18-Sep-2007

रामसेतु तोड़ने सम्बन्धी पर्यावरणीय दृष्टि

हिन्दी चिट्ठाकार गूगल समूह की इस परिचर्चा में रामसेतु को तोड़ने के बारे में कई विचार व्यक्त किए गए हैं। अखबारों में इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क-वितर्क दिए जा रहे हैं। कई लोग इसे राजनीतिक खेल कहते हैं तो कई अन्य इसे धार्मिक और पौराणिक आस्था का प्रतीक मानकर इसकी रक्षा की दुहाई दे रहे हैं।

रामेश्वरम् के धनुषकोड़ि से लेकर श्रीलंका के मुन्नार टापू तक रामसेतु को तोड़ने के मामले को धार्मिक आस्थाओं और राजनैतिक वितर्कों से परे हटाकर शुद्ध वैज्ञानिक तथा तकनीकी दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार ये पत्थर मूँगा (Coral) की चट्टानों के टुक़ड़े हैं। इस क्षेत्र के समुद्र तल में मूँगे की पर्वताकार चट्टानें बहुतायत से पाई जाती हैं। कुछ अन्य वैज्ञानिकों के अनुसार ये विशेष प्रकार के चूना-पत्थर (Lime Stone) हैं।

आज भी वहाँ समुद्र किनारे पर ऐसे पत्थर मिलते हैं जो पानी के ऊपर तैरते हैं। हमारे कुछ मित्र भी एक ऐसा ही 12"x10"x9" के आकार का पत्थर का टुकड़ा वहाँ से उठाकर लाये थे जिसे एक स्थानीय मन्दिर में एक पानी के एक कुण्ड में सुरक्षित रखा गया है। यह पत्थर पानी पर तैरता रहता है। सैंकड़ों लोग, बच्चे से लेकर बूढ़े तक प्रतिदिन आते हैं उस पत्थर को अपने हाथों से पकड़कर पानी में डुबाते हैं और उनके छोड़ते ही वह पत्थर फिर से पानी के ऊपर आ जाता है और तैरने लगता है।

इस पुल के अस्तित्व को व्यावहारिक दृष्टि के अधिक संपुष्टि इस तथ्य से मिलती है कि आज भी सड़क या रेलमार्ग से रामेश्वरम् जाने के लिए 'रामनाथपुरम् मण्डपम्' से लेकर रामेश्वरम् के द्वीप तक समुद्र के ऊपर एक पुल बना हुआ है, जिसके ऊपर से होकर ही मोटरगाड़ियों तथा रेलगाड़ी को गुजरना पड़ता है। इस पुल ऊपर से बस या कार में बैठे बैठे नीचे के छछले समुद्री जल का, रंगारंग मूँगे की चट्टानों का जो सुरम्य दृष्य दिखाई देता है वह चित्ताकर्षक होता है और पर्यटकों तथा श्रद्धालुओं के मन पर अमिट छाप छोड़ जाता है।

इस बारे में रामायण में वर्णन है कि जब रावण सीता का अपहरण करके लंका ले गया था तो भगवान राम सुग्रीव, हनुमान तथा वानर सेना के सहयोग के लंका जाने के लिए प्रस्थान करते हैं किन्तु बीच में समुद्र पड़ता है। जिसे पार करने का उपाय बताते हेतु समुद्र देवता स्वयं प्रकट होकर सागर पर पुल बनाने की सलाह देते हुए कहते हैं कि नल-नील नामक के दो वानर-शिल्पी हैं, जिनके स्पर्श करने पर पत्थर भी पानी पर तैरने लगते हैं। उनके द्वारा सागर पर पुल बनवाइए--

"नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिँ जलधि प्रताप तुम्हारे।।
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।"

ऐसे पानी के ऊपर तिरनेवाले हल्के पत्थर अपने आप में एक आश्चर्य हैं और विज्ञान तथा तकनीकी को चुनौती देते हैं। यदि ऐसे पत्थरों की खान कहीँ आसपास हो, या कृत्रिम रूप से ऐसे पत्थर बनाए जा सकें तो रामेश्वरम् से लंका तक समुद्र पर यह पुल दुबारा बनाया जा सकता है। भले ही पौराणिक कथा कुछ भी हो या न हो, गूगल अर्थ के उपग्रह चित्र में पानी के नीचे डूबा हुआ पुल जैसा कई किलोमीटर लम्बा पहाड़ जैसा उभार स्पष्ट दिखाई देता है।



फिलहाल यह समस्या है वर्तमान ब़ड़े जहाजों को दक्षिणी हिन्दुस्तान के बन्दरगाहों पर आने के लिए पूरे श्रीलंका का चक्कर लगाकर आना पड़ता है। "सेतुसमुद्रम्" परियोजना के अन्तर्गत यहाँ से एक शार्ट-कट समुद्री मार्ग को प्रशस्त करने हेतु समुद्र के नीचे इस पुल जैसे उभार को तोड़कर समुद्र को गहरा बनाने की सलाह दी है कुछ अन्तर्राष्ट्रीय इंजीनियरों ने, ताकि समुद्री मार्ग कुछ किलोमीटर कम हो सके। लेकिन इससे पड़नेवाले पर्यावरणीय खतरों के बारे में भी विचार विमर्श कर लेना चाहिए।

भूस्थैतिकी दृष्टि से यह पुल(Bridge) लंका के टापू (Island) को स्थिर रखने में मदद कर रहा है। अरब सागर और हिन्द महासागर के बीच एक मजबूत बाँध का कार्य कर रहा है। इसके टूट जाने से भारत तथा श्रीलंका के तटवर्ती क्षेत्र में व्यापक हलचल और पर्यावरणीय खतरे पैदा हो सकते हैं। भूस्खलन, भूकम्प तथा सुनामी जैसी विपदाओं के आ़ने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता।

दूसरी ओर प्रगति के लिए यह भी जरूरी है कि अच्छे शार्टकट समुद्री मार्गों, तीव्र गति वाले सड़क मार्गों का निर्माण तथा विकास हो। उदाहरण के लिए अगर स्वेज नहर का निर्माण उस काल में नहीं किया गया होता तो शायद विश्व का समुद्री यातायात भी इतना सुगम नहीं होता। लेकिन स्वेज नहर धरातल की मिट्टी को खोद खोद कर बनाई गई थी। विस्फोटकों से ब्लास्ट करके नहीं। बीच की पूरी खुदाई खत्म होने के बाद ही अन्त में समुद्र से जुड़नेवाले धरातल को खोद कर समुद्र के जल को प्लावित किया गया था इसमें।

किन्तु आज ऐसे कार्य मानवीय श्रम से धीरे धीरे किए जा सकते हैं क्या? और फिर समुद्र के नीचे? यदि किए भी जाएँ तो कितने गोताखोर श्रमिक कितने समय तक पानी के नीचे रहकर पत्थरों को धीरे धीरे खोद पाएँगे? ऐसा कोई खुदाई करनेवाला पनडुब्बीनुमा डोजर भी तो नहीं चलेगा वहाँ। आज सामान्य छोटे नदी- बाँधों में जमी रेत तथा मिट्टी के टापुओं तक तो ड्रेजरों के सहारे खोद-खाद कर हटाया नहीं जा पा रहा है, फिर ऐसे सागर-तलीय परियोजनाओं की परिकल्पना कैसे कर ली जाती है?

सागर तल में खुदाई के साथ साथ तत्काल निर्माण, स्तम्भों की कंक्रीटिंग आदि भी जरूरी होगी। टूटे हुए पत्थरों के टुकड़ों तथा रेत आदि को वहाँ से हटाकर सुरक्षित रूप से कहाँ स्थानान्तरित करना होगा, वह भी इस प्रकार से कि अवांछित से रूप सागर जल में लहरों की चपेट में इधर उधर फैल न जाएँ? इस कार्य में कितने वर्ष लगेंगे? कितना खर्च आएगा? आज के सुविधाखोर या आरामखोर अभियन्तागण तो सिर्फ विस्फोटकों से उड़ाने का सरल तरीका ही अपनाएँगे, जो अत्यन्त खतरनाक होगा।

इस पुल को किसी विशाल आरी जैसे उपकरणों से काट काट कर तो अलग नहीं किया जा सकेगा। न ही मानवीय श्रम द्वारा धीरे धीरे टुकड़े टुकड़े करके खोदा या काटा जाएगा। सिर्फ डायनामाइट आदि विस्फोटकों के माध्यम से ही ब्लास्ट करके विध्वंश करके ही तोड़ा जाएगा। ऐसी हालत में न ही काटे गए या उखाड़े गए पत्थरों को या पहाड के टुकड़ों को बिखरने, गिरने या फैलने से रोका जा सकेगा। न ही इससे समुद्र के जल में पैदा होनेवाले विशाल व भयंकर भँवर या महाज्वार को बाँधा या रोका जा सकेगा। इस आशंका से इन्कार भी नहीं किया जा सकता कि इस प्राकृतिक बाँध या प्राचीनकालीन पौराणिक वानर सेना द्वारा निर्मित इस पुल जैसी चट्टानों को ब्लास्ट करके उड़ाने से पर्यावरण को कितना भयंकर नुकसान होगा। प्रकृति से इस प्रकार छेड़छाड़ करना वास्तव में "विनाश काले विपरीत बुद्धि" ही कही जाएगी।

और फिर इस तोड़ फोड़ तथा समुद्री मार्ग पर बड़े जहाजों की आवाजाही से मूँगे की चट्टानों से लेकर मत्स्यों एवं जल-जीवों की भारी हानि तो होगी ही। समुद्र जल में घुलनेवाले जहरीले एवं दूषित पदार्थों से इस तट का समुद्र जल नहाने लायक भी न रहेगा।

सरकार के सम्बन्धित प्राधिकारियों को इस प्रकार विदेशी दबाव में आकर या अन्तर्राष्ट्रीय अभियन्ताओं की बुद्धि को ही सर्वोपरि मान्यता देकर उतावली में प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कदापि नहीं करनी चाहिए।

प्रकति, पर्यावरण, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों को रोकने के लिए जहाँ सारा विश्व अपनी चिन्ता जता रहा है। इस पृथ्वी को बचाने का भरसक प्रयास कर रहा है। जहाँ अनेक विकसित राष्ट्र पर्यावरण तथा शान्ति की दुहाई देकर परमाणु समझौते कर रहे हैं, वहाँ सागर के नीचे के धरती को इस प्रकार विध्वंश करके कौन-सी बुद्धिमत्ता, कौन-सी विनिर्माणता, कौन-सी रचनात्मकता का परिचय देगे? कई बुद्धिजीवि आशंका व्यक्त करते हैं शायद यह सुझाव भारत और श्रीलंका दोनों को नुकसान पहुँचाने के उद्दश्य से किन्हीं आतंकियों ने दिया हो?

अतः विश्व के बुद्धिजीवियों को पर्यावरणीय दृष्टि से एक बार फिर से इस बारे में विचार करना चाहिए।

इसके साथ-साथ सामरिक सुरक्षा सम्बन्धी खतरों पर भी विचार आवश्यक है। इस शार्टकट समुद्री मार्ग से केवल व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही ही नहीं होगी। भले ही अन्तर्राष्ट्रीय युद्धपोतों को भारत की समुद्री सीमा से न गुजरने दिया जाए, लेकिन मिसाइलों से लैस पनडुब्बियों तथा गुप्तचर पनडुब्बियों को छुपकर निकलने से रोकने में तो चूक होने की आशंका रहेगी ही। जो भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए भयंकर खतरा हो सकता है।

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आगे भाई आशुतोष ने टिप्पणी में बिल्कुल वाजिब प्रश्न किया है कि "तैरनेवाले पत्थरों से बना यह पुल डूब कैसे गया?" इस प्रश्न का उत्तर निम्नवत् है--

यह पुल पानी में पूरा डूबकर सागर तल में नहीं चला गया है, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग आदि के कारण कालक्रम में समुद्र का जल स्तर के बढ़कर ऊपर उठने के कारण पानी के कई फीट नीचे चला गया है। इसके आसपास कई किलोमीटर की धरती में भी सागर जल फैल गया है। यहाँ के आसपास के क्षेत्र में सागर का पानी काफी छिछला दिखाई देता है। कहीं कहीं तो काफी दूर तक सिर्फ तीन-चार फुट सागर जल ही मिलता है।

उदाहरण के लिए गत एक सप्ताह पहले जगन्नाथ पुरी के समुद्र किनारे कई फर्लांग तक फैली विशाल रेत का मैदान तथा इसके किनारे की मेराइन ड्राईव सड़क तक समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण बह गई है। समुद्र किनारे निर्मित बड़े बड़े होटलों, ईमारतों तक समुद्र की लहरें आने लगी हैं। बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन के खतरे उत्पन्न हो रहे हैं। बर्फ पिघलने के कारण धीरे धीरे हिमालय की ऊँचाई कम होती जा रही है तथा सागर का जलस्तर बढ़ता जा रहा है। अतः शास्त्र-पुराणों में वर्णित क्रमशः 'प्रलय' होने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता।

कई ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक शोध इस पुल को लेकर किया जा चुके हैं। कई गोताखोर इसका परीक्षण करके आ चुके हैं।

कुछ विद्वानों तथा शोधकर्ताओं के अनुसार--

इसका पुल का फैलाव तो प्राकृतिक पठार या पहाड़ जैसा ही लगता है। किन्तु दो पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए जो खाँचेनुमा बन्धन (Auto-locking design) दिखाई देते है, उन्हें देखकर अनुमान लगाना पड़ता है कि यह मानव निर्मित ही होंगे, जो विशेष अभियान्त्रिकी कला-कौशल का अद्भुत नमूना है। इस पुल के पुरातात्विक अवशेषों नीचे गहराई तकं फिर अनन्त सागर जल दिखाई देता है।

परीक्षण के लिए यदि ऐसे तैरनेवाले पत्थर को पकड़ कर पानी के अन्दर जब तक डुबोये रखते हैं, तब तक वह पत्थर डूबा रहता है। उसे छोड़ते ही वह पानी से हल्का होने के कारण ऊपर आ जाता है और तिरने लगता है। अतः परस्पर पत्थर जुड़े तथा बन्धे होने के कारण यह पानी के नीचे अदृश्य है। ऐसे तैरनेवाले पत्थर छिद्रोंवाले तथा कुछ भुरभुरे रेशेदार एजबेस्टेस्टस पत्थर की प्रजाति के होते हैं। कुछ पत्थरों को जबरन पानी के अन्दर डुबोने पर हवा के बुदबुदे बाहर आते हैं, जिससे लगता है कि इन पत्थरों के छिद्रों में वायु फँसी होने के कारण ये पानी के आयतन से अधिक स्थान घेरने के कारण हल्के होकर पानी पर तिरते हैं।

यदि इस पुल के पत्थरों के खाँचेनुमा बन्धनों को तोड़ा जाए या अलग किया जाए तो वे तैरने वाले पत्थर ऊपर आकर तिरने लग सकते हैं। कई लोगों को द्वारा इस पत्थर के सैम्पल लेने के ऐसे प्रयास किए जा चुके हैं। पुल के सिरों के नीचे विशाल पर्वतनुमा स्तम्भाकार आधार जैसी चट्टानें होने का भी आभास मिला हैं। इस पर किसी धार्मिक भावना से नहीं, बल्कि शुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार किया जाना अपेक्षित है।

रामायण तथा महाभारत आदि सन्त-महात्माओं, ऋषि-मुनियों द्वारा रचित प्रेरक और पूज्यनीय महाकाव्य हैं, इन्हें अच्छा साहित्य माना जाना चाहिए, किन्तु ठोस तथ्यपूर्ण इतिहास नहीं। हमें किसी राजनैतिक दल द्वारा प्रचारित धार्मिक भावनाओं, आस्थाओं पर कोई टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।

12 comments:

Isht Deo Sankrityaayan said...

मुश्किल यह है पुल के बनने या बिगड़ने को लेकर कोई परेशान नहीं है. इस परियोजना को मंजूरी वाजपेई सरकार ने दी थी और इस पर राजनीती भी भाजपा के लोग ही कर रहे हैं. वे पुल के आर्थिक या पर्यावरणीय मसले उठाने के बजाय केवल सामजिक विद्वेष भड़काने में लगे हैं. इसे राष्ट्रीय आर्थिक हितों से जोड़ने के बजाय समुदाय विशेष की आस्था तक सीमित करके नष्ट कर दे रहे हैं. इसका क्या करिएगा?

कंचन सिंह चौहान said...

ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी के लिये धन्यवाद।

ashutosh said...

bhai mere itna to bataa do ki tairte pattharon wala pul doob kaise gaya! is doobe pul ko ramjise jod kar hamaari aastha ko chit mat pahuncha ,bhaiye1

रवीन्द्र प्रभात said...

आपकी जानकारी बहुत महत्वपूर्ण है।

हरिराम said...

‌@ ashutosh
आपका प्रश्न बिल्कुल वाजिब है, इसके उत्तर लेख के नीचे कुछ पैरा और जोड़कर दे दिए हैं, कृपया फिर से पढ़ें।

Neeraj नीरज نیرج said...

महत्वपूर्ण जानकारी. हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि अपनी सुविधा के लिए कुदरती संरचनाओं से कम से कम छेड़छाड़ करे.
रहा सवाल इसके विरोध या समर्थन का तो उन्हें आपका यह लेख सही जानकारी देता है. संतुलित आलेख.. आभार

Shrish said...

अच्छी जानकारी, दुःख की बात है कि इस विषय पर पर्यावरण की दृष्टि से विचार किया ही नहीं जा रहा है।

नाहर said...

हरिरामजी
एकौर नुकसान का आप जिक्र करना भूळ गये, इस सेतु के तोड़ते समय समुद्रीय जीव सृष्टी को कितना नुकसान होगा? संभव है कि कई तरह की मछलियों की या अन्य जीवों की प्रजाति सम्पूर्ण रूप से खत्म हो जाये।

ashutosh said...

aapne kitnee achchhee baat kahee hai ki ramaayan mahaabharat saahitya hain , thos tathyapurn itihaas nahi!

theek yahee baat, bilkul yahee baat ASI ne kahee thee.ram ke mithak ke prati purn samman prakat karte huye.ASI affidevit kee mool prati padhen.
karuna bhee mooltah yahee kate hain ,lekin ek alag tewar men.

mool mudda hai--kya sahitya ko ya mithak ko vaigyanik itihaas maan liya jaye?

aur koi ise n maane to use hi nahi ,uske prant ke kisi nirdosh busyatri/niwasee tak ko jalaa kar maar daalaa jaye?

patthhar tairte honge!
samandar me itte bade bade jahaaj tairte hai to asbestas ke bhurbhure pattharon[!] kee kya bisaat!!

lekin sankriti nafrat ke aur lahoo ke samandar me kabhee tair nahi saktee.hameshaa doob jaatee hai.

Dr Prabhat Tandon said...

बहुत से विचारणीय प्रशन आपने इस लेख से उइठा दिये ! लेकिन क्या किया जाये इन स्वार्थ-लोलुप नेताओं का जिनको हर वस्तु को धर्म के चशमे से देखने की आदत जो पड गयी है ।

Good listener said...

Achhi jankari ke roop me kafi achhe tathyon ko ekatrit kiya gaya he evam prabhavpurn dhang se prastut kiya gaya he uske lie lekhak prashansa ke patra hain... main abhi tak setusamudram pariojna ke paksh ya vipaksh me apni ray nahi bana paya hu kyoki me uske fayde ya nuksan ke bare me vastavik jankari prapt nahi kar paya hu... mera prashna un dharmik asthaon se jude he jo ki un prachin dharmik pustakon ko ek tathya ki tarah prastut karte hai... mere gyan me lagbhag sabhi dharmon me tathya ke room me apne apne dharmagranthon ko hi adhar banaya gaya he.... agar in pustakon ko amanya kar diya jae to koi bhi dharm apne itihas ki jankari chahe vah 500 yrs purani ho ya 5000 yrs purani, ka saboot nahi de paega.. to kya sabhi dharmon ki manyataen purntah atarkik hain , aur jese kisi vastu ya manyata ko manya karne hetu saboot manga jata he to use amanya karar dete hue bhi saboot prastut hone chahiye bina uske kisi bhi samvedansheel mamle me apni raay rakhna bhi thik nahi.. aaj jo vyakti agar sadmarg par he to uska karan yahi dharmgranth evam inki manyataen hai.. agar ye ved puran evam anya dhamgranth ese hi ek upanyas ki tarah likhe gae hote to aaj aayurvedik chikitsa padhatiyon ko jise aaj sabhi viksit desh bhi manytaen dete fir rahe hai, ka laabh nirogyata ke lie nahi liya ja sakta tha.. vyakit ko sabhya banane me yahi prachin pustaken hi to sahayak rahi hai nahi to manushya paap karte hue kabhi na darta evam janvaron se khud ko bhinn bhi na kar pata..

Anonymous said...

जानकारी तथ्‍यपरक है । धन्‍यवाद । मुद्दा है क्‍या व्‍यापारिक फायदों के लिए प्रकृति से छेड़छाड़ करना चाहिए । न तो राम कहीं बीच में आते है और ना धर्म । आज पूंजीवाद सर्वत्र हावी है । हम जैसे आम जन तो पेटभरने इतना ही कर पा रहे हैं । फिर आशुतोष भाई मुद्दे को इतर रूप देकर क्‍या कहना चा‍हते हैं । ग्‍लोबल वार्मिंग प्रदूषण और भागमभाग में हमारा जीवन सरल हुआ या कठिन । तरक्‍की के मायने जेब मे रूपये मात्र नहीं बल्कि सर्वांगीण विकास है । एस्‍बेस्‍टास पत्‍थर पानी पर तैरतें हैं यह वैज्ञानिक सत्‍य है आशुतोषभाई माने तब ही तैरेगें ऐसा नहीं है । जगह जगह ये पत्‍थर लाकर लोगों ने पानी में छोड़ रखें है । ऐसा ही एक पत्‍थर हमारे शहर के एक स्‍थान पर रखा गया है । एक प्रश्‍न और .... क्‍या ईसा मसीह से या किसी अन्‍य धर्म की मान्‍यता से संबंधित किसी स्‍थान को उस धर्म के मानने वाले आज के प्रगतिकर्ता छेड़ने का ‍साहस कर सकतें हें । तैरते पत्‍थरों का पुल डूब कैसे गया जैसे प्रश्‍न केवल वर्ल्‍ड टावर को फिर से खड़ा कर देने जैसा ही है । महत्‍वपूर्ण और मुददे की बातें 1. प्रदुषण 2. मछुआरों की रोजी रोटी 3. प्रकृति से छेडछाड 4. सुरक्षा