20 Sept 2007

रामसेतु तोड़ने सम्बन्धी पर्यावरणीय दृष्टि2

कोलकाता से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र 'सन्मार्ग' दिनांक 19 सितम्बर,2007 के पृष्ठ-3 पर रामेश्वरम् से श्रीलंका तक के रामसेतु के तोड़ने से उपजनेवाले पर्यावरण सम्बन्धी नुकसान और कुछ और प्रकाश डाला गया है।

ओड़िशा के केन्द्रापड़ा में विश्व प्रसिद्ध "ओलिव रिडले" प्रजाति के कछुए समुद्री मार्ग से आते हैं तथा यहाँ विहार करते हैं। इन कछुओं के बचाव में लगे वैज्ञानिकों के अनुसार इन बड़े आकार के दुर्लभ कछुओं को "सेतुसमुद्रम्" परियोजना के निर्माण से खतरा है। उनके अनुसार इस समुद्री चैनल के निर्माण के बाद ओलिव रिडले कछुए प्रजनन के लिए ओड़िशा के समुद्री तटों पर नहीं आ पाएँगे क्योंकि "पोल्क स्ट्रीट" मार्ग में जहाजों के आवागमन होगा एवं ये कछुए "गहिरमाथा" एवं प्रान्त के अन्य तटों पर नहीं आ पाएँगे। यह जानकारी बेंगळूरु में पर्यावरण के लिए कार्य करनेवाली संस्था "एंट्री" की वैज्ञानिक आरती श्रीधर ने दी है। चार वैज्ञानिकों सहित इस इलाके का मुआयना करने आयीं श्रीधर ने यह जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि सेतुसमुद्रम् केनाल प्रोजेक्ट 167 किलोमीटर लम्बा है एवं इसके इलाके में विशेष मछलियों, कछुओं, सीपों सहित अनेक दुर्लभ समुद्री जीवों की विलुप्तप्राय हो चुकी प्रजातियाँ रहती हैं। इस प्रोजेक्ट के निर्माण से इन सभी प्रजातियों का नाश हो जाएगा।

इसी कारण उन्होंने मांग की है कि इस प्रोजेक्ट के निर्माण कार्य के पहले केन्द्र सरकार को पूरे इलाके के जीवों के बारे में एवं इस परियोजना से जीवों पर पड़नेवाले प्रभाव की समीक्षा करानी चाहिए।

राज्य वन्यजीव संस्था के सचिव विश्वजीत महान्ति ने भी कहा है कि इन कछुओं पर ट्रांसमीटर लगाकर किए गए परीक्षणों से पता चला है कि ये पोल्क स्ट्रीट के रास्ते से ही ओड़िशा में प्रवेश कर यहाँ के तटों पर प्रजनन करते हैं।

उल्लेखनीय है कि ओड़िशा के समुद्री तटों पर अक्सर बड़े कछुए भी आते हैं। कई कछुओं का आकार तो 9 फीट लम्बाई, 7 फीट चौड़ाई और 5 फीट ऊँचाई तक का भी होता है। जिन्हें रेल-पार्सल द्वारा कोलकाता तथा अन्य महानगरों में भेजते वक्त रेलवे स्टेशनों पर भी देखा गया है।

इस परियोजना से समुद्र में व्यापक प्रदूषण के कारण तटवर्ती वनस्पतियों को भी भारी हानि होने तथा तटवर्ती इलाकों का क्षरण होने की भी आशंका व्यक्त की गई है।

इस सम्बन्धी पिछले लेख की कड़ी रामसेतु तोड़ने सम्बन्धी पर्यावरणीय दृष्टि

18 Sept 2007

रामसेतु तोड़ने सम्बन्धी पर्यावरणीय दृष्टि

हिन्दी चिट्ठाकार गूगल समूह की इस परिचर्चा में रामसेतु को तोड़ने के बारे में कई विचार व्यक्त किए गए हैं। अखबारों में इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क-वितर्क दिए जा रहे हैं। कई लोग इसे राजनीतिक खेल कहते हैं तो कई अन्य इसे धार्मिक और पौराणिक आस्था का प्रतीक मानकर इसकी रक्षा की दुहाई दे रहे हैं।

रामेश्वरम् के धनुषकोड़ि से लेकर श्रीलंका के मुन्नार टापू तक रामसेतु को तोड़ने के मामले को धार्मिक आस्थाओं और राजनैतिक वितर्कों से परे हटाकर शुद्ध वैज्ञानिक तथा तकनीकी दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार ये पत्थर मूँगा (Coral) की चट्टानों के टुक़ड़े हैं। इस क्षेत्र के समुद्र तल में मूँगे की पर्वताकार चट्टानें बहुतायत से पाई जाती हैं। कुछ अन्य वैज्ञानिकों के अनुसार ये विशेष प्रकार के चूना-पत्थर (Lime Stone) हैं।

आज भी वहाँ समुद्र किनारे पर ऐसे पत्थर मिलते हैं जो पानी के ऊपर तैरते हैं। हमारे कुछ मित्र भी एक ऐसा ही 12"x10"x9" के आकार का पत्थर का टुकड़ा वहाँ से उठाकर लाये थे जिसे एक स्थानीय मन्दिर में एक पानी के एक कुण्ड में सुरक्षित रखा गया है। यह पत्थर पानी पर तैरता रहता है। सैंकड़ों लोग, बच्चे से लेकर बूढ़े तक प्रतिदिन आते हैं उस पत्थर को अपने हाथों से पकड़कर पानी में डुबाते हैं और उनके छोड़ते ही वह पत्थर फिर से पानी के ऊपर आ जाता है और तैरने लगता है।

इस पुल के अस्तित्व को व्यावहारिक दृष्टि के अधिक संपुष्टि इस तथ्य से मिलती है कि आज भी सड़क या रेलमार्ग से रामेश्वरम् जाने के लिए 'रामनाथपुरम् मण्डपम्' से लेकर रामेश्वरम् के द्वीप तक समुद्र के ऊपर एक पुल बना हुआ है, जिसके ऊपर से होकर ही मोटरगाड़ियों तथा रेलगाड़ी को गुजरना पड़ता है। इस पुल ऊपर से बस या कार में बैठे बैठे नीचे के छछले समुद्री जल का, रंगारंग मूँगे की चट्टानों का जो सुरम्य दृष्य दिखाई देता है वह चित्ताकर्षक होता है और पर्यटकों तथा श्रद्धालुओं के मन पर अमिट छाप छोड़ जाता है।

इस बारे में रामायण में वर्णन है कि जब रावण सीता का अपहरण करके लंका ले गया था तो भगवान राम सुग्रीव, हनुमान तथा वानर सेना के सहयोग के लंका जाने के लिए प्रस्थान करते हैं किन्तु बीच में समुद्र पड़ता है। जिसे पार करने का उपाय बताते हेतु समुद्र देवता स्वयं प्रकट होकर सागर पर पुल बनाने की सलाह देते हुए कहते हैं कि नल-नील नामक के दो वानर-शिल्पी हैं, जिनके स्पर्श करने पर पत्थर भी पानी पर तैरने लगते हैं। उनके द्वारा सागर पर पुल बनवाइए--

"नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिँ जलधि प्रताप तुम्हारे।।
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।"

ऐसे पानी के ऊपर तिरनेवाले हल्के पत्थर अपने आप में एक आश्चर्य हैं और विज्ञान तथा तकनीकी को चुनौती देते हैं। यदि ऐसे पत्थरों की खान कहीँ आसपास हो, या कृत्रिम रूप से ऐसे पत्थर बनाए जा सकें तो रामेश्वरम् से लंका तक समुद्र पर यह पुल दुबारा बनाया जा सकता है। भले ही पौराणिक कथा कुछ भी हो या न हो, गूगल अर्थ के उपग्रह चित्र में पानी के नीचे डूबा हुआ पुल जैसा कई किलोमीटर लम्बा पहाड़ जैसा उभार स्पष्ट दिखाई देता है।



फिलहाल यह समस्या है वर्तमान ब़ड़े जहाजों को दक्षिणी हिन्दुस्तान के बन्दरगाहों पर आने के लिए पूरे श्रीलंका का चक्कर लगाकर आना पड़ता है। "सेतुसमुद्रम्" परियोजना के अन्तर्गत यहाँ से एक शार्ट-कट समुद्री मार्ग को प्रशस्त करने हेतु समुद्र के नीचे इस पुल जैसे उभार को तोड़कर समुद्र को गहरा बनाने की सलाह दी है कुछ अन्तर्राष्ट्रीय इंजीनियरों ने, ताकि समुद्री मार्ग कुछ किलोमीटर कम हो सके। लेकिन इससे पड़नेवाले पर्यावरणीय खतरों के बारे में भी विचार विमर्श कर लेना चाहिए।

भूस्थैतिकी दृष्टि से यह पुल(Bridge) लंका के टापू (Island) को स्थिर रखने में मदद कर रहा है। अरब सागर और हिन्द महासागर के बीच एक मजबूत बाँध का कार्य कर रहा है। इसके टूट जाने से भारत तथा श्रीलंका के तटवर्ती क्षेत्र में व्यापक हलचल और पर्यावरणीय खतरे पैदा हो सकते हैं। भूस्खलन, भूकम्प तथा सुनामी जैसी विपदाओं के आ़ने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता।

दूसरी ओर प्रगति के लिए यह भी जरूरी है कि अच्छे शार्टकट समुद्री मार्गों, तीव्र गति वाले सड़क मार्गों का निर्माण तथा विकास हो। उदाहरण के लिए अगर स्वेज नहर का निर्माण उस काल में नहीं किया गया होता तो शायद विश्व का समुद्री यातायात भी इतना सुगम नहीं होता। लेकिन स्वेज नहर धरातल की मिट्टी को खोद खोद कर बनाई गई थी। विस्फोटकों से ब्लास्ट करके नहीं। बीच की पूरी खुदाई खत्म होने के बाद ही अन्त में समुद्र से जुड़नेवाले धरातल को खोद कर समुद्र के जल को प्लावित किया गया था इसमें।

किन्तु आज ऐसे कार्य मानवीय श्रम से धीरे धीरे किए जा सकते हैं क्या? और फिर समुद्र के नीचे? यदि किए भी जाएँ तो कितने गोताखोर श्रमिक कितने समय तक पानी के नीचे रहकर पत्थरों को धीरे धीरे खोद पाएँगे? ऐसा कोई खुदाई करनेवाला पनडुब्बीनुमा डोजर भी तो नहीं चलेगा वहाँ। आज सामान्य छोटे नदी- बाँधों में जमी रेत तथा मिट्टी के टापुओं तक तो ड्रेजरों के सहारे खोद-खाद कर हटाया नहीं जा पा रहा है, फिर ऐसे सागर-तलीय परियोजनाओं की परिकल्पना कैसे कर ली जाती है?

सागर तल में खुदाई के साथ साथ तत्काल निर्माण, स्तम्भों की कंक्रीटिंग आदि भी जरूरी होगी। टूटे हुए पत्थरों के टुकड़ों तथा रेत आदि को वहाँ से हटाकर सुरक्षित रूप से कहाँ स्थानान्तरित करना होगा, वह भी इस प्रकार से कि अवांछित से रूप सागर जल में लहरों की चपेट में इधर उधर फैल न जाएँ? इस कार्य में कितने वर्ष लगेंगे? कितना खर्च आएगा? आज के सुविधाखोर या आरामखोर अभियन्तागण तो सिर्फ विस्फोटकों से उड़ाने का सरल तरीका ही अपनाएँगे, जो अत्यन्त खतरनाक होगा।

इस पुल को किसी विशाल आरी जैसे उपकरणों से काट काट कर तो अलग नहीं किया जा सकेगा। न ही मानवीय श्रम द्वारा धीरे धीरे टुकड़े टुकड़े करके खोदा या काटा जाएगा। सिर्फ डायनामाइट आदि विस्फोटकों के माध्यम से ही ब्लास्ट करके विध्वंश करके ही तोड़ा जाएगा। ऐसी हालत में न ही काटे गए या उखाड़े गए पत्थरों को या पहाड के टुकड़ों को बिखरने, गिरने या फैलने से रोका जा सकेगा। न ही इससे समुद्र के जल में पैदा होनेवाले विशाल व भयंकर भँवर या महाज्वार को बाँधा या रोका जा सकेगा। इस आशंका से इन्कार भी नहीं किया जा सकता कि इस प्राकृतिक बाँध या प्राचीनकालीन पौराणिक वानर सेना द्वारा निर्मित इस पुल जैसी चट्टानों को ब्लास्ट करके उड़ाने से पर्यावरण को कितना भयंकर नुकसान होगा। प्रकृति से इस प्रकार छेड़छाड़ करना वास्तव में "विनाश काले विपरीत बुद्धि" ही कही जाएगी।

और फिर इस तोड़ फोड़ तथा समुद्री मार्ग पर बड़े जहाजों की आवाजाही से मूँगे की चट्टानों से लेकर मत्स्यों एवं जल-जीवों की भारी हानि तो होगी ही। समुद्र जल में घुलनेवाले जहरीले एवं दूषित पदार्थों से इस तट का समुद्र जल नहाने लायक भी न रहेगा।

सरकार के सम्बन्धित प्राधिकारियों को इस प्रकार विदेशी दबाव में आकर या अन्तर्राष्ट्रीय अभियन्ताओं की बुद्धि को ही सर्वोपरि मान्यता देकर उतावली में प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कदापि नहीं करनी चाहिए।

प्रकति, पर्यावरण, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों को रोकने के लिए जहाँ सारा विश्व अपनी चिन्ता जता रहा है। इस पृथ्वी को बचाने का भरसक प्रयास कर रहा है। जहाँ अनेक विकसित राष्ट्र पर्यावरण तथा शान्ति की दुहाई देकर परमाणु समझौते कर रहे हैं, वहाँ सागर के नीचे के धरती को इस प्रकार विध्वंश करके कौन-सी बुद्धिमत्ता, कौन-सी विनिर्माणता, कौन-सी रचनात्मकता का परिचय देगे? कई बुद्धिजीवि आशंका व्यक्त करते हैं शायद यह सुझाव भारत और श्रीलंका दोनों को नुकसान पहुँचाने के उद्दश्य से किन्हीं आतंकियों ने दिया हो?

अतः विश्व के बुद्धिजीवियों को पर्यावरणीय दृष्टि से एक बार फिर से इस बारे में विचार करना चाहिए।

इसके साथ-साथ सामरिक सुरक्षा सम्बन्धी खतरों पर भी विचार आवश्यक है। इस शार्टकट समुद्री मार्ग से केवल व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही ही नहीं होगी। भले ही अन्तर्राष्ट्रीय युद्धपोतों को भारत की समुद्री सीमा से न गुजरने दिया जाए, लेकिन मिसाइलों से लैस पनडुब्बियों तथा गुप्तचर पनडुब्बियों को छुपकर निकलने से रोकने में तो चूक होने की आशंका रहेगी ही। जो भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए भयंकर खतरा हो सकता है।

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आगे भाई आशुतोष ने टिप्पणी में बिल्कुल वाजिब प्रश्न किया है कि "तैरनेवाले पत्थरों से बना यह पुल डूब कैसे गया?" इस प्रश्न का उत्तर निम्नवत् है--

यह पुल पानी में पूरा डूबकर सागर तल में नहीं चला गया है, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग आदि के कारण कालक्रम में समुद्र का जल स्तर के बढ़कर ऊपर उठने के कारण पानी के कई फीट नीचे चला गया है। इसके आसपास कई किलोमीटर की धरती में भी सागर जल फैल गया है। यहाँ के आसपास के क्षेत्र में सागर का पानी काफी छिछला दिखाई देता है। कहीं कहीं तो काफी दूर तक सिर्फ तीन-चार फुट सागर जल ही मिलता है।

उदाहरण के लिए गत एक सप्ताह पहले जगन्नाथ पुरी के समुद्र किनारे कई फर्लांग तक फैली विशाल रेत का मैदान तथा इसके किनारे की मेराइन ड्राईव सड़क तक समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण बह गई है। समुद्र किनारे निर्मित बड़े बड़े होटलों, ईमारतों तक समुद्र की लहरें आने लगी हैं। बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन के खतरे उत्पन्न हो रहे हैं। बर्फ पिघलने के कारण धीरे धीरे हिमालय की ऊँचाई कम होती जा रही है तथा सागर का जलस्तर बढ़ता जा रहा है। अतः शास्त्र-पुराणों में वर्णित क्रमशः 'प्रलय' होने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता।

कई ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक शोध इस पुल को लेकर किया जा चुके हैं। कई गोताखोर इसका परीक्षण करके आ चुके हैं।

कुछ विद्वानों तथा शोधकर्ताओं के अनुसार--

इसका पुल का फैलाव तो प्राकृतिक पठार या पहाड़ जैसा ही लगता है। किन्तु दो पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए जो खाँचेनुमा बन्धन (Auto-locking design) दिखाई देते है, उन्हें देखकर अनुमान लगाना पड़ता है कि यह मानव निर्मित ही होंगे, जो विशेष अभियान्त्रिकी कला-कौशल का अद्भुत नमूना है। इस पुल के पुरातात्विक अवशेषों नीचे गहराई तकं फिर अनन्त सागर जल दिखाई देता है।

परीक्षण के लिए यदि ऐसे तैरनेवाले पत्थर को पकड़ कर पानी के अन्दर जब तक डुबोये रखते हैं, तब तक वह पत्थर डूबा रहता है। उसे छोड़ते ही वह पानी से हल्का होने के कारण ऊपर आ जाता है और तिरने लगता है। अतः परस्पर पत्थर जुड़े तथा बन्धे होने के कारण यह पानी के नीचे अदृश्य है। ऐसे तैरनेवाले पत्थर छिद्रोंवाले तथा कुछ भुरभुरे रेशेदार एजबेस्टेस्टस पत्थर की प्रजाति के होते हैं। कुछ पत्थरों को जबरन पानी के अन्दर डुबोने पर हवा के बुदबुदे बाहर आते हैं, जिससे लगता है कि इन पत्थरों के छिद्रों में वायु फँसी होने के कारण ये पानी के आयतन से अधिक स्थान घेरने के कारण हल्के होकर पानी पर तिरते हैं।

यदि इस पुल के पत्थरों के खाँचेनुमा बन्धनों को तोड़ा जाए या अलग किया जाए तो वे तैरने वाले पत्थर ऊपर आकर तिरने लग सकते हैं। कई लोगों को द्वारा इस पत्थर के सैम्पल लेने के ऐसे प्रयास किए जा चुके हैं। पुल के सिरों के नीचे विशाल पर्वतनुमा स्तम्भाकार आधार जैसी चट्टानें होने का भी आभास मिला हैं। इस पर किसी धार्मिक भावना से नहीं, बल्कि शुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार किया जाना अपेक्षित है।

रामायण तथा महाभारत आदि सन्त-महात्माओं, ऋषि-मुनियों द्वारा रचित प्रेरक और पूज्यनीय महाकाव्य हैं, इन्हें अच्छा साहित्य माना जाना चाहिए, किन्तु ठोस तथ्यपूर्ण इतिहास नहीं। हमें किसी राजनैतिक दल द्वारा प्रचारित धार्मिक भावनाओं, आस्थाओं पर कोई टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।

1 Sept 2007

देवनागरी संयुक्ताक्षर "ज्ञ" का रहस्य

देवनागरी संयुक्ताक्षर "ज्ञ" का रहस्य
Secret of Devanaagarii Conjunct "jna"


हिन्दी चिट्ठाकार गूगल समूह में इस परिचर्चा कड़ी में "ज्ञ" के शुद्ध रूप तथा उच्चारण के बारे में कई प्रश्नोत्तर चल रहे हैं।

कुछ लोग इसका उच्चारण "ग्य" जैसा करते हैं, कुछ लोग "ग्यँ" उच्चारण करते हैं, कुछ "द्‍न्य" जैसा, कोई "ग्न" जैसा तो कोई "ज्न्य" जैसा उच्चारण करते हैं। भारत के विभिन्न स्थानों पर इस देवनागरी संयुक्ताक्षर का लोग विविध प्रकार से उपयोग करते हैं।

विविध विद्वानों ने अपने विचार निम्नवत् व्यक्त किए हैं--

विज्ञान शब्द को

-- कुछ उत्तर भारतीय 'विग्यान' (vigyan) पढ़ते है।
-- कुछ दक्षिण भारतीय 'विज्नान' (vijnaan) पढ़ते हैं।
-- कुछ अन्य लोग 'विज्यान' (vijyan) पढ़ते हैं।
-- गूगल के ट्रांस्लिट्रेशन सेवा में "vigyaan" टाइप करने पर "विज्ञान" प्रकट होता है।
-- कुछ अन्य IME में "vijyaan* टाइप करने पर भी "विज्ञान" प्रकट होता है
-- महाराष्ट्र में कुछ मराठी लोग "विज्ञान" को "vidnyan" बोलते हैं। जैसे "ज्ञानेश" को "dnyanesh".
-- कुछ मराठी "विग्न्यान" (vignyaan) उच्चारित करते हैं।
-- गुजरात में "विग्नान" (vignan) उच्चारित होता है।

अधिकांश लोग यज्ञ को "यग्यँ" उच्चारित करते हैं।

"ज्ञ" का असली उच्चारण खो गया है। आज लोगों को तलाश है इसके मूल व शुद्ध रूप की। सभी हिन्दी, संस्कृत, नेपाली, राजस्थानी, मराठी विद्वानों तथा देवनागरी लिपि के विभिन्न भाषी उपयोगकर्ताओं की जानकारी के लिए यहाँ "ज्ञ" संयुक्ताक्षर की व्युत्पत्ति के बारे में कुछ प्रकाश डाला जा रहा है।

जैसे क्ष= क्+ष्+अ को मिल कर बना है, परन्तु कुछ लोग उसे "छ" या ख" या "ख्य" जैसा उच्चारित करते हैं। अछर, अख्यर, लछमी आदि।

उसी तरह "ज्ञ"= ज्+ञ्+अ अर्थात ज+्+ञ (091C+094D+091E) मिल कर बना है। इसका शुद्ध रूप "ज्‍ञ" होता है।
"विज्ञान" शब्द का शुद्ध रूप "विज्‍ञान" है जिसे रोमन(Extended Latin with diacirtic marks) में "vijñān" लिखा जाता है।

लेकिन Basic Latin में "vijnaan" लिखकर काम चलाया जा सकता है, जो निकटतम शुद्ध रूप होगा। कुछ वैदिक संस्कृत पण्डित ही "ज्ञ" का शुद्ध उच्चारण (ज्+ञ) कर पाते हैं।

भारत में संविधान की 8वीं अनुसूची में घोषित 22 अधिकारिक (official) भाषाएँ हैं तथा भारत में सैंकड़ों बोलियाँ हैं। हर 20 कोस में भाषा बदल जाती है, हर 4 कोस में पानी। भौगोलिक, सांस्कृतिक कारणों से उच्चारण बदल जाता है तदनुसार लिपि/लेखन क्रम भी। परन्तु भाषा में आए "विकार" को भी विकास माना गया है।

"ज्ञ" की व्युत्पत्ति के बारे में "देवनागरी लिपि का क्रमविकास" नामक शोध में स्पष्ट उल्लेख है।

प्राचीन संस्कृत-आधारित वर्ण-परम्परा के अनुसार देवनागरी तथा अन्य भारतीय लिपियों में संयुक्ताक्षर ऊपर से नीचे के क्रम में संयुक्त करके लिखे जाते थे। किन्तु आधुनिक युग में जब देवनागरी तथा अन्य भारतीय लिपियों के टंकण यन्त्रों का आविष्कार हुआ, तो भारतीय लिपियों के वर्णों को अंग्रेजी के 52 अक्षरों की सीमित कुञ्जियों के ऊपर ही येन-केन-प्रकारेण काट-छाँट कर पैबन्द की तरह चिपका कर समयोजित करना पड़ा। टंकण यंत्रों की सुविधा के लिए देवनागरी लिपि में बायें से दायें क्रम में व्यंजन की खड़ी पाई को हटाकर संयुक्ताक्षर निर्माण का सरल उपाय अपनाया गया।

किन्तु कालक्रम में "ज्ञ" का सही उच्चारण गुप्त हो गया। तथा देवनागरी टाइपराइटर में सीमित कुञ्जियों के कारण "ञ" अक्षर को नहीं रखा जा सका था। इसलिए इसे ज्‍ और ञ को जोड़कर टाइप करने के शुद्ध रूप के वजाय एक स्वतन्त्र संयुक्ताक्षर के रूप में लगाया गया।

ज+ञ = ज्ञ की व्युपत्ति कैसे हुई, इसे स्पष्ट करने के लिए नीचे के चित्र में लिखते वक्त रेखाओं(strokes) के क्रम को दर्शाया गया है। (1) ज के नीचे ञ लिखकर, (2) कलम की नोंक को उठाए बिना जल्द लिखते वक्त इसकी रेखाएँ जुड़ीं (3) अन्तिम रेखा खड़ी पाई से न मिलकर नीचे लटकी रह गई, (4) और संक्षिप्त रूप इस प्रकार बन गया (5) फिर संयु्क्ताक्षर का यह रूप बना, (6) एक व्यक्ति की लिखावट में ऐसा रूप प्रकट हुआ, (7) अन्य व्यक्ति की लिखावट में ऐसा रूप प्रकट होता है, (8) माईक्रोसॉफ्ट के मंगल फोंट में यह रूप प्रकट होता है। (9) भारत सरकार के CDAC-GISTSurekhN.TTF फोंट में ऐसा रूप प्रकट होता है।




इसी प्रकार देवनागरी लिपि का क्रमविकास हुआ। जल्द लिखने के उद्देश्य से धीरे धीरे संयुक्ताक्षर अपने आप बनते चले गए। कालक्रम में उनका असली उच्चारण तथा मूल रूप लोप हो गया। यह बिगड़ते बिगड़ते आज इण्टरनेट तथा युनिकोड के युग में जटिल लिपियों (Complex Scripts) के समूहों में शामिल होने को मजबूर हो गई है। जबकि आरम्भ में यह रोमन व लेटिन लिपि से भी सरल, सपाट और एकमुखी थी।

देवनागरी लिपि के अन्य वर्णों तथा संयुक्ताक्षरों के रहस्यों पर इस आलेख-शृङ्खला के अगले अंकों में प्रकाश डाला जाएगा।

23 Aug 2007

सावधान! परोक्ष धूमपान अधिक खतरनाक

Indirect Smoking is more dangerous

कई घटनाओं में देखा गया है कि जो व्यक्ति धूमपान का आदी है, उसे तो कुछ रोग नहीं होता, लेकिन उसकी पत्नी को कैन्सर हो जाता है। उसके आसपास रहने, उठने, बैठनेवालों को गम्भीर बीमारियाँ हो जाती हैं।

इसका कारण बताते हुए चिकित्सा वैज्ञानिकों ने बताया है कि जो व्यक्ति धूमपान करता है वह बीड़ी/सिगरेट/सिगार आदि में तम्बाकू के जलने पर उत्पन्न धुएँ में निकोटिन+ऑक्सीजन ही अपनी साँस से फेंफड़ों में भरता है। किन्तु वह जो धुँआ उगलता है, उसमें निकोटिन+कार्बन-डाई-ऑक्साइड होता है जो ज्यादा खतरनाक होता है, जो उसके आसपास रहनेवाले व्यक्तियों के फेंफड़ों, श्वसन नली, तथा पेट में जाकर अनेक गम्भीर बीमारियाँ पैद करता है। अतः इस प्रकार परोक्ष (indirect) धूमपान ज्यादा खतरनाक होता है।

धूमपान के आदी व्यक्ति में तो निकोटीन को हजम करने या सहन करने की शक्ति आ जाती है। किन्तु धूमपान न करनेवाले व्यक्तियों में उस धूम को अनचाहे ग्रहण करने पर असह्य वेदना होती है। जो शारीरिक अवयवों पर ही नहीं, बल्कि मानसिक तथा मस्तिष्क की ग्रन्थियों पर खतरनाक स्तर का प्रभाव डालती है।

देखा जाता है कि किसी कार्यालय में, एयरकण्डीशण्ड कमरे में, सार्वजनिक स्थल पर धूमपान करनेवाले व्यक्ति को लोग रोकने या मना करने का साहस नहीं करते और अनचाहे ही भारी मात्रा में जहर अपने अन्दर सोखते रहते हैं।

सावधान! यह आपके जीवन का प्रश्न है: अतः ऐसे धूमपान-कारियों को तत्काल रोकने का आपका जन्मसिद्ध अधिकार है। सार्वजनिक स्थलों पर, रेलगाड़ी में, कार्यालयों में धूमपान करने पर भारतीय दण्डविधान की कई धाराओं के अन्तर्गत मामले दायर किए जा सकते हैं। उन्हें पुलिस द्वारा पकड़वाया जा सकता है। अतः ऐसे लोगों पर तत्काल कार्यवाही आवश्यक है।

पर्यावरण-संरक्षण संस्थाओं द्वारा मांग की जाने लगी है कि जिस प्रकार मयखाने, मधुशालाएँ, बीयर-बार. डान्स-बार आदि होती हैं, उसी प्रकार विभिन्न बाजारों में, रेलगाड़ियों, हवाई-अड्डों पर धूमपान के लिए भी विशेष कक्ष में धूमपान-बार (Smoke Bar) खोली जानी चाहिए। ऐसे कक्ष बन्द होने चाहिए। ताकि उनका धूम बेकार बाहर निकल कर नष्ट न होने पाए और अधिक समय तक कक्ष में ही मौजूद रहे। ताकि जिस धूमपान के आदी व्यक्ति के पास यदि सिगरेट आदि खरीदने के पैसे नहीं हो तो वह भी मुफ्त में उस कक्ष कुछ समय रुककर वहाँ मौजूद धूम को ग्रहण करके पर्याप्त आनन्द प्राप्त कर सके। कई बाजारों में ऐसे Smoke Bar खुल भी गए हैं।

इसलिए पर्यावरण सुरक्षा तथा आम जनता के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए निविदेन है कि ऐसे स्मोक बार अधिकाधिक स्थलों में खुलवाने हेतु सभी अपना यथासम्भव जोर लगाएँ।

इसी सन्दर्भ में एक श्लोगान/नारा निम्नवत् है:

पान खाओ तो मीठा पान खाओ, पीक निगल लो,

आपको जहाँ तहाँ, थूकने का कोई अधिकार नहीं।

बीड़ी, सिगरेट पीओ शौक से, पर धुआँ निगल डालो,

जहाँ-तहाँ जहर उगलने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं॥

(सबसे बड़ा पाप - वायु प्रदूषण से)

20 Aug 2007

रोमन लिप्यन्तरण हेतु मानकों का निर्धारण भाग-2

रोमन लिप्यन्तरण हेतु मानकों का निर्धारण भाग-2
Indic Scripts Roman Transliteration Standardisation2

भारतीय लिपियों के पाठ को "रोमन लिपि में लिप्यन्तरण हेतु मानक-निर्धारण" विषय पर मेरे पूर्व आलेख पर श्रीशजी ने तथा पीयूष जी ने एवं अनुनाद जी ने कुछ महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी प्रश्न उठाए हैं, जिनके जबाब निम्नवत् प्रस्तुत हैं:

प्रश्न : क्या यह रोमन लिप्यन्तरण स्कीम हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं के डैटाबेस प्रबन्धन कार्यों के लिए अनुकूल है?

उत्तर : बिल्कुल नहीं। क्योंकि डैटाबेस के लिए हरेक फील्ड का आकार (field size) निर्धारण आवश्यक होता है, जिसके लिए वर्ण-गणना (character count) हेतु हरेक वर्ण के लिए एक alphabet ही होना जरूरी एवं सुविधाजनक है। इसमें चूँकि एक वर्ण के लिए एकाधिक वर्ण (alphabet) को लिया गया है, अतः aphabetical sorting, indexing, processing आदि भी अत्यन्त कठिन व लगभग असम्भव हो जाते हैं।

प्रश्न : क्या यह हिन्दी (एवं अन्य भारतीय भाषाओं) के लिए सबसे अच्छी पाठ प्रविष्टि प्रणाली (Input Method) हो सकती है?

उत्तर : जी नहीं, एक वर्ण के लिए एक ही कुञ्जी (key-stroke) दबाना पड़े तभी कीबोर्ड पर इनपुट सहज होता है। इसमें एक वर्ण के लिए एकाधिक कुञ्जियों का प्रयोग करना पड़ता है।

प्रश्न : वर्तमान हिन्दी(देवनागरी) युनिकोड में वर्णक्रमानुसार छँटाई (alphabetical sorting) करना सम्भव तो हो ही रहा है, इसमें क्या कमियाँ हैं?

उत्तर : वर्तमान हिन्दी (तथा अन्य भारतीय भाषाओं) के युनिकोड मानक आक्षरिक (Syllablic) पद्धति पर आधारित हैं, वर्णात्मक (Alphabetical) पद्धति पर नहीं। जिसके कारण शुद्ध छँटाई (Sorting) मौलिक (default) रूप से उपलब्ध होना असम्भव है। देवनागरी वर्णों/चिह्नों/अक्षरों का कूट-निर्धारण भी सही क्रम में नहीं किया गया है। इसके लिए युनिकोड के प्राधिकारी स्पष्ट करते हैं कि sorting या collation युनिकोड कूट-निर्धारण के कार्यक्षेत्र की सीमा से बाहर की बात है। इसके लिए अलग से रुटीन बनाए जाने चाहिए। देवनागरी में युनिकोड में छँटाई (collation chart) के लिए अलग चार्ट का उल्लेख किया गया हैं। किन्तु syllablic approach तथा चन्द्रबिन्दु, अनुस्वार तथा विसर्ग का क्रम निर्धारण न हो पाने के कारण ये हिन्दी शब्दकोश, हिन्दी से अंग्रेजी शब्दकोश, सन्धि, सन्धि-विच्छेद, समास, वाइल्डकैड (WildCad) प्रयोग, प्राकृतिक भाषा संसाधन (NLP) आदि के क्षेत्र में विकराल समस्या खड़ी कर देते हैं। इस विषय पर उदाहरण सहित अलग तकनीकी आलेखों में स्पष्ट किया जाएगा।

प्रश्न : अब हिन्दी (देवनागरी) में कम्प्यूटर में पाठ प्रविष्टि (Entry, Input) तथा संसाधन के लिए 8-बिट फोंट प्रणाली, तथा अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकृत 16-बिट युनिकोड प्रणाली उपलब्ध है, वेबपृष्ठों पर भी हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं में भारी परिमाण में सामग्री प्रकाशित होने लगी है, फिर इस "रोमन ट्रासलिटरेशन योजना के मानकीकरण की क्या आवश्यकता है?"

उत्तर :

यह सत्य स्वीकार करना ही होगा कि विश्व की 600 अरब जनसंख्या में से अंग्रेजी(रोमन) के प्रयोगकर्ता लगभग 300 अरब से अधिक ही होंगे, जबकि हिन्दी (देवनागरी) लिपि में लिखने/टाइप-करनेवालों की संख्या 0.001 प्रतिशत भी नहीं होगा। इस लिपि का असली नाम लेटिन (Latin) है। युनिकोड में लिपि का असली नामकरण एवं बेसिक लेटिन (Basic Latin) हुआ है, जो पूर्व ASCII (Amecian Standard for Information Interchange) की ही प्रतिछवि या प्रतिरूप है। कम्प्यूटर के मूल संचालन कमाण्ड कूट (Controlling Commands) इस कोड-सेट के आरम्भिक 32 स्थानों में विराजमान हैं। अतः इसके बिना कम्प्यूटिंग के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता।

रोमन/लेटिन ध्वनि-विज्ञान की दृष्टि से चाहे जितनी दुरुह और बेतुकी क्यों न हो, परन्तु तकनीकी रूप से सबसे सहज लिपि यही है। एक समान स्थिर चौड़ाई वाले (FixWidth), स्वतन्त्र व किसी पर न चढ़ने वाले (non-overlaping) अक्षरों, तथा सरल बायें से दायें (Left to Right) क्रम में लिखी जाने आदि तकनीकी सरलताओं के कारण यह टाइपराइटरों, मैनुअल तथा इलेक्ट्रॉनिक केलकुलेटरों, प्राचीन छापाखानों से लेकर कम्प्यूटर के मौलिक संसाधान के सर्वाधिक अनुकूल रही है। कम्प्यूटर का बायोस (Bios) तथा सीस्टम् कर्नेल तथा समस्त प्रोग्रामिंग इसी पर आधारित होते हैं।

लेटिन/रोमन को संस्कृत, हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं/लिपियों, यूरोपीय, अमेरिकी तथा विश्व की भाषाओं/लिपियों के विविध उच्चारणों को प्रकट करने के लिए अनुकूल बनाने के लिए अनेक वर्षों से शोध एवं अनुसन्धान होते रहे हैं, अनेकानेक संयुक्ताक्षरों, लिगाचर्स (Ligatures) का आविष्कार तथा प्रचलन हुआ है। अब तक युनिकोड 5.0 में निम्नलिखित 11 श्रेणियों में इसके विभिन्न वर्णों के कूट-निर्धारण तथा मानकीकरण हो चुका है:--

Basic Latin
Latin-1
Latin Extended A
Latin Extended B
Latin Extended C
Latin Extended D
Latin Extended Additional
Latin Ligatures
Fullwidth Latin Letters
Small Forms
(see also Phonetic Symbols)

किन्तु विश्वभर में अधिकांश लेखन, प्रकाशन, पठन-पाठन मूल लेटिन (Basic Latin) में ही होता रहा है। इसके परिवर्धित (Extended) वर्णों के बारे में विशिष्ट लोगों को ही जानकारी होती है तथा आम लोग उन्हें समझ नहीं पाते।

भले ही विश्व में रोमन/लेटिन के उपयोगकर्ता आधे से अधिक हों, संस्कृत, हिन्दी तथा अन्यान्य भारतीय भाषाओं के पाठ(text) ही नहीं, विश्व की विभिन्न भाषाओं/लिपियों के विविध साहित्य का का उद्धरण देते एवं उल्लेख करने के लिए भी लेखन/टंकण हेतु बेसिक रोमन/लेटिन का ही प्रयोग किया जाता रहा है।

हिन्दी(देवनागरी- विशेषकर संस्कृत ) तथा ब्राह्मी आधारित भाषाओं/लिपियों, के वर्णों, शब्दों, वाक्याशों, वाक्यों, पदों, श्लोकों, काव्यों को लिखने/टंकित करने या कुछ न कुछ मात्रा में कहीं न कहीं उल्लेख करने की आवश्यकता विश्व के लगभग 100 अरब लोगों को तो पड़ती ही है। इसके लिए वे अपने अंग्रेजी-भाषा में प्रस्तुत आलेखों में रोमन/लेटिन लिपि में प्रचलित विभिन्न पद्धतियों का सहारा लेते रहे हैं-- चाहे वह ITrans हो, Hitrans हो, ISCII-RT हो, या Extended ASCII हो, Velthius हो, Harvard-Kyoto हो, या csxplus हो या अन्य पद्धतियाँ। इन सबके बीच कोई तालमेल नहीं है। हरेक पद्धति कुछ अलग-अलग है। और सभी में कुछ न कुछ खामियाँ हैं। IPA (Internation Phonetic Alphabet) भी भारतीय लिपियों के पाठ को पूर्णतः सही रीति लिपिबद्ध करने में समर्थ नहीं हैं। अतः उपलब्ध पद्धतियो के अच्छे गुणों को समेकित कर "सरल मूल रोमन लिपि में भारतीय भाषाओं/लिपियों" के पाठ का यथासम्भव सठीक लिखन-पठन की अनुकूलता के साथ एक पद्धति का "मानकीकरण" नितान्त आवश्यक है।

इण्टरनेट पर तलाश करने पर हम पाते हैं कि अभी तक संस्कृत, हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं का 95% ज्ञान-भण्डार/साहित्य/काव्य/तकनीक रोमन लिपि में ऐसी विभिन्न पद्धतियों में वर्षों की तपस्या से सुरक्षित कर संजोया गया है, तथा लम्बे समय तक भविष्य में भी ऐसा ही होता रहेगा।

यह कटु सत्य है कि International Compatibility या विश्वभर के लोगों को सरलता से अपने विचार तत्काल समझाने/सम्प्रेषित करने के लिए Roman/Latin लिपि के अलावा फिलहाल और कोई तुलनीय विकल्प नहीं है।

युनिकोड के प्रचलन के दशक-भर के बाद भी अभी तक 500 चिट्ठाकार एवं लगभग 5000 उपयोगकर्त्ता ही हिन्दी देवनागरी का उपयोग कर रहे हैं, तो विश्वभर के लोगों को सीखने/सिखाने में कितनी सदियाँ लगेंगी? तबतक क्या विश्वभर को भारतीय लिपियों के शब्दों का उल्लेख करने से रोक सकेगा कोई?

क्या आपको तमिल या कन्नड़ या हिब्रू या अरबी लिपि मालूम है? यदि कोई व्यक्ति अपना नाम भी इन लिपियों में लिखकर आपको दे तो क्या आप उसे पढ़ पाएँगे? यदि वह रोमन में लिखकर दे तो संसार का कोई भी व्यक्ति पढ़ ही लेगा। इसी प्रकार यदि आप देवनागरी लिपि में अपने तकनीकी लेख अपने चिट्ठे पर लिखते हैं। कई लोगों ने कविताएँ, श्लोक, गीत भी चिट्ठे पर लिखे हैं। यदि अफ्रीका, स्पेन, कोरिया आदि का कई व्यक्ति इन्हें पढ़ना चाहे, जिसे देवनागरी लिपि न मालूम हो तो वह कैसे पढ़ पाएगा? इसलिए भोमियो पर पीयूष जी द्वारा प्रदान की गई Roman- x-literation सेवा एक महान योगदान है, जिससे कम से कम संसार का हर व्यक्ति भारतीय लिपियों में किसी वेबसाइट पर लिखे गए पाठ को रोमन लिपि में ही सही तत्काल बदलकर पढ़-समझ तो सकता है। मेरे विचार में इसके लिए पीयूष जी को नोबल पुरस्कार नहीं तो कम से कोई न कोई अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार अवश्य दिया जाना चाहिए।

अतः अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर "भारतीय भाषाओं के पाठ को रोमन लिपि में लिखने-पढ़ने" में एकरूपता हेतु एक मानक का निर्धारण किया जाना आवश्यक है।

हालांकि वर्तमान प्रस्तावित रोमन लिप्यन्तरण योजना भी त्रुटियों/समस्याओं से मुक्त नहीं है, किन्तु इस का अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यावहारिक प्रयोग/टेस्टिंग करके कुछ न कुछ सर्वानुकूल समाधान अवश्य निकाले जाने चाहिए।

उदाहरण के लिए:

क्या आपको तमिल या कन्नड़ या हिब्रू या अरबी लिपि मालूम है? यदि कोई व्यक्ति अपना नाम भी इन लिपियों में लिखकर आपको दे तो क्या आप उसे पढ़ पाएँगे? यदि वह रोमन में लिखकर दे तो संसार का कोई भी व्यक्ति पढ़ ही लेगा।

इसी प्रकार यदि आप हिन्दी(देवनागरी) में अपने लेख, कविताएँ, श्लोक, गीत अपने चिट्ठे पर प्रकाशित करते हैं, यदि अफ्रीका, स्पेन, कोरिया आदि का कई व्यक्ति इन्हें पढ़ना चाहे, जिसे देवनागरी लिपि न मालूम हो तो वह कैसे पढ़ पाएगा?

इसलिए भोमियो पर पीयूष जी द्वारा प्रदान की गई Roman- x-literation सेवा एक महान योगदान है, जिससे कम से कम संसार का हर व्यक्ति भारतीय लिपियों में किसी वेबसाइट पर लिखे गए पाठ को रोमन लिपि में ही सही तत्काल बदलकर पढ़-समझ तो सकता है। मेरे विचार में इसके लिए पीयूष जी को नोबल पुरस्कार नहीं तो कम से कोई न कोई अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार अवश्य दिया जाना चाहिए। हालांकि उनकी इस योजना में अभी काफी कुछ लिपिवार विशेष सुधार की जरूरत है।

हालांकि वर्तमान प्रस्तावित रोमन लिप्यन्तरण योजना भी त्रुटियों/समस्याओं से मुक्त नहीं है, किन्तु इस का अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यावहारिक प्रयोग/टेस्टिंग होने पर ही कुछ न कुछ सर्वानुकूल समाधान निकल सकते हैं। मानकीकरण अनेक फीडबैक तथा व्यावहारिक प्रयोगों के बाद ही किया जाना चाहिए, ताकि यथासम्भव त्रुटिहीन और टिकाऊ हो।

(जारी...)