1 May 2007

श्रम शर्म नहीं...

श्रम शर्म नहीं...

(श्रमिक दिवस, एक मई,2007 पर विशेष)
श्रम और शर्म ये दोनों शब्द आपस में कुछ मिलते-जुलते लगते हैं। कुछ लोगों द्वारा अक्सर गलती से श्रम को शर्म और शर्म को श्रम लिख दिया जाता है। विशेषकर कम्प्यूटर में टंकण करते वक्त यह गलती हो जाती है। इसका कारण है इसके टंकण-क्रम की व्युत्पत्ति :-

श्रम = श+्+र+म

शर्म = श+र+्+म

बस सिर्फ एक हलन्त आगे-पीछे उलट-पलट लग जाए तो दोनों एक-दूसरे का रूप बदल लेते हैं।

किन्तु दोनों के अर्थ में बड़ा भारी अन्तर है। श्रम अर्थात् परिश्रम, मेहनत, मजदूरी और शर्म अर्थात् लज्जा(Shame)।

परन्तु आजकल इन दोनों के प्रयोग तथा व्यवहार के बीच भी उलट-पुलट, मिलावट और निकटता दिखाई देने लगी है।लोगों को परिश्रम करने में शर्म महसूस होती है। किसी पार्टी में देखते हैं कि लोग जूठे गिलास व थाली जहाँ-तहाँ फेंक देते हैं, उन्हें उठाकर सही कूड़े-दान या जूठे बर्तनों के स्थान में रखने को छोटा काम समझकर उन्हें शर्म महसूस होती है। अपनी हैसियत से, अपने पद से नीचे का काम करने में लोगों को लज्जा आती है। लोग बेकार बैठे रहेंगे, इधर-उधर बतियाते रहेंगे, लेकिन लम्बित पड़े काम नहीं सलटायेंगे। यह बड़ी हानिकारक प्रवृत्ति है। व्यक्ति को परिश्रम करने में कभी शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए। बल्कि असदाचरण, व्याभिचार, भ्रष्टाचार, अधर्म या पाप करने में शर्म का अनुभव होना चाहिए।

जरूरत से ज्यादा मिलना हानिकारक है :-

एक सेठ जी अपना मकान-निर्माण करवा रहे थे। कई कारीगर और मजदूर काम कर रहे थे। एक मजदूर बहुत अच्छा काम कर रहा था। वह दूसरे मजदूरों की तुलना में तेजी से और ज्यादा काम कर रहा था। शाम को सेठ जी ने उस पर खुश होकर उसे उसकी 100 रुपये की दैनिक की मजदूरी के अलावा बीस रुपये और ज्यादा की मजदूरी दे दी। उन्होंने यह सोचा था पुरस्कार स्वरूप ज्यादा मजदूरी पाने पर वह अगले दिन और अच्छा काम करेगा। किन्तु घोर आश्चर्य! दूसरे दिन सेठ जी प्रतीक्षा करते रहे। किन्तु वह मजदूर काम करने ही नहीं आया। सेठ जी ने सोचा शायद किसी समस्या में पड़ गया होगा, थोड़ी देर से आएगा। काफी देर प्रतीक्षा के बाद भी वह नहीं आया। उसके न आने से सीमेण्ट-गारा मिश्रण आदि काम अटक गए। अन्य कारीगर और मिस्त्री भी बेकार बैठे रह गए। सेठ ने उसकी तलाश में उसके निवास पर दूसरे आदमी को बुलाने भेजा। किन्तु उसने लौटकर बताया कि वह मजदूर तो रात को ज्यादा शराब पीकर अब तक नशे में धुत्त होकर सोये पड़ा है। उसकी बीबी ने बताया कि वह नशे में बक रहा था-- "आज मजदूरी में बीस रुपये ज्यादा मिल गए हैं, आज पूरी बोतल भर शराब पीकर आराम करूँगा। आज काम करने नहीं जाऊँगा।"

उसकी प्रतीक्षा इतनी देर तक करते रहने से दूसरा कोई मजदूर भी नहीं मिला सेठ जी को। अन्य सारे मजदूर दूसरे काम करने निकल पड़े थे। उनका भारी नुकसान हुआ। उसके काम पर न आने के कारण गारा-ईंट आपूर्ति में बाधा पड़ी और दोनों मिस्त्री कारीगर भी अपना काम ठीक से नहीं कर पाए। जितना काम उस दिन होना चाहिए था, उसका एक-चौथाई ही हो पाया काफी मुश्किल से। फिर भी कारीगरों को मजदूरी तो पूरी ही देनी पड़ी सेठ जी को। उनका लगभग 500 रुपये का नुकसान हो गया उस दिन।

सेठ जी को अपने दया की दुर्बुद्धि पर भारी पछतावा हुआ। उन्हें शिक्षा मिली कि जरूरत से ज्यादा मजदूरी देकर उन्होंने बड़ा पाप ही किया है। कुपात्र को दान देना महापाप होता है। वह धन का सदुपयोग करना नहीं जानता, इसलिए उसे ज्यादा मजदूरी देने वजाए उसकी मजदूरी से कुछ रुपये काट कर बकाया रख लेते तो वह मजदूर जरूर काम पर आता अपनी शेष मजदूरी लेने के लिए। तब से सेठ जी ने कारीगरों और मजदूरों की मजदूरी का कुछ अंश काट कर अपने पास रखकर जमा करना शुरू कर दिया और कहा कि मकान निर्माण का काम पूरा हो जाने के बाद ही आपकी कुल जमा मजदूरी और अपनी ओर से कुछ पुरस्कार स्वरूप रुपये मिलाकर दूँगा।

इसी प्रकार देखा जाता है कि आज लोग परिश्रम करने से जी चुराते हैं। वे लोग सिर्फ अपना ही नुकसान नहीं करते, बल्कि सम्पूर्ण समाज का भारी नुकसान करते हैं। राष्ट्रीय आय को बड़ा भारी नुकसान पहुँचाते हैं।

दूसरी ओर देखा जाता है कि कुछ बुजुर्ग लोग गाँधीवादी विचारधारा के होते हैं। वे रोजाना सुबह जल्दी उठकर सड़कों पर झाड़ू-बुहारी करते हैं। सड़क के बीच पड़े कूड़ा-करकट या कंकड़-पत्थर आदि उठाकर गली को मोड़ पर रखे कूड़ेदान में फेंक कर आते हैं। किन्तु ऐसे लोगों को युवावर्ग घृणा की नजरों से देखता है। उनका अपमान करता है। इसके विपरीत वे युवावर्ग अपने घर के आसपास भी सफाई करने की वजाए और ज्यादा कूड़ा फैलाते हैं। गन्दगी फैलती है, मच्छर, कीड़े-मकोड़ बढ़ते हैं और बीमारियाँ फैलती है।

एक घटना याद आ गई। एक पार्क में कुछ लड़कियाँ बैठी बतिया रहीं थी और मूँगफली खा रही थी। वे लड़कियाँ वहीं छिलके फेंके दे रही थी। उनमें सुनीता नामक एक लड़की छिलके मूँगफली के खाली ठोंगे में रखने लगी, सोचा वापस लौटते समय कूड़ेदान में फेंक देगी। किन्तु यह देखकर दूसरी लड़कियों ने उसका मजाक उड़ाया- "चली हो गाँधी जी की नानी बनने। फेंक यहीं। यह मेहतर का काम है, क्यों हमारी इज्जत बिगाड़ रही हो।"

अगली शाम को वे लड़कियाँ फिर पार्क में आईं और एक जगह घास पर बैठकर बतियाने लगीं। अचानक वे लड़कियाँ चीखकर उठी और छटपटाती हुई भागीं, अपने कपड़े झाड़ने लगी। चींटियों ने उनके शरीर पर चढ़कर कपड़ों के अन्दर घुसकर जहाँ-तहाँ काट-खाया था। कपड़े उतार कर झाड़ने के लिए उन्हें कहीं सही जगह भी नहीं मिली। पार्क में कुछ झाड़ियों के पीछे जाकर उन्हें जैसे-तैसे रो-रा कर चींटियाँ झाड़नी पड़ीं। दंश के दर्द से सिसकारते हुए, पछताते हुए वे सुनीता से बोलीं-- "कल तुम ठीक ही कर रही थी। हमने तुम्हें कूड़ा उठाकर कूड़ेदान में डालने से रोक दिया था। सचमुच हम जैसे लोगों ने, मूँगफलियाँ खाकर छिलके तथा कुछ खराब दाने यहीं फेंक दिए होंगे, जिनमें चींटियाँ लग गईं। हमें अच्छा दण्ड मिला। अब आगे से कभी भी जहाँ-तहाँ कूड़ा नहीं फेंकेंगे।"

एक और घटना है-- ग्लोबल वार्मिङ्ग बढ़ते देखकर एक अधिकारी ने सोचा कि सड़क किनारे की खाली जमीन में एक पीपल का पेड़ लगा दूँ तो ठण्डी छाया मिलेगी और शुद्ध ऑक्सीजन मिलने से प्रदूषण भी कम होगा। इसके लिए एक गड्ढा खोदने के लिए एक मजदूर से कहा। मजदूर ने इस काम के लिए पूरे 100 रुपये की मजदूरी मांगी। अधिकारी ने कहा कि गड्ढा खोदने में तो सिर्फ एक घण्टा भर लगेगा। 100 रुपये मजदूरी तो पूरे आठ घण्टे के दिन भर के काम की होती है। लेकिन कोई राजी नहीं हुआ। काफी देर तक प्रतीक्षा के बावजूद उस दिन कई मजदूर बिना कोई काम पाए वापस चले गए, लेकिन कुछ कम पैसे लेकर वह छोटा गड्ढा तक खोदने को राजी नहीं हुए। मजदूरों के सरदार ने उलटे सबको पट्टी पढ़ाई-- "भले ही बेकार रहें, भले ही भूखे रहें, लेकिन कम मजदूरी लेकर काम नहीं करेंगे।"

इस प्रकार देखा जाता है कि आजकल लोग श्रम और परिश्रम करने से कतराते हैं, अधिक आराम करना पसन्द करते हैं। सोचते हैं आराम करने से भूख नहीं लगेगी। लेकिन चाहे आप कुछ करो या न करो, चाहे सोये रहो, आपका पेट तो अपना काम अनवरत करता है। भूख तो लगेगी ही। यदि समय बेकार खोया, श्रम नहीं किया तो पेट को आहार कहाँ से मिलेगा। लोग अधिक आराम करके अपनी तोंद फुलाते हैं, मोटे होते हैं, बीमार पड़ते हैं। और अन्त में मोटापा घटाने व स्वास्थ्य रक्षा के लिए लाखों रुपये की दवाई खानी पड़ती है या दौड़ना या अन्य कठिन व्यायाम करना पड़ता है।

एक केन्द्रीय मंत्रालय के कार्यालय की एक घटना है। कार्यालय में बाहर से कोई एक अतिथि अधिकारी आए। वे सचिव महोदय से मिलने के लिए प्रतीक्षारत बैठे रहे। सचिव जी का चपरासी किसी काम से कुछ देर के लिए बाहर गया था। उनको प्यास लगी। उन्होंने पता लगाया कि पीने का पानी कहाँ है और वहाँ रखे जग से गिलास में स्वयं पानी निकालकर पीने लगे। इतने में चपरासी लौटा। उनके स्वयं पानी लेकर पीता देखकर क्रोधित हो गया और बोला-- "महोदय, आप क्यों मुझ गरीब के पेट पर लात मार रहे हैं। यदि आप जैसे अतिथि स्वयं पानी लेकर पी लेंगे, तो मेरी सेवा की क्या जरूरत रहेगी। मेरी तो नौकरी ही चली जाएगी। यह मेरा काम है। मैं अपना काम का अधिकार किसी दूसरे को नहीं दूँगा। मेरा काम किसी और को नहीं करने दूँगा।" उसने उनके हाथ से पानी का गिलास छीन लिया। उस पानी को फेंककर बड़े सलीके के साथ कूलर से ठण्डा पानी लाकर पीने को दिया। अधिकारी महोदय उस चपरासी का कर्म-प्रेम और कार्यालय की ऐसी कार्य-संस्कृति देखकर अभिभूत हो गए। कहा- सचमुच जहाँ अपने काम का ऐसा आदर हो, वह देश जरूर प्रगति करेगा।

प्रभु रामचन्द्र के राज्याभिषेक की कथा है। लक्ष्मण, शत्रुघ्न से लेकर सुग्रीव तक सब ने एक एक काम का दायित्व सम्भाल लिया था। हनुमान जी के लिए कोई काम नहीं बचा। वे अत्यन्त दुःखी हो गए। भगवान राम से शिकायत की। भगवान राम ने उन्हें दायित्व सौंपा कि वे प्रातःकाल जल्दी उठकर सिर्फ चुटकी बजाएँ। उनकी चुटकी की आवाज सुनकर ही वे सोकर उठेंगे। सुग्रीव आदि सभी सेवक हनुमान जी का मजाक उड़ाने लगे कि उनको सिर्फ चुटकी बजाने का छोटा-सा काम मिला है। जबकि उन्हें बड़े दायित्व। बड़े शर्म की बात है।

हनुमान जी भी दुःखित होकर रूठ गए। उन्होंने अगले दिन प्रातःकाल चुटकी नहीं बजाई। भगवान राम सोकर ही नहीं उठे। सब लोग उन्हें जगाते-जगाते थक गए। सारे उपाय करके हार गए। पूरा एक प्रहर बीत गया। राज्याभिषेक के मुहूर्त के बीत जाने की आशंका हो चली। यह देख कर गुरु वशिष्ठ जी बुलाया गया। वे सारी बात समझ गए। उन्होंने रूठे हनुमान जी को मनाया और चुटकी बजाने की विनती की। जब हनुमान जी ने चुटकी बजाई तभी भगवान राम जागे।

इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता। हर काम का अपना-अलग महत्व है तथा हर कर्मचारी का काम विशेष है। कोई किसी का विकल्प नहीं बन सकता। अतः कर्मक्षेत्र में चाहे कोई चमार हो, चाहे कोई जमादार हो, या चाहे कोई मंत्री हो, सबका अपना अपना विशेष महत्व है।

आजकल भूमण्डलीकरण और उदारीकरण के दौर में अनेकानेक विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ देश में पैर जमा चुकी हैं। सड़कें तक मशीनों से, डोजरों से बनने लगी है... कम्प्यूटर के माध्यम से अनेक लोगों का काम एक आदमी कर लेता है। नमक से लेकर चाय जैसी छोटी मोटी रोजमर्रा की वस्तुएँ भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा बनाई जाती हैं और बेची जाती हैं। गांधी जी की स्वराज, स्वदेशी वस्तुओं के ही उपयोग करने, चरखा चलाने, हर हाथ को काम... हर पेट को रोटी... की नीति गायब होती जा रही है। देश में बेकारी बढ़ रही है। बेकार व भूखे लोग नक्सलवाद और माओवाद तथा आतंकवाद का शिकार बन भयंकर समस्याएँ पैदा कर रहे हैं। मरने-मारने पर उतारू हो रहे हैं। धनी और ज्यादा धनी होते जा रहे हैं, गरीब और ज्यादा गरीब। जनसंख्या में भारी वृद्धि हो रही है। किन्तु गुणवत्ता(quality) की और गुणवान लोगों की कमी होती जा रही है।

ऐसी स्थिति में प्राचीन वैदिक तथा पौराणिक सूत्रों तथा चाणक्य के अर्थशास्त्र में वर्णित श्रम नीति-सिद्धान्तों के आधार पर आधुनिक नवीन श्रम-नीति के नए आयामों की खोज करके उन्हें लागू करना आवश्यक हो गया है। तभी मानव सभ्यता को विनाश की ओर बढ़ने से बचा कर नए सुखमय संसार की रचना सम्भव हो पाएगी।

30 Apr 2007

3% ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा रहा है अकेला ओड़िशा प्रान्त...

3% ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा रहा है अकेला ओड़िशा प्रान्त...

धरती की गर्मी बढ़ते जाना आजकल समाचारों में एक ज्वलन्त मुद्दा है। ओजोन परत में बड़े बड़े छेद हो गए हैं, ध्रुवीय ग्लेशियर पिघल रहे हैं, हिमालय की बर्फीली चोटियाँ पिघल रही है, प्रकति की जलवायु बदल रही है, जब-तब, जहाँ-तहाँ, भारी वर्षा, बाढ़, तूफान, सूखा, भूकम्प, सुनामी, आदि प्राकृतिक आपदाएँ आकर जान-माल का भारी नुकसान कर दे रही हैं....

भुवनेश्वर से प्रकाशित ओड़िआ दैनिक 'धरित्री' के दिनांक 15 अप्रैल के अंक के पृ.2 पर प्रकाशित समाचार के अनुसार
समग्र धरती पर जितना कुल ताप सृजित होता है उसमें से लगभग 3 प्रतिशत तक छोटे से प्रान्त ओड़िशा से सृजित हो रहा है और भविष्य में यह स्थिति और भी तीव्र होने की आशंका है, सन् 2010 तक यह आँकड़ा 7 से 10 प्रतिशत तक भी बढ़ सकता है, जो पर्यावरणविदों की चिन्ता का कारण बना हुआ है। इसका कारण है यहाँ बढ़ते जा रहे उद्योंगों तथा अन्य उद्देश्यों के जंगलों की व्यापक रूप से कटाई, तथा तूफानों के कारण जंगलों की तबाही। 1989 से 2006 के बीच के 17 वर्षों में इस राज्य में लगभग 27479.653 हेक्टर जंगलों का सफाया हो चुका है। उद्योगों आदि में प्रमुख है विभिन्न अयस्कों की विशाल खानें, सिचाई योजनाएँ, कल-कारखाने, शहरीकरण, सड़कों, रेल-लाइनों और विद्युत-लाइनें। सड़कों, रेलमार्गों, मकानों आदि के निर्माण हेतु भारी मात्रा में कंक्रीट आदि के लिए पत्थरों गिट्टियों की जरूरत को पूरा करने के लिए कई छोटे-बड़े पहाड़ ही तोड़ तोड़ कर उखाड़े जा चुके हैं।

पर्यावरण सुरक्षा के नियमों के अनुसार जंगलों की कटाई के बदले इसकी तीन गुना भूमि पर वृक्षारोपण किए जाने चाहिए, लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं हो पाता। वृक्षारोपण की कागजी कार्यवाही की जाती है, करोड़ों का खर्च दर्शाया जाता है। कई कम्पनियों द्वारा वास्तविक रूप से काफी मात्रा में वृक्षारोपण किए भी जाते हैं, कुछ जंगली क्षेत्र में तो कुछ शहरी एवं बंजर भूमि पर। किन्तु नए रोपे गए पौधों में से कितने बचे, कितने बड़े हुए इसका कोई हिसाब नहीं रखा जाता। अनुमान से नए लगाए गए पेड़ों में से लगभग सिर्फ एक प्रतिशत ही बच कर बड़े हो पाते हैं। शेष पौधे सिंचाई के अभाव, पशुओं एवं दुष्टों से सुरक्षा के अभाव तथा तूफान आदि के कारण मर जाते हैं।

सबसे बड़ा कारण है ओड़िशा की बदलती जलवायु। 29 से 31 अक्टूबर, 1999 में ओड़िशा के पूर्वी तटवर्ती क्षेत्र में आए चक्रवाती-महातूफान (Super Cyclone) में जान-माल के भारी नुकसान के साथ वृक्षों एवं वनों का लगभग पूरी तरह विनाश हो गया था। इस महातूफान की भयंकरता अनुमान इस उदाहरण से ले सकते हैं कि 10 मीटर परिधि घेरे के चौड़े तने वाले विशाल बरगद के पेड़, जो शायद कम से कम 200 वर्ष पुराने थे, उसके चारों ओर बने 40 मीटर की परिधि के सीमेण्ट के पक्के चबूतरे सहित उखड़ गए थे। ढाई दिन तक 300 किलोमीटर प्रतिघण्टे की तीव्र रफ्तार से चली हवा के साथ भारी वर्षा ने यहाँ भयंकर विनाश का ताण्डव मचाया था। समुद्र का पानी 30 फुट तक ऊँचा उठकर कई किलोमीटर तक तटवर्ती क्षेत्र को ले डूबा था। तूफान के बाद समुद्र का पानी वापस कम हुआ तो देखा गया कि पारादीप बन्दरगाह से कुछ किलोमीटर दूर एक गाँव में एक जहाज भी तूफान के बहाव में वहाँ आकर फँस गया था। वह जहाज पानी के साथ समुद्र में लौट नहीं पाया। इतने बड़े जहाज हो वापस ढोकर समुद्र में ले जाना सम्भव नहीं था। उसे टुकड़े टुकड़े कर तोड़ कर वहाँ से हटाया गया, जिसमें भी 2 वर्ष लग गए थे।

इतने व्यापक परिमाण में वृक्षों की हानि होने के बाद यह इलाका लगभग वृक्ष-शून्य बन गया था। इसके बाद से यहाँ की गर्मी बढ़ने लगी है। और गर्मी बढ़ने से समुद्र का पानी तेजी से भाप बनकर आकाश में जमा होता है। ग्रीष्म काल में रोजाना दोपहर तक भारी गर्मी पड़ती है और दोपहर बाद आकाश में काले बादल छा जाते हैं तथा पहले भयंकर गरज के साथ तेज तूफानी हवाएँ चलती हैं फिर वर्षा आ जाती है। लगभग रोजाना आनेवाली इन लघु आँधियों के कारण नए लगाए गए पेड़ों में से भी कुछ उखड़ जाते हैं, तो कुछ की डालियाँ टूट जाती है। फसल व सब्जियों को भारी नुकसान होता है। पपीते, सहजन आदि सब्जियों व फलों के पेड़ तो सबसे पहले उखड़ते हैं। भुवनेश्वर के स्थानीय सब्जी बाजारों में सहजन फली 40 से 50 रुपये प्रति किलो तक महंगी बिकने लगी है।

समुद्री तटवर्ती इलाकों में तो गर्मी के कारण समुद्र से जलवाष्प ज्यादा बनने के कारण हवा में आर्द्रता का परिमाण 99% तक बढ़ जाता है और पसीने से लथपथ लोग विकल होकर तड़पते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे मानव नहीं, बल्कि आलू हैं जिन्हें प्रेसर कुकर में डालकर भाप (steam) में उबाला जा रहा है।

राज्य सरकारी आदेशों के अनुसार अप्रेल के आरम्भ से ही सभी स्कूल-कॉलेजों की छुटटी सुबह साढ़े दस बजे तक करने के आदेश जारी किए जा चुके हैं। कुछ स्कूल प्रातःकाल 7 बजे से 10.30 बजे तक ही खुलते हैं तो कुछ स्कूल शाम को 4 बजे से 7.30 बजे तक खुलने लगे हैं। फिर भी लू तथा शरीर में जलांश कम होने से होनेवाली मौतों की संख्या बढ़ने लगी है।

धीरे धीरे इस प्रकार बढ़ती गर्मी के कारण आनेवाले तूफानों का क्षेत्र बढ़ता जा रहा है और पश्चिम ओड़िशा में भी अब तूफानी आँधियाँ आने लगीं हैं। जिनसे जंगलों को और भी व्यापक नुकसान पहुँच रहा है और पृथ्वी की गर्मी बढ़ाने में ज्यादा से ज्यादा योगदान करने लगा है यह प्रान्त। आशंका होने लगी है कि अब क्रमशः पड़ोसी राज्यों में भी यह गर्मी, आँघी और तूफान की महामारी फैलने लगेगी और...... भविष्य में क्या होगा?

कुछ पर्यावरण विद बताते हैं कि आए दिन आनेवाले आँधी-तूफानों का कारण भारत के पूर्वी तट से पाँच-छह सौ किलोमीटर दूर समुद्र (जहाँ मुक्त क्षेत्र है, किसी देश के अन्तर्गत नहीं हैं) के ऊपर आकाश में ओजोन परत में एक बड़ा छिद्र हो गया है, जिससे सूर्य की पराबैंगनी किरणे सीधे पड़कर समुद्र जल को उबाल देती हैं और भारी बादल बनने तथा गर्म वायु में निम्नदाब पैदा होने के कारण चक्रवाती तूफान अक्सर आ जाते हैं। कुछ पर्यावरण विद्वानों के अनुसार ओजोन परत में छिद्र होने का कारण इस समुद्री मुक्त क्षेत्र में विभिन्न राष्ट्रों द्वारा बमों तथा मिजाइलों का अक्सर परीक्षण किया जाना हैं।

क्या सचमुच 500 वर्ष पूर्व ओड़िशा के प्रसिद्ध सन्त-कवि अच्युतानन्द दास द्वारा "माळिका" (काव्य) में की गई भविष्यवाणियाँ सच होने जा रही हैं कि समुद्र का जल बढ़ेगा और पुरी नगर डूब जाएगा, भगवान जगन्नाथ जी भी "छतिया" ग्राम में स्थानान्तरित हो जाएँगे?

क्या यह सब प्रलय के संकेत हैं? अणु बमों, अस्त्र-शस्त्रों, मिजाइलों के आविष्कार तथा निर्माण में अविरत लगे ये वैज्ञानिक तूफानों, प्रकृति के प्रकोप से बचने-बचाने का कोई आविष्कार क्यों नहीं करते? क्या तूफानों को रोकने का कोई यन्त्र निर्माण कर पाएँगे विश्व के वैज्ञानिक? अणु-बमों और मिजाइलों को दूर आसमान में ही निगल कर हजम कर सकनेवाली 'सुरसा' जैसे यन्त्र का आविष्कार क्यों नहीं करते ये वैज्ञानिक?

तूफानों को रोकने की क्षमता सिर्फ पहाड़ों में होती है, जिनकी गुफाओं में मानव तथा जिसकी तराई में पेड़-पौधे बचे रह सकते हैं। लेकिन शहरीकरण आदि विभिन्न निर्माणों हेतु पहाड़ ही तोड़ तोड़ कर गायब गए जा रहे हैं। आज के वैज्ञानिक नए पहाड़ बनाने का कोई आविष्कार क्यों नहीं करते?

23 Apr 2007

जयललिता ने करोड़ों हिन्दी-भाषियों को अपना फ़ैन बना लिया.... हिन्दी में भाषण देकर...

जयललिता ने करोड़ों हिन्दी-भाषियों को अपना फ़ैन बना लिया.... हिन्दी में भाषण देकर...

आज इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में एक चुनावी सभा में जयललिता ने पहली बार हिन्दी में भाषण देकर करोड़ों हिन्दीभाषियों को अपना फ़ैन बना लिया। (आज राष्ट्रीय सहारा दूरदर्शन न्यूज चैनल में समाचार देखा..) सुश्री जयललिता जी मुलायम सिंह के निमन्त्रण पर तीसरे मोर्चे के पक्ष में प्रचार हेतु पधारी थीं।

सचमुच, लगता है अब तमिलनाडु की लोकप्रिय नेता तथा पूर्व मुख्यमन्त्री जयललिता जी का राष्ट्रीय राजनीति में आने का तोरण पूरी तरह खुल गया है। क्योंकि बिना हिन्दी का सहारा लिए भारत की राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में सफलता पाना दुर्लभ ही होता है।

धन्यवाद जयललिता जी! इतनी मधुर, इतनी सुन्दर और इतनी शुद्ध हिन्दी बोल लेती हैं आप, बहुतों को आपका भाषण सुनकर आश्चर्य हुआ होगा! किन्तु हम जानते हैं कि आपको हिन्दी बहुत अच्छी तरह आती है। अटल बिहारी बाजपेयी जी तथा पत्रकारों से हिन्दी में बात करते हुए हम पहले भी आपको सुन चुके हैं।

किन्तु तमिलनाडु की प्रान्तीय राजनीति की लहर के विरुद्ध हिन्दी को प्रोत्साहित करना उनके स्थानीय राजनैतिक भविष्य के लिए शायद नुकसानदायक होता, यही सोचकर हिन्दी में भाषण नहीं देती थीं जयललिता जी।

यह सौभाग्य की बात है, कि अब उन्होंने प्रत्यक्ष अनुभव कर लिया है कि हिन्दी ही एकमात्र वह तारिणी माता है, जो राष्ट्रीय राजनीति में लोकप्रियता दिला सकती है। आधे से अधिक भारतवर्ष की आम जनता की भाषा तथा आधे से अधिक संसार में समझी जानेवाली भाषा में बोलने से ही तो सरलता से अधिकांश लोग आपके विचारों सुन व समझ सकेंगे न।

सोनिया जी विदेशी मूल की होने के बावजूद बड़े परिश्रम से हिन्दी सीखकर हिन्दी में बोलकर ही तो भारतवर्ष की जनता के हृदय सिंहासन पर 'राजमाता' की तरह विराजमान हो पाईं है। उनका पहला हिन्दी भाषण भुवनेश्वर में हुआ था। चूँकि उनको देवनागरी लिपि कठिन लगती थी, इसलिए उनके भाषण का मसौदा हिन्दी भाषा में किन्तु रोमन लिपि में डायाक्रिटिक मार्क लगाकर बनाया जाता था। अगर सोनिया जी ने हिन्दी में बोलना नहीं शुरू किया होता, केवल अंग्रेजी का सहारा लिया होता, तो वे कदापि भारतीय जनता के दिल में स्थान न बना पातीं। उनको जनता के दिल की राजमाता बनानेवाली "हिन्दी" देवी हैं, हिन्दी वाणी है। सचमुच 'हिन्दी' परम पूज्यनीय है। सचमुच आराध्य सरस्वती देवी हैं।

अब जयललिता जी ने भी हिन्दी विरोध छोड़कर हिन्दी का अनुसरण आरम्भ कर दिया है। अब वह दिन दूर नहीं लग रहा, जब हिन्दी विरोध सिर्फ इतिहास के किसी पन्ने के कोने में छिप कर रह जाएगा।

लोग तमिलनाडु को हिन्दी विरोधी प्रान्त मानते आए हैं, लेकिन वास्तव में देखा जाए तो सबसे ज्यादा व सबसे अच्छे हिन्दी के विद्वान तमिलनाडु से ही हैं। उदाहरण के लिए पूर्वाञ्चल व दक्षिणाञ्चल विभिन्न केन्द्रीय सरकारी कार्यालयों, बैंकों, उपक्रमों में कार्यरत हिन्दी अधिकारियों का सर्वेक्षण करें तो पाएँगे कि अधिकांश हिन्दी अधिकारी तमिलनाडु मूल के हैं।

चेन्नै (पूर्व मद्रास) आई.आई.टी, सी-डैक, चैन्नै से लेकर अनेकानेक प्रौद्योगिकी संस्थाओं ने हिन्दी (तथा अन्य भारतीय भाषाओं) के विशेष सॉफ्टवेयर बनाए हैं, अनेक समस्याओं का समाधान करके कई प्रकार की उपयोगी युटिलिटी प्रदान की है। कुछ तकनीकी विद्वानों से चर्चा करने पर पता चला कि उनका विरोध हिन्दी से नहीं, बल्कि देवनागरी लिपि में कालक्रम में आ गए कुछ विकारों, तर्कहीन क्रम, अवैज्ञानिक वर्ण तथा संयुक्ताक्षरों के विविध रूपों आदि से हैं।

जो भी हो, अब लगता है कि वह दिन दूर नहीं, जब राष्ट्रभाषा हिन्दी समग्र भारतीय जनता के दिल में निर्विरोध 'राष्ट्रीय-मातृभाषा' का स्थान अधिकार कर लेंगी।

धन्यवाद जयललिता जी!, राष्ट्रीय राजनीति में आपकी सफलता की कामना करते हुए 50 करोड़ हिन्दी भाषी तहेदिल से आपका साथ देने का आश्वासन देंते हैं। बस! जो शुरूआत आपने आज की है, उसपर आगे बढ़ती रहें!

28 Mar 2007

एल॰सी॰डी॰ कम्प्यूटर मॉनिटरों से भारी बचत

कम्प्यूटर के एल॰सी॰डी॰ मॉनिटरों से भारी बचत होती है, भले ही इनका मूल्य थोड़ा ज्यादा क्यों न लगे।





पर्सनल कम्प्यूटरों का प्रचलन आरम्भ होने के समय से इनके साथ सी.आर.टी. (CRT = Cathode Ray Tube) वाले मॉनिटरों का उपयोग होता था। इस क्षेत्र में तीव्र प्रगति होने से इनकी रिजोल्यूशन क्षमता 32 बिन्दु प्रति इंच (DPI) से बढ़कर आज 108 (DPI) तक पहुँच गई। किन्तु आजकल नए समतल दृश्यपटल वाले एल.सी.डी (LCD = Liquid Crystal Display) मॉनिटरों को उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। इनकी रिजोल्यूशन क्षमता 200 डीपीआई से भी अधिक हो गई है जिससे अत्यन्त सूक्ष्म दृश्य को भी साफ देखा जा सकता है।

आसानी से उठाकर ले जाने की सुविधा के लिए हल्के तथा कम स्थान घेरने तथा अत्यल्प विद्युत खपत आदि गुणों के कारण सर्वप्रथम एल.सी.डी मॉनिटरों का उपयोग लैपटॉप व नोटबुक कम्प्यूटरों में हुआ। इसके पश्चात आज डेस्कटॉप कम्प्यूटरों में भी उनका उपयोग धड़ल्ले से होने लगा है।

एल.सी.डी. मॉनिटरों का बाजार मूल्य अभी पुराने सी.आर.टी. मॉनिटरों की तुलना में लगभग दुगुने से भी अधिक है, किन्तु निकट भविष्य में उपभोक्ताओं की मांग में वृद्धि के मद्देनजर इनका मूल्य और सस्ता होने की उम्मीद है। फिर भी वर्तमान इन्फोसिस, सत्यम, आईबीएम, विप्रो, डीएसएल आदि सूचना प्रौद्योगिकी कम्पनियों ने अपने कार्यालयों के डेस्टकॉप कम्प्यूटरों के साथ पुराने सी.आर.टी. मॉनिटरों को बदलकर एल.सी.डी. मॉनिटरों की ही स्थापना की है। क्योंकि आरम्भिक लागत अधिक होने के बावजूद समग्र हिसाब लगाने से एल.सी.डी. मॉनिटरों से काफी बचत तथा लाभ स्पष्ट हुए हैं, जिनमें से प्रमुख निम्नवत् हैं :

कम स्थान घेरना : सी.आर.टी. मॉनिटर 3 से 4 वर्गफुट का स्थान घेरते हैं तो एल.सी.डी. मॉनिटर के लिए मात्र 2 से 4 ईंच चौड़ाई का स्थान पर्याप्त है।

स्पष्ट पाठ व चित्र : इनका रिजोल्यूशन अधिक होने के कारण अत्यन्त छोटे अक्षर, चित्र, ग्राफ और अभियान्त्रिकी डिजाइन आदि स्पष्ट देखे जा सकते हैं।

स्वास्थ्य सुरक्षा : सी.आर.टी. मॉनिटरों से विद्युत-चुम्बकीय लहरें एवं इलेक्टॉनिक विकिरण (radiation) उत्सर्जित होते हैं, जिनका मानव-स्वास्थ्य पर अत्यन्त बुरा असर पड़ता है। कम्प्यूटर पर अधिक समय काम करनेवालों की आँखों की दृश्यशक्ति जल्द खराब हो जाती हैं, उन्हें विशेष चश्मे लगाने पड़ते हैं। उनकी अन्य ज्ञानेन्द्रियों पर कुप्रभाव से वे सिरदर्द, तनाव, उच्च-रक्तचाप, स्नायुओं में दर्द व कम्पन, अपच, मस्तिष्क-तंत्रिका शोध आदि के चिर-रोगी बन भी बन सकते हैं। इनकी तुलना में एल.सी.डी. मॉनिटरों से विकिरण नगण्य होते हैं और स्वास्थ्य हानि का खतरा नहीं रहता। एक अनुमान के अनुसार इन विकिरणों के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव से चिकित्सा खर्च लगभग 20 प्रतिशत बढ़ सकता है।

समतल दृश्यपटल : समतल पटल होने के कारण एल.सी.डी. मॉनिटर पर पाठ व चित्र ऐसे प्रकट होते हैं, जैसे सामने खुली पुस्तक में दिखते हैं।

वातानुकूल व्यय कम : सी.आर.टी. मॉनिटर 40 से 90 डिग्री सेंटीग्रेड ताप भी वातावरण में उत्सर्जित करते हैं, जिसके शीतलीकरण हेतु प्रति 7 से 8 कार्यघण्टों के दौरान वातानुकूलन की बाबत लगभग 6 किलोवाट अर्थात् 6 यूनिट बिजली अधिक खर्च होती है। साथ ही वातानुकूलन यन्त्रों से पैदा होनेवाले ग्रीनहाउस प्रभाव तथा हानिकर गैस से वातारवरण को नुकसान का खतरा भी कम होगा। विद्युत उत्पादन हेतु होनेवाले प्राकृतिक संसाधनों की हानि ताथा प्रदूषण फैलने के खतरों से भी बचत होगी।

विद्युत खपत में बचत : विभिन्न मॉडलों के अनुसार एल.सी.डी. मॉनिटरों में मात्र 18 से 25 वाट ही विद्युत खपत होती है जबकि सी.आर.टी. मॉनिटर हेतु 100 से 160 वाट विद्युत की जरूरत होती है, अर्थात लगभग 7-8 गुना अधिक विद्युत खपत होती है। इस प्रकार एल.सी.डी. मॉनिटरों के प्रयोग से 7-8 कार्यघण्टों के दौरान विद्युत खपत की बाबत लगभग 4.00 रु. की बचत हो सकती है।

अनुरक्षण व्यय में कमी : भारत जैसे ग्रीष्म प्रधान देश के परिवेश में सी.आर.टी. मॉनिटर अक्सर अधिक खराब होते पाए गए हैं। किसी की पिक्चर ट्यूब जल जाती है तो किसी का ई.एच.टी. यूनिट खराब हो जाता है। किसी की स्क्रीन का फोस्फोरस खराब हो जाता है। इनकी मरम्मत व पुर्जों के बदलने में भारी लागत आती है। इनकी तुलना में एल.सी.डी. मॉनिटरों के अनुरक्षण की लागत कम आती है। क्योंकि कम वोल्टेज उपयोग के कारण ये अधिक टिकाऊ होते हैं।

हालांकि नई तकनीकी होने के कारण भारत के सामान्य नगरों में एल.सी.डी. मॉनिटरों की मरम्मत हेतु अच्छे सर्विस सेंटरों का अभाव है, और अभी सिर्फ पुर्जों को बदला जा सकता है। किन्तु तेजी से बढ़ती मांग से शीघ्र ही हर स्थान पर सेवा उपलब्ध होगी।

आजकल बाजार में कई बड़े शो-रूम्स में, दुकानों में, घरों में एल.सी.डी. टीवी भी लगे हुए देखने को मिलते हैं, जो दीवारों में कैलेण्डर की तरह टंगे होते हैं। लागत अधिक होने के बावजूद इनके कुल कार्यकाल में होनेवाले प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष खर्च का हिसाब करने पर एल.सी.डी. उपकरण अधिक सस्ते बैठते हैं। एक सामान्य कार्यालय का अनुमान निम्न तालिका में दिया गया है :-

(ब्लॉगर में फिलहाल तालिका (table) प्रविष्टि की सुविधा नहीं होने के कारण यह plain text में बदल गया है)

मद सी.आर.टी.उपकरण मद एल.सी.डी. उपकरण
प्रति एकक विद्युत खपत प्रति एकक विद्युत खपत 150 वाट x 8 घण्टे = 1.2 कि.वा. 20 वाट x 8 घण्टे = 0.16 कि.वा. x रु.3.20 प्रति यूनिट की दर से रु. 3.84 x रु.3.20 प्रति यूनिट की दर से रु. 0.51


वातानुकूलन (A.C.) हेतु विद्युत खपत वातानुकूलन (A.C.) हेतु विद्युत खपत 60 डिग्री सेंटीग्रेड सृजित ताप x 8 घण्टे 5 डिग्री सेंटीग्रेड सृजित ताप x 8 घण्टे1 कि.वा.घं./यूनिट=13 डिग्री शीतलीकरण 1 कि.वा.घं./यूनिट=13 डिग्री शीतलीकरण60-30=30/13xरु.3.20 रु.7.38 5-3=2/13xरु.3.20 रु. 0.49

कुल विद्युत व्यय रु. 8.22 कुल विद्युत व्यय रु. 1.00

विद्युत व्यय अन्तर (प्रति दिन) रु. 7.22 x 5 वर्ष x 290 कार्यदिवस प्रतिवर्ष हेतु रु.10,469.00

वर्तमान बाजार मूल्य (14") रु. 7,200.00 वर्तमान बाजार मूल्य (14") रु. 14,500.00

दोनों का अन्तर रु. 7,300.00

कुल बचत(5 वर्ष में) रु.10,469 - रु. 7,300 = रु. 3,160.00

अप्रत्यक्ष स्वास्थ्य व पर्यावरण सुरक्षा हेतु प्रतिदिन रु.1.00 x 290 दिन/प्रतिवर्षx 5 वर्ष=रु.1450 जोड़ने पर रु. 4,610.00

स्थान किराया रु.10 प्रति माह/वर्गफुट x 2 फुट (अधिक स्थान का अन्तर) x 60 महीने=रु.1200 जोड़ने पर रु. 5,810.00

उपरोक्त अनुमान के अनुसार यदि किसी बड़े कार्यालय में प्रयुक्त लगभग 250 कम्प्यूटरों के सी.आर.टी मॉनिटरों के बदले एल.सी.डी मॉनिटर लगाने पर होनेवाली बचत का हिसाब लगाएँ तो यह राशि रु.14,52,500 और लगभग 1000 कम्प्यटरों का उपयोग करनेवाले कार्यालय के लिए लगभग 50 लाख रुपये हो सकती है। और फिर स्वास्थ्य, विशेषकर आँखों की सुरक्षा का हिसाब लगाएँ तो बचत का हिसाब अनगिनत रुपये के लाभ में प्रदर्शित होगा।

(अक्षर-2004 में प्रकाशित)

24 Mar 2007

इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड ले-आऊट की समस्याएँ

CDAC,Pune के द्वारा भारतीय भाषाओं के कम्प्यूटर में इनपुट के लिए विकसित इन्स्क्रिप्ट(Inscript) की-बोर्ड की सबसे बड़ी खूबी है कि इसमें किसी भी भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटर में इनपुट किया जा सकता है। सभी के लिए एक ही लेआउट है।

लेकिन इसकी सबसे बड़ी खराबियाँ निम्नवत् है:-

(1) मात्राओं को अलग से याद एवं टाइप करना पड़ता है। (जबकि भारतीय भाषाएँ मूल रूप में अंग्रेजी से भी अधिक सरल, सपाट और सीधी हैं। सिर्फ मूल व्यंजन+स्वर+अनुनासिकादि क्रम से समस्त अक्षर और संयुक्ताक्षर स्वयंचालित रूप से प्रकट हो सकते हैं।)

इस प्रकार कुल 16 कुँजिया अनावश्यक रूप से अधिक याद रखनी पड़ती है। जबकि इनकी कोई आवश्यकता ही नहीं है। इन 16 कुँजियों की जगह बहुधा उपयोग के चिह्न या अन्य वर्णों के लिए प्रयोग हो सकता था।

(2) ट, ठ, ड, ढ, नुक्ता, ऑ, य आदि अक्षर दाहिनी ओर कोने में होने के कारण छोटी उंगली से टाइप करना कठिन होता है और बारम्बार त्रुटियाँ होती हैं।

(3) देवनागरी में बहुधा प्रयोग में आनेवाले चिह्नों (punctuation marks = : ; ' " / ? ! आदि) के लिए भी बारम्बार "भाषा/लिपि toggle कुंजी" को दबाकर अंग्रेजी ले-आऊट में अनावश्य रूप से लौटना पड़ता है।

(4) हलन्त का बारम्बार अनावश्यक रूप से प्रयोग करना पड़ता है। उलटा क्रम चलता है। आधे अक्षर के लिए दो कुंजियाँ दबानी पड़ती है, जबकि पूरे अक्षर के लिए सिर्फ एक। जिससे ध्वन्यात्मक इनपुट में भारी बाधा आती है। इस दृष्टि से इन्स्क्रिप्ट को ध्वन्यात्मक आधार पर निर्धारित होना गलत सिद्ध करता है।

(5) यह उच्च गति से टंकण/इनपुट क्षमता प्रदान नहीं कर पाता। गलतियों की सम्भावनाएँ अधिक रहती हैं, विशेषकर दाहिने छोर पर स्थित कुँजियों से बननेवाले शब्दों में।

(6) व्यंजनों को दाहिनी ओर और तथा स्वरों को बाईं ओर उलटे क्रम में रखा गया है। जबकि व्यंजन के बाद ही स्वर लगता है। देवनागरी तथा भारतीय भाषाएँ मुख्यत: बायें से दायें क्रम में लिखी जाती हैं, न कि अरबी-फारसी की तरह दायें से बायें क्रम में। अतः व्यंजनों को बाईं ओर तथा स्वरों को दाहिनी ओर होना चाहिए था।

मेरे विचार में हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं के लिए सर्वश्रेष्ठ IME की अवधारणा 1984-85 में Former-NCST, Mumbai, (वर्तमान CDACMumbai) द्वारा विकसित 'विविधा' नामक सॉफ्टवेयर में प्रयोग की गई थी, जिसकी भारत सरकार के "इलेक्ट्रॉनिक कोर्पोरेशन ऑफ इण्डिया" द्वारा मार्केटिंग की जाती थी और जो सिर्फ 300 रुपये में बेचा जाता था। किन्तु यह DOS में चलता था, और Windows की लोकप्रियता तथा त्रुटिपूर्ण ISCII-1991 के मानकीकरण बाद यह अधिक प्रयोग में नहीं आ सका। आज आवश्यकता है इसको पुनर्जीवित करने की।

(7) इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड में हिन्दी के अक्षर-विन्यास को अलग से तथा अंग्रेजी के अक्षर-विन्यास को अलग से याद करके टंकण अभ्यास की जरूरत होती है, जिससे दिमाग पर दोगुना बोझ पड़ता है।

(8) इन्सक्रिप्ट की-बोर्ड से और भी तेज गति से तथा गलती-रहित इनपुट किया जा सकेगा, यदि इसके लेआऊट में संशोधन किया जाए भारतीय भाषाओं की पूर्ण ध्यन्यात्मकता को ध्यान को रखते हुए। अतः आवश्यकता है इसमें और सुधार करने की।