्यतः अंग्रेजी भाषा में W और X से आरम्भ होने वाले शब्दों की संख्या सबसे कम होती है। यह पद्धति एक अक्षर के लिए सिर्फ एक कुँजी प्रणाली पर आधारित है, ताकि कम से कम परिश्रम और कम से कम समय में भारतीय लिपियों में कम्प्यूटर में पाठ प्रविष्टि या टाइप किया जा सके।
इसमें मुख्यतः t=ट, T=ठ, d=ड, D=ढ का प्रयोग किया गया तथा w=त, W=थ, x=द, X=ध का प्रयोग किया गया है। क्योंकि सामान्यतया अंग्रेजी (Roman) लिपि में हिन्दी पाठ को लिखते वक्त W और X का प्रयोग बहुत कम होता है। व के लिए w के बदले v=व का प्रयोग किया जाता है
अतः कम्प्यूटर के आन्तरिक संसाधन तथा स्क्रीन पर प्रदर्शन में एकमुखी/एकमंजिली योजना के लिए अंग्रेजी के रोमन अक्षरों की सीमाओं के अन्दर ही कार्य करना सरल और सस्ता होता है। इसीलिए कई विद्वान भारतीय भाषाओं का भी लेखन और संसाधन रोमन लिपि में करने के पक्षधर रहे हैं। इनमें श्री मधुकर गोगाते जी का नाम सबसे आगे लिया जा सकता है।
किन्तु इण्टरनेट पर विश्वस्तरीय संचार के लिए युनिकोड कूट ही एकमात्र मानकीकृत बहुभाषी कूट उपलब्ध हैं। बिना युनिकोड का सहारा लिए विश्व की विभिन्न भाषाओं/लिपियों में कुछ भी संचार कर पाना लगभग असम्भव है।
युनिकोड के आविर्भाव के बाद युनिकोड में भारतीय लिपियों के मध्य लिप्यन्तरण के लिए सबसे पहले कार्य किया था आलोक कुमार जी ने। उन्होंने ये सुविधाएँ गिरगिट पर उपलब्ध कराईँ। इसी का एक और वर्सन
यहाँ भी उपलब्ध है। इसके वेबपृष्ठ को सेव्ह करके ऑफ लाइन भी उपयोग किया जा सकता है। तथा पहले से टंकित पाठ को भारतीय लिपियों के मध्य लिप्यन्तरित किया जा सकता है।
किन्तु इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया पीयूष भट्ट जी ने भोमियो पर। इन्होने देवनागरी तथा भारतीय भाषाओं में संसाधित किसी भी समग्र वेबसाइट को भी कुछ क्षणों में ही तत्काल इच्छित लिपि में बदलकर इण्टरनेट पर पाठक को पढ़ पाने की आश्चर्यजनक जादुई सुविधा उपलब्ध कराई है। अनेक हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के चिट्ठाकारों (ब्लॉग-लेखकों) तथा कई वेबसाइटों पर भोमियो के लिप्यन्तरण उपकरण की कड़ी जोड़ी जा चुकी है। जहाँ पर क्लिक करते ही इच्छित लिपि में वह वेबपृष्ठ बदलकर प्रकट हो जाता है।
हालांकि लिप्यन्तरित पाठ शत-प्रतिशत सही नहीं हो पा रहा है, जिसका कारण युनिकोड में कुछ भाषाओं के अक्षरों के निर्धारण में रह गईं मूलभूत गलतियाँ तथा भाषा-विशेष के लिए कुछ अक्षरों को अभाव हैं।
भोमियो पर भारतीय भाषाओं के पाठ को रोमन लिपि में बदलकर प्रकट करने की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। इसके द्वारा लिप्यन्तरित रोमन पाठ यथासम्भव सरल तथा प्रचलित रोमन शब्द-धारा में प्रदर्शित होता है। किन्तु इसमें कुछ गलतियाँ/त्रुटियाँ रहना स्वाभाविक है, क्योंकि रोमन लिपि भारतीय भाषाओं के पाठ को शत-प्रतिशत शुद्ध रूप में प्रकट कर पाने में सर्वथा असमर्थ है।
रोमन लिपि में भारतीय भाषाओं/लिपियों के पाठ को लिखने/कम्प्यूटर पर संसाधित करने के लिए अभी तक उपलब्ध अनेक पद्धतियों में आपस में तालमेल (compatibilty) न होने के कारण उपयोगकर्ताओं को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। एकरूपता के अभाव में सूचनाओं के संचार में भारी लागत, भारी हानि भी उठानी पड़ती है। अतः इसका भी मानकीकरण (Standardisation) किया जाना आवश्यक है।
अतः एक सबसे उपयुक्त पद्धति को मानकीकृत करने के लिए विभिन्न भारतीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय तकनीकी विद्वानों द्वारा काफी प्रयास किए गए हैं। तदनुरूप 2002 में भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन "भारतीय भाषाओं के लिए प्रौद्योगिकी विकास" अनुभाग द्वारा ऐसे एक मानक "INSROT" (Indian Script to Roman Transliteration) के मसौदे (Draft) जारी किए गए थे। जिनका विभिन्न लोगों के फीडबैक के बाद परिशोधन भी किया गया है।
सभी विद्वान यदि इसे देखें-परखें और सुधार हेतु अपने सुझाव तथा समर्थन भेजें तो इसका मानकीकरण जल्दी किया जा सकता है।
Itrans, Hitrans, WX, इत्यादि पद्धतियों में Roman Text लिखने में सबसे बड़ी असुविधा होती थी कुछ वर्ण विशेष के लिए बड़े अक्षरों (Capital letters) का प्रयोग किए जाने से। क्योंकि MS Word, Pagemaker तथा अन्य कुछ प्रोग्रामों में यदि select all चयन करके Change Case (All Caps या All Small या First letter Caps) की भी सुविधा होती है, जिसका उपयोग करके यदि Capital/small में बदल दिया जाए तो समग्र पाठ का अर्थ का अनर्थ हो जाता है। और फिर विभिन्न डैटाबेस उपयोगों, इण्टरनेट सर्च इंजिनों, ईमेल-पते आदि में Small/Captial के निर्विशेष से searching, sorting, indexing आदि होती है। अतः ये पद्धतियाँ तकनीकी दृष्टि से उपयुक्त सिद्ध नहीं हुई।
तकनीकी रूप से सही लिप्यन्तरण वही माना जाएगा जो भारतीय लिपि के हर शब्द को हू-ब-हू रोमन में बदले तथा फिर वापस रोमन से भारतीय लिपि में हू-ब-हू बदल सके। इस दौरान कोई बिगड़ाव न हो तथा कोई द्विअर्थी भाव प्रकट न हो। किसी भी दो प्रकार के उच्चारण विभेद या वर्ण विभेद को स्पष्ट प्रकट किया जा सके। इसका ध्यान INSROT में रखा गया है। उदाहरण के लिए
अतः = ata:
अत्ह = ath'a
फ = pha
प्ह = ph'a
के मध्य भी अन्तर स्पष्ट रखने की व्यवस्था है। देवनागरी से रोमन और रोमन से वापस देवनागरी में लिप्यन्तरण करने पर कोई गड़बड़ी नहीं हो, इसका ध्यान रखा गया है। सम्पर्ण पाठ को यदि CAPITAL या SMALL letters में बदल दिया जाए तो भी मूल पाठ परिवर्तित न हो इसका ध्यान रखा गया है।
INSROT को यदि अधिकाधिक विद्वानों/उपयोगकर्ताओं का समर्थन मिले तो इसे शीघ्र मानकीकृत किया जा सकता है, और विश्वस्तर पर भारतीय लिपियों के प्रयोग को एकरूपता मिल सकती है।
अतः सभी विद्वानों, पाठकों, हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं के चिट्ठाकारों से अनुरोध है कि कृपया सभी अपने सुझाव दें, आनेवाली व्यावहारिक समस्याओं से अवगत कराते हुए सुझाव दें और अपना समर्थन दें।
भोमियो में यदि प्रायोगिक तौर पर INSROT के मसौदे(Draft) सूत्र अपना कर परीक्षण किया जाए तो अधिकाधिक लोग इसे सरलता से टेस्टिंग करके इसकी practical समस्याएँ, यदि कोई सामने आएँ, से अवगत हो सकेंगे, सूचना दे सकेंगे, फीडबैक दे सकेंगे। अधिकाधिक व्यावहारिक सुझाव मिलने पर उनके समाधान के लिए प्रयास किए जा सकेंगे।
क्योंकि एक बार मानकीकरण हो जाने के बाद उसे बदलना बहुत कठिन (लगभग असम्भव) हो जाता है। यदि बारम्बार सुधार/बदलाव किए जाते रहे तो फिर Stability Policy ही कैसे टिक पाएगी।
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हरिराम
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30 Jun 2007
अंग्रेजी-हिन्दी वाक्यांश कोश की आवश्यकता
अंग्रेजी-हिन्दी वाक्यांश कोश की आवश्यकता
अंग्रेजी-हिन्दी के अनेक मुद्रित शब्दकोश बाजार में उपलब्ध हैं। इण्टरनेट पर कई ई-शब्दकोश भी उपलब्ध हैं। कई ऑनलाइन-शब्दकोश भी उपलब्ध हैं। इनमें से प्रमुख है http://www.shabdkosh.com/ तथा इसके अलावा अनेक ऑन-लाइन शब्दकोश भी विकसित किए जा रहे हैं जिनके निकट भविष्य में इण्टरनेट पर भी उपलब्ध होने की सम्भावनाएँ हैं।
शास्त्री जे॰सी॰ फिलिप जी ने भी अपने जालस्थल http://www.sarathi.info/ पर अनेक शब्दकोशों की कड़ियाँ (Hyperlinks) उपलब्ध करवाई हैं।
भारत सरकार के वैज्ञानिक एवं तकनीक शब्दावली आयोग द्वारा पिछले कई वर्षों में विभिन्न विषयों की अनेक द्विभाषी/बहुभाषी शब्दावलियों (terminologies) का विकास कर मुद्रित किया गया है। जो प्रकाशन विभाग के विक्रय-केन्द्रों पर उपलब्ध हैं। इन्हें इण्टरनेट पर उपलब्ध करवाने की भी योजना है। किन्तु तकनीकी और प्रशासनिक समस्याओं के कारण इसमें काफी समय लग सकता है।
किन्तु अंग्रजी-हिन्दी अनुवाद करने के दौरान सबसे बड़ी कमी खलती है -- एक वाक्यांश कोश की। क्योंकि सर्वदा शब्द-दर-शब्द अनुवाद सही नहीं हो पाता। शाब्दिक अनुवाद कभी-कभी अर्थ का अनर्थ कर देता है। उदारहण के लिए "Brain Drain" का शाब्दिक अर्थ "दिमागी नाला" होगा, किन्तु इस पद का सही अर्थ "प्रतिभा पलायन" होता है।
अतः पद(शब्द-समूह Term) तथा वाक्यांश (phrase) कोश की नितान्त आवश्यकता है। इसका अभाव बहुत खलता है।
अतः यदि कोई संस्थान या समर्थ व्यक्ति किसी वेबसाइट पर अंग्रेजी-हिन्दी वाक्यांश कोश के निर्माण की दिशा में कोई युक्ति/प्रोग्राम उपलब्ध करा सकें, जहाँ ब्लॉग पाठक या हिन्दी या अंग्रेजी के विद्वान अपने प्रयोग में आनेवाले नए द्विभाषी पद/वाक्यांश जोड़ सकें, तो समग्र विश्व की जनता के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा।
ऐसे वाक्यांश कोश की आवश्यकता कम्प्यूटर द्वारा अनुवाद के सॉफ्टवेयरों के विकास में भी अनुभव की गई है। इनकी निर्माण तथा उपलब्ध होने से ऐसे विकास-कार्यों में काफी मदद मिलेगी।
सभी अंग्रेजी तथा हिन्दी के विद्वानों, चिट्ठाकारों, पाठकों से अनुरोध है कि ऐसे वाक्यांशों का संग्रह आरम्भ करें और अपना यथासम्भव योगदान दें।
यदि चाहें तो इस ब्लॉग की टिप्पणी में ऐसे नए पद/वाक्यांश की जानकारियाँ देने की यथासंभव कोशिश कर सकते हैं।
इस दिशा में एक विकि wiki पृष्ठ बनाकर शुरूआत की गई है। सभी अंग्रेजी-हिन्द विद्वानों और पाठकों से अनुरोध है कि यहाँ
http://hi.wiktionary.org/wiki/
अंग्रेजी-हिन्दी वाक्यांश कोश
कड़ी पर नियमित क्लिक करें और नए वाक्यांश जोड़ने तथा इस सूची को यथासम्भव सुधार/संशोधित करके इसे समृद्ध बनाने में अपना अमूल्य सहयोग दें।
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हरिराम
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12 Jun 2007
ग्लोबल वार्मिंग कम करने हेतु उपग्रहों का प्रयोग
ग्लोबल वार्मिंग कम करने हेतु उपग्रहों का प्रयोग
पृथ्वी पर बढ़ते तापमान (ग्लोबल वार्मिंग) को कम करने हेतु एक अच्छा उपाय सुझाया है-- डेण्टोन, अमेरिका के मि. क्रिश विलिस ने - कि एक विशाल सूर्य ढाल (Sun Shield) बनाकर अन्तरिक्ष में पृथ्वी की भूस्थिर कक्षा में प्रक्षेपित करके स्थापित दी जाए, जो एक उपग्रह की तरह पृथ्वी का चक्कर इस प्रकार लगाती रहे कि हमेशा पृथ्वी और सूर्य के बीच सामने बनी रहे और विशेषकर भूमध्यसागरीय क्षेत्र से सूर्य के 3 प्रतिशत प्रकाश को अन्तरिक्ष में ही परावर्तित कर दे और धरती पर न पहुँचने दे। इससे धरती के तापमान में 5-6 प्रतिशत कमी आ सकती है।
उन्होंने बताया है कि इतनी बड़ी परावर्तक तश्तरी/शील्ड को पृथ्वी से प्रक्षेपित करना काफी कठिन और खर्चीला होने के कारण इसे चाँद पर एक अर्थ-स्टेशन बनाकर वहाँ से प्रक्षेपित करने की सलाह दी है तथा इसकी व्यापक विधि भी अपने ऊपर संकेतित वेबपृष्ठ पर बतलाई है।
उन्होंने इस पर आनेवाली लागत को अमेरिकी सरकार के एक वर्ष के बजट का सिर्फ 3 प्रतिशत बताया है। परन्तु बिल्ली के गले में घण्टी कौन बाँधे? शायद भविष्य में उनके सुझाव को कार्यान्वित करने के लिए कोई आगे आए- इसकी प्रतीक्षा है!लेकिन इसमें भी कुछ लोगों को आशंका है कि यह सूर्य के मानव के लिए हितकारी मुख्य प्रकाश को कहीं अवरुद्ध कर सकती है और बाहरी हानिकारक (लपटों वाले) हानिकारक प्रकाश को धरती पर अधिक फैलने का खतरा बढ़ा सकती है। प्रश्न उठता है कि इस ढालरूपी उपग्रह से सूर्य हमेशा ग्रहणग्रस्त हुआ क्या नहीं माना जाएगा?
कुछ लोगों ने उन्हें सुझाव दिया है कि ऐसे परावर्तक उपग्रह-तश्तरी का दोहरा उपयोग भी किया जा सकता है। सर्दियों के दिनों में इस उपग्रह-ढाल को उलटाकर इस प्रकार प्रतिस्थापित किया जा सकता है, ताकि अधिकाधिक धूप पृथ्वी की ओर परावर्तित कर सके, विशेषकर अधिक ठण्डे क्षेत्रों की ओर। ताकि लोगों को ठिठुरती ठण्ड से कुछ राहत मिल सके।
आधुनिक युग में उपग्रहों का प्रक्षेपण करके विविध उपयोग किया जा रहा है। हर महीने एक-दो नए उपग्रह विभिन्न राष्ट्रों द्वारा प्रक्षेपित किए जा रहे है। संचार, मौसम, अनुसन्धान, भूगोल, जलवायु-प्रबोधन तक ही सीमित नहीं रहे हैं, इनके उपयोग, बल्कि जासूसी, युद्ध के लिए भी कई उपग्रह अन्तरिक्ष में प्रस्तुत हैं। ईराक के साथ युद्ध में ऐसे जासूसी उपग्रहों का उपयोग करके ही अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को नेस्तनाबूत करने में सफलता पाई थी।
लेकिन ऐसे प्रकाश परावर्तक-तश्तरीवाले उपग्रहों का विनाशकारी उपयोग भी किए जाने की आशंकाएँ उपजती है। सर्य के प्रकाश को सागर-जल पर परावर्तित तथा संकेन्द्रित करके पानी में उबाल पैदाकर स्थल विशेष पर निम्नदाब सृजित करके चक्रवात व तूफान भी छेड़े जा सकते हैं। किसी स्थल विशेष पर अत्यधिक ताप पैदा करके अग्निकाण्ड किए जा सकते हैं। जंगलों में आग लगाई जा सकती है।
उपग्रहों के प्रयोग द्वारा 'गूगल अर्थ' कितने सटीक मानचित्र इण्टरनेट के माध्यम से प्रदान कर पा रहा है, इस तथ्य से आज बच्चे भी परिचित हैं। ये मानचित्र आज आम आदमी तक उपलब्ध हो रहे हैं। उपग्रहों में लगे शक्तिशाली एक्स-रे कैमरों से अब पृथ्वी के गर्भ में छिपी खानों के खनिज भण्डारों का भी पता लगाया जाने लगा है।
कुछ वर्षों पहले सूर्य के प्रकाश को धरती की ओर परावर्तित करनेवाले एल्यूमिनियम से बने एक लघु चन्द्रमा जैसे उपग्रह का प्रक्षेपण करके सफल प्रयोग करके देखा जा चुका है, जो रात में भी एक क्षेत्र विशेष को रोशनी से प्रकाशित करता था।
परन्तु अतः यदि ग्लोबल वार्मिंग कम करने में ऐसे ढाल रूपी उपग्रहों का प्रयोग किया जा सके तो यह एक रचनात्मक कदम होगा और इसे एक बहुत अच्छा जन-हितकारी उपाय माना जाएगा।
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हरिराम
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11 Jun 2007
सूरज पर दाग - बढ़ती गर्मी का कारण
सूरज पर दाग - बढ़ती गर्मी का कारण
चाँद पर दाग हैं, सभी इसे देख लेते हैं। चाँद पर दाग विषय पर अनेक कवियों की कलम चल चुकी है। दाग तो सूर्य पर भी होते हैं। चाँद के दाग तो सभी देख लेते हैं, किन्तु सूरज के दाग कौन देखे? जो सूरज के दाग देखने जाएगा, उसकी आँखें फूट सकती है उसके प्रखर व अनन्त प्रकाश से। शायद इसीलिए कहा गया है कि "बड़ों की गलतियाँ नहीं देखी जाती।"
आजतक दूरदर्शन चैनल पर एक समाचार में बताया गया कि अब वैज्ञानिकों ने आधुनिक वेधशालाओं में देखने पर पाया है कि आजकल सूरज पर दो बड़े काले धब्बे दिखाई दे रहे हैं। चेतावनी भी दी गई है कोई इन धब्बों के लिए सूरज की ओर झाँकने का भी प्रयास नहीं करे। सूरज की ओर नंगी आखों से कदापि नहीं देखना चाहिए। उगते हुए बाल-सूर्य को भले की कुछ मिनट नंगी आँखों से देखा जा सकता है। किन्तु जब सूरज की लालिमा कम होने लगे तो और सूरज की ओर निहारना नहीं चाहिए।
वैज्ञानिकगण आजकल सूरज पर दिखाई दे रहे इन काले धब्बों को पृथ्वी की गर्मी बढ़ने (ग्लोबल वार्मिंग) का कारण भी मान रहे हैं। आँकड़ों के आधार पर वे बताते हैं कि जिस वर्ष सूरज पर कोई धब्बा नहीं दिखाई दिया, उस वर्ष बहुत कड़ाके की ठण्ड पड़ी थी। सूरज पर निरन्तर होते रहनेवाले परमाणुओं के विखण्डन तथा संलयन की प्रक्रिया के कारण अनन्त ऊर्जा उत्पन्न होती है और ये काले धब्बे उसके ईँधन भण्डार भो हो सकते हैं या कोई बड़े गड्ढे भी हो सकते हैं। सूर्य से जो प्रकाश धरती पर पहुँचता है, उसे पृथ्वी के चारो ओर स्थित ओजोन आयाम छानकर धरती तक पहुँचाता है। हानिकारक तत्व छिटक कर पृथ्वी के दोनों ध्रुवों की ओर विसर्जित हो जाते हैं।
जिस प्रकार सूर्यग्रहण के वक्त सूर्य का प्रकाश हानिकारक माना जाता है। उसी प्रकार काले धब्बों के प्रकट होने के दौरान भी सूर्य का प्रकाश हानिकारक माना जाता है। इसे समझाने का सरल तरीका निम्नवत् है:
जैसे- लकड़ी के चूल्हे पर जब रोटी पकाई जाती है तो रोटी को पहले तवे पर आधा सेक कर उतार लिया जाता है, और फिर रोटी को दहकते कोयले/अंगारों पर रखकर उलट-पलट कर सेंका जाता है। वह रोटी स्वादिष्ट और स्वास्थ्यकर होती है। यदि रोटी को लकड़ी जलने पर पैदा होनेवाली आग की लपटों में सेंका जाए तो रोटी कड़ुई(खारी) हो जाती है तथा कुछ जहरीली भी हो सकती है, कुछ काली भी पड़ सकती है। इसी प्रकार सूर्यग्रहण के वक्त सूर्य का मुख्य (अँगारों जैसा) प्रकाश छिप जाता है, बाहरी प्रकाश जो लपटों जैसा होता है, वही हम तक पहुँचता है, जिसमें वैसे ही कुछ जहरीले तत्व पाए जाते हैं। इसलिए सूर्यग्रहण के समय पेट खाली रखने की सलाह दी जाती है।
अतः काले धब्बे दिखाई पड़ने के दौरान सूर्य का प्रकाश कुछ कटु होता है जो आर्द्रता, गर्मी तथा उमस बढ़ाने वाला होता है। इस दौरान कई स्थानों पर भयंकर चक्रवात, ओलावृष्टि तथा अम्लवर्षा होने के भी उदाहरण मौसम विभाग के आँकड़ों में पाए जाते हैं।
यदि ग्लोबल वार्मिंग इन्हीं सौर कारणों से बढ़ रही है तो मानव के वश में क्या है? मानव इसका क्या उपाय कर सकता है?
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हरिराम
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