15 Feb 2007

बूँद बूँद मिल सागर भरता...

एक बार स्वामी ज्ञानानन्द जी एक वेद-विद्यापीठ के निर्माणार्थ दान में धनराशि संग्रह करने निकले। उन्होंने बहुत सुना था कि सेठ दानमल बड़े दानी हैं। एक दिन शाम को उन्होंने सेठ दानमल के भवन में प्रवेश किया। द्वारपाल ने उन्हें आदर के साथ बैठाया और प्रतीक्षा करने को कहा। इतने में बिजली चली गई। सेठ जी का नौकर मोमबत्ती जलाने लगा। उसने माचिस की एक तीली जलाई, पर वह बुझ गई। फिर उसने दूसरी तीली जलाई, वह भी बुझ गई। उसने फिर तीसरी तीली का प्रयोग कर मोमबत्ती जलाकर उजाला किया। माचिस की तीलियों की बरबादी देखकर सेठ जी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। नौकर पर अंधाधुंध गालियों की बौछार करने लगे।

स्वामी जी यह सब सुनकर अत्यंत निराश हुए। सोचा कि इतना कंजूस-मक्खीचूस व्यक्ति क्या दान देगा। यह सोचकर चुपचाप वहाँ से उठकर वापस आश्रम चले आए। किंतु दूसरे दिन सवेरे उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब सेठ दानमल जी का दीवान एक लिफाफा लिए सेवा में हाजिर था। दीवान ने कहा कि सेठजी के यहाँ से कल बिना बताये उनके चले आने पर, वे काफी दुःखी हुए। उन्होंने दान में यह चेक भिजवाया है। स्वामी जी ने लिफाफा खोलकर देखा कि उसमें एक लाख रुपये का एक चैक है और एक कागज की पर्ची, जिस पर मात्र एक पंक्ति लिखी हुई थी -"बूँद-बूँद मिलकर ही सागर भरता है।"
स्वामी जी को सेठ जी की समृद्धि और संपन्नता का राज समझ में आ गया। वे समझ गए कि मितव्यतिता और कंजूसी में कितना अंतर है।

सच ही है कि लक्ष्मी उसी के पास रहती है, जो उसे सम्हाल कर रखना जानता है। कहा गया है --

क्षणस्य कणस्य चैव विद्यामर्थम् चिन्तयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या, कणे नष्टे कुतो धनम्।।

अर्थात् हर क्षण-क्षण में विद्या और हर कण-कण में धन है सदा यह ध्यान में रखना चाहिए। यदि एक कण-कण नष्ट हो गया तो धन कहाँ बचेगा? यदि एक-एक क्षण भी नष्ट हुआ तो विद्या नहीं रहेगी?

कई सफल कम्पनियों में वित्त विभाग एक-एक पैसे के खर्च पर अत्यंत कठोरता के साथ आपत्तियाँ प्रकट करता है। आंतरिक अंकेक्षण एवं सतर्कता विभाग अत्यंत मुस्तैदी से लागत नियंत्रण हेतु कमर कसे प्रस्तुत रहते हैं। दूसरी ओर विभिन्न प्रकार के विज्ञापनों, खेलों के आयोजनों, जनकल्याण व समाज-विकास कार्यों में करोड़ों रुपये प्रतिवर्ष अन्धाधुन्ध खर्च कर दिए जाते हैं, जो झूठी मान-शान का दिखावा मात्र लगते हैं और कर्मचारी-वर्ग की आँखों की किरकिरी बनते हैं, जिनके वेतन आदि में बढ़ोतरी व सामान्य सुविधा देने आदि के मामले में अनेक वर्षों तक संघर्ष, हड़ताल आदि के बिना प्रबंधन टस-से-मस नहीं होता।

आज कंपनी विपरीत परिस्थितियों में भी लाभ कमा रही है, यह हम सभी के कठोर परिश्रम और हर स्तर पर बर्बादी रोकने के प्रयासों का ही परिणाम है। चाहे वह समय की बर्बादी हो या धन की। बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता। "श्रमेव जयते" -- का नारा एक क्षण भी खोये बिना सदा कुछ कुछ न कार्य करते रहने से ही सफल हो सकता है। संपूर्ण गुणवत्ता प्रबंध का लक्ष्य तभी सफल हो सकता है, जबकि हरेक कर्मचारी सदा सतर्क रहे और हर स्तर पर बर्बादी और सार्वजनिक संपत्ति के दुरुपयोग को रोकने के लिए तत्पर रहे। चाहे कोई कितने ही बड़े ओहदे वाला क्यों न हो। कंपनी के धन के दुरुपयोग की घटना को तुरंत संबंधित प्राधिकारियों की जानकारी में लाना चाहिए।

संपन्नता और मितव्ययिता एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। जो ज्ञानी व्यक्ति होते हैं उनका एक भी संकल्प व्यर्थ नहीं जाता। अतः हमारी बौद्धिक और आर्थिक समृद्धि के लिए आवश्यक है कि हमारा हर क्षण शुद्ध संकल्प में लगे और हर कण का सदुपयोग हो।

वाहनों के प्रदूषण से बचाव का - एक उपाय

आज तीव्रगामी संसार में आरामपूर्ण जीवन शैली के प्रचलन के साथ स्वचालित वाहनों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है, जिनमें मुख्यतः पेट्रोल एवं डीजल का ईंधन रूप में उपयोग होता है। इन वाहनों से निकलनेवाले धुँए में कार्बन-डाई-ऑक्साइड, कार्बन-मोनो-आक्साइड जैसी विषैली गैसे होती हैं, जो मानव एवं जीव जन्तुओं के स्वास्थ्य के लिए घातक होती हैं। वायु में निरन्तर घुलते भारी जहर के कारण लोगों को श्वासजनित अनेकानेक बीमारियाँ लग जाती हैं। साँस उठना, नज़ला, गले व नाक-कान की बीमारियाँ, हृदय रोग, फेंफड़ों का खराब होना आदि अनेकानेक जानलेवा रोगों से शहरों में रहनेवाले अधिकांश लोग पीड़ित रहने लगे हैं, जिनका कोई सही इलाज संभव नहीं होता या ये बीमारियाँ लाइलाज होती हैं।

विशेषकर महानगरों एवं शहरों में वाहनों की संख्या अत्यधिक होने के कारण उनसे निकलनेवाले धुँए से चहुँओर वायु प्रदूषित रहती है। सड़कों तथा चौराहों पर तो साँस लेना तक दूभर हो जाता है। आँखों में जलन होना तो आम बात है।

वाहनों का धुँवा इनकी साईलेन्सर की नली के छोर से निकलता है, जिसका मुँह वाहनों के पीछे की ओर रहता है। पीछे की ओर हवा में जहरीले पदार्थ घुलते जाते हैं। और फिर इस नली का मुँह नीचे ओर झुका होने के कारण धुँए का तेज झोंका पहले सड़क पर टकराता है और अपने साथ सड़क की गन्दी धूल को भी लेकर हवा में उड़ाकर जहरीले तत्वों को कई गुना बढ़ा देता है। लोगों की नाक में यह धुँआ एवं गन्दी धूल घुसकर घातक प्रभाव डालती है।

सड़कों पर वाहन चलाते वक्त हमसे आगे चल रहे वाहन से निकलता धुँआ हमें अत्यन्त खराब लगता है और उस वाहन चालक पर क्रोध भी आता है कि वह अपनी गाड़ी का अनुरक्षण व देखभाल नहीं करता। मोबिल ऑयल सही प्रतिशत में क्यों नहीं डालता या ट्युनिंग ठीक नहीं करवाता। किन्तु हम यह बात नहीं सोचते कि हमारे वाहन से निकलनेवाला धुँवा हमारे पीछे चलनेवाले को कितनी हानि पहुँचाता होगा।

सबसे बुरी स्थिति होती है, जब चौराहों पर लाल बत्ती होने के कारण प्रतीक्षारत वाहन खड़े रहते हैं तो उनका इंजन स्टार्ट रहता है तथा उनसे निकलता धुँवा इतना अधिक गहरा होता जाता है कि आँखों में जलन होने के साथ साथ खाँसी भी आने लगती है एवं साँस उठना शुरू हो जाता है।

महानगरों के अत्यधिक ट्राफिक वाले कुछ चौराहों पर इतना अधिक प्रदूषण व्याप्त रहता है कि व्यक्ति को अपने नाक-मुँह पर मास्क लगाने के बावजूद शुद्ध हवा नहीं मिल पाती। गैस-मास्क का फिल्टर भी कुछ ही मिनटों में धूल व गन्दगी से अवरुद्ध होकर बेकार हो जाता है। विशेषकर चौराहों पर यातायात पुलिस कर्मियों का हाल सर्वाधिक बुरा होता है। गैस-मास्क भी उन्हें बचा नहीं पाते।

लगता है कि अब उन्हें अपनी पीठ पर ऑक्सीजन सीलेण्डर लादे यातायात नियन्त्रण की ड्यूटी निभानी पड़ेगी। जैसे समुद्र में गोताखोर अपनी पीठ पर ऑक्सीजन सीलेण्डर लादे नाक पर नली बाँधे गहरे समुद्र में उतरते हैं, जैसे अन्तरिक्ष यात्री अपने साथ ऑक्सीजन सीलैण्डर लटकाए रहते हैं, वैसे ही जोखिम भरा कार्य होगा चौराहों पर ट्रॉफिक पुलिस या होमगार्डों के लिए वाहनों के संचालन को नियंत्रित करना।

कुछ लोग मजाक में कहते हैं कि यदि किसी को मृत्युदण्ड देना हो तो गोली मारने या फाँसी देने की जहमत उठाने कोई आवश्यकता नहीं, उसे बस दिल्ली के आई.टी.ओ. चौराहे पर खड़ा कर देना चाहिए। वहाँ के भयंकर प्रदूषण से डरकर उसके प्राण स्वतः निकल भागेंगे।

प्रदूषण की इस जानलेवा समस्या को मद्देनजर रखते हुए यातायात पुलिस के लिए सौर-ऊर्जा चालित वातानुकूलित केबिन बनाए गए हैं, जिनमें बैठकर वे यातायात नियंत्रण कर सकें। लेकिन ये काफी मंहगे होने एवं इनकी अत्यन्त सीमित आपूर्ति होने के कारण पर्याप्त बचाव नहीं कर सकते। और फिर ट्राफिक नियमों का उल्लंघन कर भाग निकलने का प्रयास करनेवालों को पकड़ने या रोकने के लिए कुछ पुलिस कर्मियों को तो हर सड़क के जेबरा क्रॉसिंग के पास चहलकदमी करनी ही पड़ती है।

पेट्रोल एवं डीजल के धुँए से प्रदूषण को रोकने के लिए उच्चतम न्यायालय ने वाहनों को सी.एन.जी. से चलाने के आदेश जारी किए हैं, किन्तु इस सुविधा को वाहनों में लगाने के लिए भारी लागत आती है तथा सी.एन.जी. की आपूर्ति भी पर्याप्त न होने के कारण इस आदेश का कार्यान्वयन कठिन है। सी.एन.जी. का मूल्य भी हाल ही में काफी बढ़ा दिया गया है।

प्रदूषण से बचने के लिए आजकल मध्यमवर्ग के लोग भी मंहगी वातानुकूलित कारों या अन्य वाहनों का उपयोग करने लगे हैं। इनमें बैठे व्यक्ति तो प्रदूषण से बच जाते हैं किन्तु दूसरे लोगों के लिए पहले से दुगुना प्रदूषण फैला देते हैं। क्योंकि वातानुकूलन यन्त्र के संचालन के लिए इंजन द्वारा लगभग दुगुने ईंधन की खपत होती है और दुगुना प्रदूषण फैलता है।

संयुक्त राष्ट्र संघ की पर्यावरण परिषद ने भी यूरो-2/यूरो-3 मानक निर्धारित किए हैं जो वाहनों से निकलनेवाले प्रदूषण के स्तर को निम्नतम रखने की तकनीकी की सिफारिश करते हैं। हालांकि नए निर्मित होनेवाले वाहनों में ऐसी तकनीकी लगाई जा रही है। लेकिन संसार भर में अरबों की संख्या में चलनेवाले अरबों वाहनों को फेंका तो नहीं जा सकता। जैसे 15 वर्ष से पुराने वाहनों को दिल्ली जैसे महानगरों में चलाने पर प्रतिबन्ध लगाया गया है। लेकिन फिर भी उनका उपयोग पूर्णतः बन्द नहीं हो पाया है। अतः पुराने वाहनों को महानगरों से निकाल कर अन्य शहरों एवं गाँवों में चलाया जाता है, जो वहाँ के वातावरण को प्रदूषित कर जहरीला बनाते हैं।

प्रदूषण कालियदमन नाग साँप की तरह समग्र संसार रूपी यमुना नदी को जहरीला बना चुका है। इससे मुक्ति के लिए लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं किसी कृष्णावतार की जो इसके मस्तक पर नाच-नाच कर इसे संसार से निकाल भगा दे तो संसार के लोग चैन की साँस लें।

वाहनों से निकलनेवाले पेट्रोल एवं डीजल के विषाक्त धुँए से लोगों को काफी हद तक बचाने के लिए एक सरल एवं कारगर उपाय यहाँ प्रस्तुत हैं ---

जिस प्रकार कल-कारखानों की चिमनी को काफी ऊँचा बनाया जाता है ताकि उनसे निकलने वाला धुँआ मानव, जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों को हानि न पहुँचाए और गहरी ऊँचाई पर हवा के तेज प्रवाह से ऊपरी स्तर में घुलकर निष्क्रिय हो जाए। उसी प्रकार यदि वाहनों के साईसेन्सर-पाइप को ऊपर की ओर मोड़ कर यथासंभव ऊँचाई तक बढ़ा दिया जाए तो धुँआ ऊपर की ओर प्रवाहित होगा। पीछे आनेवाले लोगों के नाक-मुँह से टकराकर सीधे साँस द्वारा फेंफड़ों में प्रवेश नहीं करेगा।

इसके उदाहरण-स्वरूप ट्रेक्टर वाहन को देखें, जिसका साईलेन्सर पाइप ऊपर की ओर निकला रहता है, और धुँआ ऊपर की ओर उड़ता है। न तो पीछे आनेवाले व्यक्ति की साँसों में सीधे जाता है और न ही धरती पर हवा के निचले स्तर को प्रदूषित करता है।

इस उपाय को कार्यान्वित करने में कोई तकनीकी जटिलता भी तो नहीं दीखती है। साईलेन्सर पाइप में ऐसा एक एक्सटेन्शन पाइप मात्र जोड़ने की जरूरत है सौ या दो सौ रुपये मात्र की लागत से हो सकता है।

प्रदूषण नियंत्रण विभाग द्वारा इस सम्बन्ध में तत्काल एक आदेश जारी करके सर्वप्रथम भारी वाहनों -- ट्रक, बस, डोजर, डम्पर आदि इसे लागू किया जाना चाहिए कि उनके साईलेन्सर पाइप में एक्सटेन्शन पाइप जोड़कर धुँए को यथासंभव ऊपर की निष्कासित करने की व्यवस्था की जाए। फिर कार, जीप आदि में इसी उपाय को लागू किया जा सकता है। दुपहिया व तिपहिया वाहनों में भी इस संबंधी आदेश को तत्काल लागू किया जाना चाहिए। क्योंकि वे भी वातावरण को कोई कम प्रदूषित नहीं करते।




नए बननेवाले समस्त वाहनों की साईलेन्सर निकास नली को मूलतः फैक्टरी से ही यथासंभव अधिकाधिक ऊपर की ओर निकालने के बारे में आदेश जारी किए जाने चाहिए।

हालांकि इस उपाय से धरती का प्रदूषण तो कम नहीं होगा, लेकिन सड़कों पर चलते या चौराहों पर लाल बत्ती के कारण खड़े वाहनों से निकलनेवाला प्रदूषक जहरीला धुँवा यथासंभव ऊपर की ओर उड़ेगा तथा कम से कम पीछे खड़े वाहन या व्यक्ति की नाक से सीधे टकराकर उसके फेंफड़ों में जहर नहीं घोलेगा। ट्राफिक पुलिस कर्मियों को साँस लेने में कोई कठिनाई नहीं होगी और वे अपना कर्त्तव्य सही रीति निभा पाएँगे।

यह सरल एवं कारगर उपाय विश्वभर के लोगों को त्रस्त कर देने वाली अनेक बीमारियों एवं तकलीफों से बचा सकता है। क्योंकि धरती से कम से कम 6 से 10 फुट की ऊँचाई तक का हवा का स्तर प्रत्यक्ष प्रदूषण से बचा रह सकेगा, जिसमें अधिकांशतः मानव पैदल चलते हैं, साईकल, रिक्शा जैसे प्रदूषण-रहित वाहनों से यात्रा करते हैं।
इस सरल एवं सस्ते उपाय को कार्य में परिणत करवाने तथा इस बारे में जन-जागृति हेतु व्यापक प्रचार की जरूरत है। वायु प्रदूषण सबसे बड़ा पाप है तो इससे बचाव का प्रयास वस्तुतः सबसे बड़ा धर्म होगा। अतः जनहित में इस विचार के व्यापक प्रचार में सभी से सहयोग की अपील है।

14 Feb 2007

सबसे बड़ा पाप - वायु प्रदूषण

इक्कीसवीं सदी के आरम्भ में यह प्रश्न सबके सामने मुँह बाये खड़ा है -- सबसे बड़ा पाप क्या है? आधुनिक युग का सबसे बड़ा पाप माना जाएगा -- "वायु प्रदूषण"।

कुछ लोगों को यह बात अवश्य आश्चर्य-जनक लगेगी। लेकिन यह एक कटु सत्य एवं सही तथ्य है। वैसे तो प्रदूषण फैलाना अपने आप में बुरी बात है, इसलिए पाप है। लेकिन सबसे बड़ा पाप है - वायु प्रदूषण।

क्योंकि, इन्सान ही नहीं, बल्कि कोई भी जीव भोजन के बिना कुछ दिन जीवित रह सकता है, पानी के बिना कुछ घण्टे जीवित रह सकता है। किन्तु साँस लिए बिना कुछ मिनट ही शायद जीवित रह पाए। जीने के लिए प्राणवायु जरूरी है। अर्थात् ऑक्सीजन जरूरी है।

वायु-प्रदूषण से मानव की साँस में घुलकर अनेक भयंकर जहरीले तत्त्व प्रवेश कर जाते हैं और व्यक्ति आजकल कई भयंकर एवं लाइलाज बीमारियों का शिकार होता जा रहा है। इन्सान दुर्बल, अशक्त एवं तेजहीन ही नहीं होता, बल्कि उसका जीवन अपंग भी हो जाता है। हृदय रोग, श्वास रोग, खाँसी, सर्दी, जुकाम, निमोनिया, आँखों की ज्योति का धीमा पड़ना, उल्टी, चक्कर आना, रक्त अशुद्ध होना, कैन्सर, वात आदि अनेकानेक असाध्य व गम्भीर रोगों का मूल कारण है, अशुद्ध हवा में साँस लेना।

वायु प्रदूषण कई रूपों में होता है। गाड़ी, मोटर आदि के ईंधन पेट्रोल व डीजल के जलने से निकलनेवाला धुआँ वायु-प्रदूषण का एक बड़ा कारण है। कुछ महानगरों के चौराहे का प्रदूषण मशहूर हो गया है। यहाँ पर 10-15 मिनट खड़ा होने पर व्यक्ति की आँखों में जलन व खाँसी आने लगती है। कल-कारखानों में कोयला व अन्य ईंधन के जलने से निकलनेवाला धुँआ प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है।

कुछ उद्योगों में उपयोग किए जानेवाले कुछ रसायनिक पदार्थ अत्यन्त जहरीले होते हैं। जिनका रिसाव हवा में तीव्र जहर घोल देता है। भोपाल गैस काण्ड में हुई हजारों लोगों की मौत इतिहास की एक कलंकमय घटना बन गई है।

शहरों में लोग जहाँ तहाँ कूड़ा-करकट, अधसूखे घासफूस, पत्तियाँ, लकड़ी, कागज, प्लास्टिक, कोलतार, टायर आदि जलाकर जहरीला धुआँ फैलाते रहते हैं, जो हजारों लोगों को चिरकालिक असाध्य रोगों का उपहार दे जाता है। इसी तथ्य को मद्देनज़र रखते हुए कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश से मुम्बई, बैंगलोर आदि नगरों में कूड़ा-करकट को जलाने पर प्रतिबन्ध लगाया हुआ है, इसके उल्लंघन पर कठोर दण्ड दिया जाता है। कूड़ा-करकट का पुनः उपयोग करके इससे खाद, बिजली व ईंधन-केक भी बनाई जाती है। अब सभी शहरों में ऐसे कानून लागू किए जाने आवश्यक हो गए हैं। इसका अनुकरण करते हुए समस्त नगर निगमों तथा नगरपालिकाओं द्वारा मानव बस्ती से 3 कि.मी. के दायरे में कूड़ा-करकट जलाने पर प्रतिबन्ध लागाया जाना चाहिए और इसका उल्लंघन करनेवाले को भारी आर्थिक दण्ड का जुर्माना लगाने तथा कारावास की सज़ा का प्रावधान होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि कई नगम निगमों के कर्मचारी (तथा ठेके के कर्मचारी) स्वयं ही कूड़ा-करकट को उठाकर ले जाने के परिश्रम से बचने के लिए जहाँ-तहाँ गलियों में इकट्ठा करके इसे जला देते हैं, जो काम सिर्फ एक माचिस की तीली जलाने भर में हो जाता है। जो कई घण्टों तक सुलगता रहता है और वातावरण की वायु को जहरीला बना देता है। किन्तु इससे वहाँ रहनेवाले, आने-जानेवाले लोगों को विषाक्त वायु की साँस लेने को मजबूर होकर जहर के घूँट पीने पड़ते हैं।

आजकल प्लास्टिक के कचरे सर्वाधिक पर्यावरण हानि होती है, क्योंकि यह शीघ्र नष्ट नहीं होता। प्लास्टिक के कूड़े के जलने से तो वायु अत्यन्त जहरीली बन जाती है।

अनेक शहरों के कूड़े करकट से पुनःचक्रित (recycle) करके इससे खाद, बिजली, तथा उपयोगी वस्तुएँ बनाई जाती हैं। बैंगलोर शहर में तो प्लास्टिक के कूड़े को गर्म कोलतार (डामर) में डालकर पिघला कर मजबूत सड़कें तक बनाने का प्रयोग किया गया है। हर शहर में ऐसी व्यवस्थाएँ होनी चाहिए।

कुछ लोग सार्वजनिक स्थलों, रेल व बस में बीड़ी-सिगरेट पीकर स्वयं ही विषपान नहीं करते, बल्कि घातक धुआँ उड़ाकर दूसरे लोगों में भी जबरन विषैली गैस प्रविष्ट करवा देते हैं। इससे खाँसी, सिरदर्द से लेकर केन्सर तक बढ़ते हैं। 'धूमपान निषेध' के बोर्ड लगे होने के बावजूद तत्संबंधी नियमों का खुलेआम उल्लंघन होता है। इस दिशा में जनजागृति आवश्यक है कि ऐसे लोगों को सामाजिक तिरस्कार किया जा सके।

वैज्ञानिक अनुसन्धानों से पता चला है कि परोक्ष धूमपान (passive smoking) स्वयं धूमपान करने से भी कहीं अधिक हानिकारक होता है। कई उदाहरण ऐसे मिले हैं कि धूमपान करनेवाले व्यक्ति को तो कोई विशेष बीमारी नहीं हुई, लेकिन उसकी पत्नी को कैन्सर हो गया। क्योंकि धूमपान करनेवाला व्यक्ति तो शुद्ध ऑक्सीजन के साथ तम्बाकू पीता है, और अशुद्ध कार्बन-डाई-ऑक्साइड के साथ निकोटिन जहर हवा में छोड़ता है, जिसे अन्य लोगों को मजबूरन साँस में निगलना पड़ता है, जो अत्यन्त हानिकारक है।

अतः हमारा श्लोगान है:

पान खाओ तो मीठा पान खाओ, पीक निगल लो,
आपको जहाँ तहाँ, थूकने का कोई अधिकार नहीं।
बीड़ी, सिगरेट पीओ शौक से, पर धुआँ निगल डालो,
जहाँ-तहाँ जहर उगलने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं॥


हमारा सुझाव है :

विभिन्न बाजारों में, रेल गाड़ी में, कार्यालयों में एक विशेष कक्ष 'धूमपान बार' (Smoking Bar) होना चाहिए। जो एयर कण्डीशण्ड हो, जहाँ बैठकर उन्मुक्त धूमपान किया जा सके और वहाँ धूमपान का धूम बहुकाल तक टिकाऊ बना रहे। ताकि जिस व्यक्ति के पास बीड़ी-सिगरेट खरीदने के लिए पैसे न हों, वह भी यदि उस कक्ष में प्रवेश मात्र कर जाए तो वह स्वतः धूमपान की धूम-सेवन कर सके।

कुछ लोग सड़कों के किनारे मल-मूत्र विसर्जित करके भी भारी वायु प्रदूषण फैलाते हैं। कुछ विदेशी टिप्पणी करते हैं - सड़कों और रेलमार्गों के किनारे टट्टी बैठना ही तो भारतीय संस्कृति है। जहाँ-तहाँ पड़े जीव जन्तुओं के सड़ते हुए शव घातक वायु प्रदूषण करते हैं। इससे महामारी व प्लेग जैसे कई छूत के रोग फैल कर हजारों लोगों का जीवन संकट में डालने का खतरा पैदा होता है। शवों को तत्काल आधार पर दफ़नाकर या दाह करके अन्तिम संस्कार करना चाहिए। सूखी मछली (सुखुआ) भी आसपास के क्षेत्र में काफी दुर्गन्ध फैला कर हवा को गन्दा करती है।

शहरों में गन्दे खुले नाले भी दुर्गन्ध सृजित करके भारी वायु प्रदूषण फैलाते हैं। हालांकि आजकल भूमिगत मल निकास नालियों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है, लेकिन रख-रखाव व्यवस्था के अभाव में ये जब तब टूट जाती है या अवरुद्ध होकर सड़कों पर मलजल बहता रहता है, जो वायु प्रदूषण का एक प्रमुख कारक है।

आधुनिक युग के परमाणु अस्त्रों के बाद आजकल अनेक रसायनिक अस्त्र-शस्त्र बन रहे हैं, जो दुश्मन देश की वायु में जहरीले तत्व फैलाकर मानव व जीव ही नहीं, बल्कि पेड़-पौधों तक को नष्ट कर सकते हैं। पृथ्वी के कई स्थलों पर ओजोन परत में विशाल छेद हो गए हैं, जिससे महातूफान आदि प्राकृतिक विपत्तियाँ आए दिन आती रहती हैं।

वायु प्रदूषण के कारण ही आज तेजाबी वर्षा होने के समाचार मिलते हैं। बादलों में भी प्रदूषण भर जाने से वर्षा के जल में भी दूषित कण विद्यमान रहते हैं, जो जीव-जन्तुओं ही नहीं फसल को भी नष्ट कर सकते हैं।

आजकल स्वास्थ्य के लिए योगासन और प्राणायाम का बड़े जोर-शोर से प्रचार हो रहा है। प्राणायाम साँस लेने छोड़ने की विशेष प्रक्रिया मात्र है। प्राणायाम से अनेक रोगों का नाश होने के साथ साथ शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक उत्थान होता है। लेकिन यदि अशुद्ध वायु में प्राणायाम किया गया तो लाभ के वजाए भयंकर हानि हो सकती है।

कई कारखानों/संयंत्रों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए करोड़ों रुपये से अधिक खर्च किए गए हैं। धुँवा, धूल व अपशिष्टों के निपटान के लिए सुरक्षित उपाय किए गए हैं। खान में उत्खनित भूमि को फिर से भरकर उस पर व्यापक रूप से फलों आदि के पेड़ लगाए जाते हैं। उड़नशील राख, लाल पंक, चूना-कंकरी आदि का उपयोग करने हेतु नए नए अनुसंधान किए जा रहे हैं।

लाखों लोगों के जीवन को क्षति पहुँचाना सचमुच में सबसे बड़ा पाप है। आइए, इस पाप से स्वयं बचें एवं औरों को भी बचाएँ। इससे बचने के उपायों की तलाश करें।

सबसे बड़ा धर्म :

वायु शुद्धिकरण आज के युग का सबसे बड़ा धर्म माना जाएगा। वायु शुद्धिकरण का सबसे बड़ा साधन है पेड़-पौधे व वनस्पतियाँ, जो कार्बन-डाई-ऑक्साइड को सोखकर ऑक्सीजन विसर्जित करते हैं। यज्ञ व हवन से भी वायु शुद्धि होती है।

प्राचीन काल से ही वृक्षों की पूजा की जाती रही है। धर्मशास्त्रों में बरगद और पीपल के पेड़ लगाने को परमधर्म माना गया है। अब वैज्ञानिक शोध से भी प्रमाणित हुआ है कि पीपल का पेड़ केवल दिन में ही नहीं, बल्कि रात में भी ऑक्सीजन देता है। आइए, अधिकाधिक संख्या में पीपल के पेड़ लगाएँ और सबको प्रेरित करें।

5 Jan 2007

रहस्य: ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का

विज्ञान के अनुसार हर कण-कण में ऊर्जा विद्यमान है। आधुनिक युग में ऊर्जा का सर्वाधिक उपयोग विद्युत रूप में होता है। जलप्रवाह से, हवा (पवनचक्कियों) से, सूर्य किरणों से और परमाणु संयंत्रों से विद्युत ऊर्जा सृजित की जाती है। विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता बढ़ती ही जा रही है और इसकी तुलना में उत्पादन कम पड़ता जा रहा है। अधिकाधिक विद्युत संयंत्रों की स्थापना की आवश्यकता महसूस होने लगी है।

हरेक पदार्थ के सूक्ष्मतम कण को अणु कहते हैं, अणु को भी विखण्डित करने पर परमाणु मिलते हैं। परमाणु का एक नाभिकीय होता है और उसके चारों ओर कुछ इलेक्ट्रॉन और प्रोटोन चक्कर काटते रहते हैं। कुछ धनात्मक आवेश के होते हैं तो कुछ ऋणात्मक आवेश के। कुछ घड़ी की सुईयों की तरह दक्षिणमार्गीय चक्कर लगाते हैं तो घड़ी की सुइयों की गति के विपरीत दिशा में अर्थात् वाममार्गी चक्कर काटते हैं। अलग-अलग पदार्थों के परमाणुओं के नाभिकीय, इलेक्ट्रान व प्रोटोन की गति व संरचना अलग-अलग प्रकार की होती है।

परमाणु के विखण्डन और संलयन या विलय से अपार ऊर्जा सृजित होती है। परमाणु बम भयंकर विनाश कर सकते हैं। आज संसार में जितने परमाणु बम बन चुके हैं उतने से समग्र पृथ्वी का कई बार विनाश हो सकता है।

आकाश में हमारे सौर मण्डल में सूर्य ऊर्जा का अपार स्रोत है। सूर्य नहीं होता तो कोई जीव-जन्तु भी नहीं हो सकते थे। हम जानते हैं कि 100 डिग्री सेंटीग्रेड तक गर्म करने पर पानी उबलने लगता है। लेकिन सूर्य का तापमान करोड़ों डिग्री सेंटीग्रेड होने का अनुमान किया गया है। चूँकि गर्म करने पर धातु फैलती हैं तथा ठण्डी करने पर सिकुड़ती हैं। इसलिए इतने तापमान वाला सूर्य हिलियम जैसी गैसों का बना आग का विशाल तारा होने का अनुमान किया गया है। सूर्य की धूप धरती पर जब सिर्फ 40 डिग्री से अधिक होने लगती है तो यह मानव की सामान्य सहनशक्ति के बाहर की बात हो जाती है।

लेकिन आसमान में ब्लेक होल या कृष्ण विवर जैसे भयंकर काले तारे भी हैं जो कई सूर्य जैसे विशाल तारों को भी निगल जाते हैं। क्या रहस्य है इन ब्लेक होल्स का।

वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि जिस प्रकार सूर्य विशालकाय आग का गोला है, जिसका तापमान करोड़ों डिग्री सेंटिग्रड (+) धनात्मक है, ब्लेक होल इसके विपरीत ऐसे तारे हैं जिनका तापमान करोड़ों डिग्री सेंटिग्रेड (-) ऋणात्मक है। अर्थात् इतने ठण्डे हैं। ठण्डी होने पर वस्तु सिकुड़ कर अति सघन हो जाती है और उसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति अत्यन्त प्रबल हो जाती है। अति सुचालका (super conductivity) भी उसमें उत्प्लावित होती है। अतः एक ब्लेक होल के एक सरसों के दाने के बराबर का टुकड़ा एक टन वजन के बराबर का हो सकता है। इनका गुरुत्वाकर्षण इतना ज्यादा होता है कि सूर्य जैसे विशाल तारे भी खिंच कर इनमें समाकर खत्म हो जाते हैं। उनकी असीमित अग्नि को बुझाकर या अति-ग्रीष्मता को शीतल कर देते हैं।

चिकित्सा विज्ञान में भी क्रायोसर्जरी प्रक्रिया से बिना किसी दर्द व चीर फाड़ के शल्यक्रिया के आपरेशन करके रोगियों का इलाज किया जाता है, जिसमें एक सूई को नाइट्रोडन गैस से माइनस (-) 300 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान तक ठण्डा करके शरीर के जिस स्थान को छुआ दिया जाता है, इस स्थान की कोषिकाएँ चेतना शून्य (dead cell) हो जाती हैं। और बाद में वह प्रत्यंग अपने आप सूख कर चमड़ी से अलग हो जाते हैं।

जिस प्रकार प्रकाश ऊर्जा का स्रोत है उसी प्रकार प्रकाश का अभाव अर्थात् अन्धेरा भी ऊर्जा का स्रोत है। रात और दिन दोनों का ही अपना-अपना महत्त्व है। छाया का महत्त्व प्रकाश से कम नहीं आँका जा सकता। ज्योतिष विज्ञान में इसीलिए राहु और केतु छाया ग्रहों के प्रभाव को अधिक बलवान माना गया है। इसके आधार पर अभाव और संकटों तथा विपदाओं की भविष्यवाणी की जाती है।

संसार में पुरुष को दक्षिण मार्गी तथा नारी को वाम मार्गी कहा जाता है। पुरुष को धनात्मक एवं नारी को ऋणात्मक ऊर्जा की संज्ञा भी दी गई है। कहते हैं कि बिना शक्ति के शिव भी शव के बराबर होते हैं। योनिरहित शिवलिंग को शक्तिहीन माना जाता है। संसार में नारी शक्ति का महत्त्व कहीं ज्यादा बड़ा है, क्योंकि यदि नारी नहीं होती तो किसी पुरुष का जन्म भी नहीं हो सकता था। इस प्रकार नेगेटिव एनर्जी को पोजिटिव एनर्जी से अधिक शक्तिशाली माना गया है।

केवल 'काम' (sex) हेतु ही नर-नारी के मिलन जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि "अर्थ", "धर्म" व "मोक्ष" के लिए भी दोनों का सम्मिलित प्रयास आवश्यक होता है। जब कोई पुरुष पूजा, उपासना, हवन या यज्ञ करता है, तो उसकी धर्मपत्नी का साथ बैठना आवश्यक होता है। जब त्रेतायुग में भगवान राम ने अश्वमेध यज्ञ किया था, तो उनकी पत्नी सीता को साथ बैठाए बिना यज्ञ सम्पन्न नहीं हो सका। किन्तु वे तो सीता को एक प्रजा (धोबी) के उलाहने मात्र से त्याग चुके थे। अतः उन्हें स्वर्ण से निर्मित सीता जी की मूर्ति को साथ में बैठा कर अश्वमेध यज्ञ पूरा करना पड़ा।

विद्युत ऊर्जा के भी मुख्यतः दो तार होते हैं। एक पोजिटिव(positive) दूसरा नेगेटिव(negative)। बिना दोनों तारों के मिलन के न तो कोई बिजली का बल्ब ही जल सकता है, न पंखा घूम सकता है। अकेले पोजिटिव तार कुछ कार्य नहीं कर सकता है।

मानव के मन में भी सकारात्मक और नकारात्मक विचारों रूपी दो प्रकार की ऊर्जाएँ होती हैं। जिस प्रकार एक ब्लेक होल कई सूर्यों को भी निगल सकता है। उसी प्रकार संसार भर में मानव के मन में नकारात्मक विचारों की तीव्र तरंग भी अनेकानेक सकारात्मक या अच्छे विचारों को निगल जाती है। आज संसार में नकारात्मक विचारों का बोलबाला है। जिसके कारण हर कहीं अन्याय, अत्याचार और विध्वंश फैल रहे हैं। हर कहीं आतंकवाद फैल रहा है।

सृष्टि के आदिकाल से पृथ्वी पर देव-दानव संघर्ष चलता आया है। अनन्तः देवताओं की विजय होती है। लेकिन समुद्र मंथन के लिए देवता और दानव दोनों की जरूरत होती है। अकेले देवता समुद्र को मंथन नहीं कर सकते थे। न तो अमृत और न ही हलाहल निकल सकता था।

वास्तव में होना यह चाहिए कि समस्त नकारात्मक शक्तियों को सकारात्मक शक्तियों के नियंत्रण में रहना चाहिए। तभी संसार के समस्त मानव, प्राणी, जड़ वस्तुएँ अपनी सीमा में संयत व नियंत्रित रह सकती हैं। संसार का संचालन संतुलित रूप से हो सकता है। लेकिन आज संसार में नकारात्मक विचारधाराएँ रूपी विष पूरा व्याप्त हो गया है। लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कोई भगवान शंकर फिर से अवतरित हो कर इस हलाहल का पान कर अपने कंठ में अटका कर नियंत्रण में ले लें।

सचमुच ऊर्जा का संसार अत्यन्त रहस्यमय है। आज आवश्यकता है कि केवल सकारात्मक आवेश वाली ऊर्जा को ही नहीं बल्कि नकारात्मक आवेश वाली ऊर्जा को भी सृजनात्मक कार्य में लगाया जाए।

बिना नकारात्मक ऊर्जा के भी संसार नहीं टिकता। केवल मीठा खाकर जिस पर हम नहीं जी सकते, नमकीन, खट्टे व अन्य स्वाद की भी जरूरत होती है, उसी प्रकार जीवन सुख-दुःख का संगम है। सिर्फ आवश्यकता इस बात की है कि नकारात्मक और सकारात्मक ऊर्जाओं का परस्पर उपयुक्त संतुलन (balance) कैसे बैठाया जाए।

हर इन्सान में कुछ विशेष खूबियाँ या गुण होते हैं तो कुछ अवगुण या कमियाँ भी अवश्य होती हैं। उसे वह काम दूसरों के सहयोग के करने पड़ते हैं, जो वह स्वयं नहीं कर सकता। इसी प्रकार वह जिस काम में पारंगत होता है, दूसरों को अपने हुनर से मदद करता है। जिस प्रकार एक अन्धा व्यक्ति अपने कन्धे पर लूले-लंगड़े व्यक्ति को बैठा कर चलता है, दोनों मिलकर जीवन-यापन कर लेते हैं, इसी प्रकार आपसी तालमेल या सन्तुलन से सफलता हासिल की जा सकती है। अतः इन्सान को न तो कभी घमण्ड करना चाहिए और न ही कभी हीनभावना का शिकार होना चाहिए। अपनी खूबियों और कमियों दोनों की पहचान कर समन्वित प्रयास करना चाहिए। अभिमान त्यागना किन्तु स्वाभिमान धारण किए रहना -- यही सफलता का रहस्य है।

सभी सिद्धियों का सार है नकारात्मक और सकारात्मक ऊर्जाओं का संतुलन बनाए रखना।

4 Jan 2007

घोड़े की नाल का महत्व

ज्योतिष (Astrology) में ग्रहों (विशेषकर शनि) की पीड़ा के निवारण के लिए घोड़े की नाल की अंगूठी (मुद्रिका ring) बनवाकर मध्यमा अंगुली में शनिवार को पहनने की सलाह दी जाती है। इसे विभिन्न रत्नों से भी अधिक प्रभावशाली और चमत्कारी माना जाता है।

आखिर क्यों? इसका क्या महत्व है?

ब्रह्माण्ड में हर ग्रह-नक्षत्र निरन्तर भ्राम्यमाण है। सभी चक्कर लगाते रहते हैं। अपनी अपनी धुरी पर अपनी अपनी गति की लय के अनुसार। इन सभी के घूमने का आधार है परस्पर की गुरुत्वाकर्षण शक्ति। इसी गुरुत्वाकर्षण शक्ति का प्रभाव हम प्रत्यक्ष रूप से पूर्णिमा या अमावस्या के दिन समुद्र में आनेवाले ज्वार-भाटे के रूप में देखते हैं। ग्रह-नक्षत्रों का प्रकाश(जो दृश्यमान है) तथा उनकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति (जो अदृश्य, किन्तु अधिक प्रभावशाली है) का प्रभाव हमारे जीवन के हर कर्म-क्षेत्र पर पड़ता है।

घोड़े के पैर के नीचे खुर होते हैं(जिसे उसके नाखून माना जाता है, जो dead cell) , उनको तेजी से दौड़ते वक्त टूट या घिस जाने से बचाने के लिए लोहे की अर्धगोलाकार ('U' Shaped) नाल बनाकर लोहे के काँटों के सहारे ठोंक दी जाती है। इसे घोड़े के लिए लोहे के जूते भी कह सकते हैं। घोड़े में बल बहुत होता है। घोड़े की शक्ति अर्थात् अश्वशक्ति (Horse-power) को आधार मानकर ही विभिन्न मशीनों की शक्ति को मापा जाता है। घोड़ा बहुत तेज गति से दौड़ता है। जब सड़क पर या पथरीली जमीन पर घोड़ा दौड़ रहा होता है, तो उसके पैर के चिन्गारियाँ निकलती दिखाई दे जाती हैं। क्योंकि पैर में ठोंकी हुई लोहे की नाल बहुत तीव्रता के साथ टकराती है तो तीव्र घर्षण के चिन्गारियाँ निकल उठती है।

सृष्टि का आरम्भ जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में विस्फोट एवं संलयन से माना जाता है। परमाणु बम से जैसे विशालकार विस्फोट होते हैं। इसी प्रकार घोड़े के पैर में लगी लोहे की नाल और कठोर धरती के टकराव से लौह-अणुओं में विस्फोटक घर्षण से जिस ऊर्जा की उत्पत्ति होती है, वह ऊपर से चिन्गारियों के रूप में दिखती है, किन्तु अन्दर से अद्भुत ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को समेकित करती जाती है।

इस प्रकार टकराव से उस लोहे की नाल में अद्भुत ऊर्जा के प्रकम्पन भरते जाते हैं। जो विभिन्न प्रकार के खतरनाक आघातों से रक्षा करने की सामर्थ्य प्रदान करते हैं।

अन्त में वह नाल घिस-घिस कर एक दिन घोड़े के पैर से अपने आप छिटक कर निकल जाती है। तो घोड़ा कुछ लंगड़ा कर दौड़ता दिखाई देने लगता है, तो उसका मालिक उसके फिर दूसरी नई नाल ठुँकवाता है। उस पुरानी निकली हुई घोड़े की नाल से मुद्रिका (अंगूठी) तथा ताबीज या विभिन्न यन्त्र आदि बनाकर उपयोग किए जाते हैं, जो ग्रह-दशा, भूत-प्रेत बाधा, अन्य दोषों का शमन करने की शक्ति प्रदान करते हैं। कई लोग अपने घर के प्रवेश द्वार की चौखट पर घोड़े की नाल ठोंक देते हैं, जो विभिन्न आपदाओं से रक्षा करती हुई मानी जाती है।

घोड़े की नाल को आग में तपा देने पर उसकी शक्ति खत्म हो गई मानी जाती है। इसलिए घोड़े की नाल की अंगूठी को यों ही ठोंक-पीट कर बनाया जाता है। इसे तपा कर झलाई, सिलाई कर जोड़ा नहीं जाता। इसलिए इसके छोर जुड़े हुए नहीं होते, बल्कि कटे ही रहते हैं। यह देखने भद्दी-सी टेढ़ी मेढ़ी दिखाई देती है। किन्तु यदि सही है, चमत्कारी परिणाम देती है।

घोड़े की नाल के पुराने काँटे भी स्वयं में विशिष्ट ऊर्जा को समेटे हुए विशेष महत्व के माने जाते हैं, जिनका ज्योतिष, तन्त्र और मानसिक चिकित्सा में उपयोग होता है।

सावधानियाँ--

आजकल लोग घोड़े की नाल का महत्व जानकर घोड़े के मालिक से मांगकर मुँहमांगे दाम देकर नाल खरीद लेते हैं। घोड़े का मालिक तत्काल घोड़े के पैर से नाल निकाल कर बेच देता है और उसे दूसरी नाल पहना देता है। एक मेले में एक बार देखा गया कि एक घोड़े का मालिक एक ही दिन में एक-एक कर इस प्रकार अपने घोड़े के पैर से 150 बार नाल निकाल कर बेच चुका था। लेकिन जानबूझकर उसके पैर निकाली गई ऐसी नाल का लगभग कोई महत्व नहीं होता। क्योंकि उसमें वह शक्ति जमा नहीं हुई होती।

कई दुकानों में कच्चे लोहे की मुद्रिका बनाकर 2-4 रुपये में बनी बिकती हुई दिखाई देती है। वह घोड़े की नाल से बनी है या सामान्य लोहे की- इस बात का कोई भरोसा नहीं होता।

हालांकि विश्वास के आधार पर सामान्य लोहा पहनने पर भी शनि-ग्रह की कुछ शान्ति हो जाती है, लेकिन वह चमत्कारी परिणाम उपलब्ध होगा, इसमें कुछ शंका रहती है।

अतः यदि किसी को सौभाग्यवश दौड़ते हुए घोड़े के पैर के छिटक कर निकल पड़ी नाल मिल जाए और वह उसका सही उपयोग करे तो उसे भाग्यशाली माना जाता है।