15 Feb 2007

श्रम विद्युत की बैटरी

"काश! भोजन अपने आप पक जाता। काश! कपड़े अपने आप धुल जाते। काश! हमें कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता। कितना अच्छा होता यदि सोचते ही कल्पवृक्ष के नीचे बैठे व्यक्ति की तरह हमारी सारी मनोकामनाएँ अपने आप पूरी हों जाती। आराम ही आराम होता हमारे जीवन में।"

आज संसार के सभी लोग यही चाहते हैं कि कम से कम परिश्रम करना पड़े और अधिक से अधिक आराम मिले। कम से कम परिश्रम करके ही सारे काम संपन्न हो जायें। बिना श्रम किए ही स्वतः फल मिल सके।

संसार के वैज्ञानिक दिनोंदिन मानव को अधिकाधिक सुख-सुविधा प्रदान करने के लिए नए नए आविष्कारों की तलाश में लगे हुए हैं। प्राचीन काल में दूर प्रांत के व्यक्ति के पास सन्देश किसी अन्य व्यक्ति को भेजकर ही पहुँचाया जा सकता था। आज चलते-फिरते-घूमते सेल्यूलर फोन के माध्यम से हम संसार भर में बातचीत कर सकते हैं। दूरदर्शन चैनलों में संसार के दृश्य घर बैठे देखते हैं। उपग्रहों और अंतरिक्ष यानों में बैठ ब्रह्मांड की सैर कर सकते हैं।

लेकिन व्यक्ति को जितनी अधिक सुख-सुविधाएँ और आराम मिलता जा रहा है, उसका मानसिक तनाव, अशान्ति और दुःख भी बढ़ता ही जा रहा है। शरीर में अनेकानेक नए-नए रोग घर करते जा रहे हैं। क्या कारण है इसका? सुख दुःख में क्यों बदलता जा रहा है?

कहावत है -- "अति सर्वत्र वर्जयेत।" अत्यधिक सुख-सुविधा भी व्यक्ति को आलसी बना देती है। उसकी कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ शिथिल पड़ती जाती हैं। जैसे कि प्रसाधित भोजन या फास्ट फूड अधिक खाने वाले शहरी व्यक्तियों के दाँत ही नहीं पाचन तंत्र भी कमजोर पड़ जाता है।

अर्थशास्त्र में उत्पादन या व्यवसाय के लिए पाँच प्रमुख तत्व बताये गए हैं -- भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन और उद्यम। इन सभी में श्रम तत्व सर्वोपरि महत्व का है, जिसके बिना कोई भी कार्य संभव नहीं हो पाता। यहाँ हमें श्रम का व्यापक अर्थ लेना होगा। अर्थात् श्रम में केवल मजदूर ही नहीं, बल्कि मालिक या प्रबंधकों का परिश्रम भी शामिल है। चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो या बौद्धिक। अगर कहीं किसी रूप में श्रम ही नहीं होगा तो कोई भी उत्पादन या विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

समस्त साधनों में श्रम एक ऐसा तत्व है जो सर्वाधिक क्षणभंगुर प्रकार का होता है। जिस प्रकार किसी विद्युत उत्पादन केन्द्र से उत्पादित विद्युत का उपयोग नहीं किया जाए, तो वह ऊर्जा बेकार नष्ट हो जाती है। यह ऊर्जा जमा करके नहीं रखी जा सकती। उसी प्रकार शरीर में चयापचय से सृजित ऊर्जा शक्ति का उपयोग नहीं किया जाए तो वह नष्ट हो जाएगी। उसे जमा करके नहीं रखा जा सकता। क्या ऐसी कोई बैटरी नहीं बनाई जा सकती, जो किसी 1000 मेगावाट के विद्युत संयंत्र से उत्पादित होनेवाली विद्युत शक्ति को कुछ वर्षों तक भंडारित करके रख सके? और जब संयंत्र बन्द हो तो उसका उपयोग किया जा सके।

अत्यन्त सीमित क्षेत्र में ही ऊर्जा को बैटरी में भंडारित किया जा सकता है। 3 वोल्ट से लेकर 12 वोल्ट तक की ही फिर से चार्ज की जा सकने वाली बैटरियाँ फिलहाल बाजार में उपलब्ध होती हैं, जो विद्युत शक्ति से चार्ज होती हैं। उसी प्रकार हमारे शरीर में भोजन के पाचन से बना रस अनन्तः शरीर में चर्बी के रूप में भंडारित होता है। जो कुछ सीमित समय तक ही भूखे रहने पर हमें ऊर्जा प्रदान कर सकता है।

यदि हम दिन भर कोई भी काम या परिश्रम न करें, तो क्या भूख नहीं लगेगी? भूख तो लगेगी ही। दिन भर आराम फरमाने पर, आलस्य से पड़े रहने पर भी भूख-प्यास तो लगेगी ही। चाहे हमारे हाथ-पैर, दिमाग काम करें या न करें, पर पेट तो निरन्तर अपना काम करते रहता है। भोजन को पचाकर शरीर को जीवित रहने के लिए ऊर्जा प्रदान करने का काम निरन्तर करते रहता है। और पेट खाली होते ही फिर भूख लग जाती है। अतः जिस प्रकार जीवित रहने के लिए भोजन अत्यन्त आवश्यक है, उसी प्रकार जीवित रहने के लिए अपने अंगों से काम लेना भी उतना ही आवश्यक समझना चाहिए। नहीं तो शरीर के अंगों में मशीनों के पुर्जों में लगनेवाली जंग की तरह अकड़न छाने लगेगी।

आलस्य बुरी बला है। इससे बचना जरूरी है। आलस के कारण हमारा बहुमूल्य समय नष्ट हो जाता है। एक बार बीता हुआ समय या अवसर हाथ से निकल जाए तो फिर हाथ नहीं आता। बीता हुआ क्षण कभी लौटकर नहीं आता। समय को किसी बन्धन में आबद्ध नहीं किया जा सकता। उसे कदापि रोका नहीं जा सकता। घड़ी निरन्तर चलती ही रहती है। अतः समय नष्ट न कर, हमें सदा कुछ न कुछ काम करना ही बुद्धिमानी है। काम करने से, परिश्रम करने से हमारा कोई नुकसान नहीं होगा, बल्कि शरीर तन्दुरुस्त बना रहेगा।

कुछ आलसी लोग कहते हैं कि बिना श्रम किए हमें दूसरों के श्रम के फल को लूट लेना चाहिए। चार्वाक नीति है कि कर्ज करके घी पीते रहना चाहिए। भगवान की बनाई सृष्टि और उसकी कृपा का उद्धरण देते हुए दास मलूक ने कहा है --

अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।।

लेकिन अगर सभी व्यक्ति श्रम करना छोड़ दें और चकोर पक्षी की तरह आकाश की ओर मुँह बाये पड़े रहें कि भगवान आसमान से अन्न-जल टपका देंगे उनके मुँह में, तो फिर सारा संसार कैसे चलेगा? समस्त चेतन प्राणी जड़ नहीं बन जायेंगे? या फिर किसी काल्पनिक वैज्ञानिक कहानी की तरह ऐसी किसी एनर्जी टेबलेट का आविष्कार किया जाए, जिससे कि न तो भूख लगे, न प्यास, न टट्टी लगे न पेशाब। इससे आगे भी कुछ ऐसे आविष्कार के बारे में सोचा जा सकता है, जिससे कि सांस भी न लेना पड़े। इसका तो बड़ा सरल उपाय है -- आत्महत्या। अर्थात चेतन से जड़ बन जाना। पत्थर बन जाना।

संसार चक्र को स्वचालित रूप से चलते रहने के लिए भगवान ने समस्त चेतन प्राणी में भूख-प्यास की भावनाएँ सृजित की हैं और कर्म करने के लिए हाथ पैर दिए हैं। हर प्राणी को अपना भोजन तलाशना पड़ता है। चींटी से लेकर हाथी तक को। इसीलिए तुलसीदास ने रामायण में स्पष्ट किया है --

कर्म प्रधान विश्व करि राखा।
जो जस करे सो तस फल चाखा।।


अतः श्रम व कर्म को सर्वोपरि महत्व देते हुए सदा कुछ न कुछ कर्म करते रहना चाहिए। ऊर्जा को भंडारित नहीं किया जा सकता। लेकिन कर्मों के फल को धन या उपज में परिणत करके भंडारित किया जा सकता है। इस श्रम ऊर्जा को संस्कारों की बैटरी में भरा जा सकता है। कमाई गई धन-संपत्ति तो हम इस जन्म भर उपभोग कर सकते हैं, हमारे कई पीढ़ियों के वंशजों के लिए छोड़ सकते हैं, देश व समाज की भलाई में खर्च कर सकते हैं। किन्तु कमाया गया पुण्य हमारे आगामी जन्मों के लिए भी धर्मराज के खाते में जमा हो जाता है, जिसका हम जन्म-जन्मान्तर तक उपयोग कर सकते हैं। अतः निरन्तर श्रम या काम करते रहना चाहिए। कभी अपनी ऊर्जा एवं श्रम को बेकार नहीं खोना चाहिए।
क्योंकि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। अतः विद्वानों की शिक्षा है--
कल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में प्रलय होयगो, बहुरि करैगो कब??


किन्तु इसका भी विपरीत श्लोक बना लिया है कुछ आलसी-विद्वानों ने...
आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों।
इतनी जल्दी क्या पड़ी है, जीना है बरसों॥
देश में आज भुखमरी फैली हुई है। क्यों? क्योंकि बेकारी फैली हुई है। लोगों के पास काम नहीं है। लोग काम की तलाश में ,नौकरी की तलाश में दर-दर भटकते हैं। श्रमिकों के दल-बल काम की तलाश में एक प्रान्त छोड़कर दूसरे प्रान्त की लम्बी यात्राएँ कर रहे हैं। रोजगार कार्यालयों में बेरोजगारों की सूचियाँ दिनों दिन लम्बी होती जा रही है।

दूसरी ओर देखें तो किसी काम के लिए हमें योग्य व्यक्ति नहीं मिलते। कभी किसी काम के लिए कोई मजदूर चाहिए तो हमें नहीं मिलता। यहाँ तक स्थिति पहुँच जाती है कभी, कि किसी पर्व पर भोजन कराने के लिए हमें कोई ब्राह्मण भी नहीं मिलता। कभी कभी तो दान लेने वाला कोई भिखारी भी कहीं दिखाई नहीं देता। देश भर में जहाँ नजर दौड़ायें, हर क्षेत्र विभिन्न परियोजनाएँ अधूरी पड़ी दिखाईं देती हैं। सारे काम अधूरे पड़े दिखते हैं। कोई काम करने वाला नहीं मिलता।

कहीं काम है, करनेवाले नहीं। कहीं करनेवाले हैं, पर काम नहीं है। कहीं काम मिल जाने पर लोग मुफ्त की रोटी पाना चाहते हैं। सरकारी नौकरी मिल जाने पर लोग आराम फरमाते हैं, अपना काम समय पर पूरा नहीं करते। कल-कारखानों में, सरकारी कार्यालयों में कर्मचारी आन्दोलन चल रहे हैं। असन्तोष व्याप्त है। श्रमिकों के अनुसार अधिकारीगण एवं मालिकगण उनका शोषण करते हैं, खुद आराम फरमाते हैं। अधिक सुख-सुविधाएँ भोगते हैं, संगठन का धन विभिन्न उपायों से हड़पते हैं और उन्हें सताते हैं। दूसरी ओर अधिकारीगण एवं मालिक यह आरोप लगाते हैं कि श्रमिक बेहक की मांग करते हैं। इतनी मजदूरी देने पर और बढ़ाने की मांग करते हैं और इसके बावजूद कामचोरी करते हैं। आलस करते हैं। कारखाने को नुकसान पहुँचाते हैं। मालिक एवं अधिकारीगण जिस प्रकार दिनरात अपने संगठन की गतिविधियों के प्रति चिन्ताग्रस्त रहते हैं, जिम्मेदारियाँ संभालते हैं, उसके विपरीत श्रमिकगणों को केवल अपनी मजदूरी मिलने से मतलब रहता है। वे संगठन के विकास के बारे में कुछ नहीं सोचते।

इन सारी समस्याओं के मूल की तलाश करने पर हम अन्त में इसी सारांश पर पहुँचते हैं कि श्रम ऊर्जा के प्रबंध में, समन्वय में, सही उपयोग करने में हमारे मानव संसाधन विकास के सिद्धान्तों या नीति में कुछ मूलभूत गलती छिपी हुई है, जो नजरों में नहीं आती। मानव-संसाधन-प्रबन्ध-शास्त्र श्रम और श्रमिक की सही परिभाषा करने में सफल नहीं हुआ है। श्रम ऊर्जा को संरक्षित करने के लिए किसी विशाल बैटरी की परिकल्पना तक नहीं कर पाया है। इसके लिए गीता में भगवान के मुख से उद्धृत कर्म की सही परिभाषा को जीवन में उतारने का प्रयास करना होगा --

कर्मण्येवाधिकारस्ते तु मा फलेषु कदाचन।

श्रमेव जयते! आइए! अब हम सब मिलकर उस विधि की तलाश करें जो हमारे समय और श्रम अर्थात् कर्म को इतनी सही रीति सरणीबद्ध कर सके कि हमारा एक भी क्षण बेकार न जाए, हमारी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक ऊर्जा जरा-सी भी व्यर्थ न हो पाए, हमारे कर्मों के फल निरन्तर संग्रहित होते रहें, इस जन्म के लिए धन - संपत्ति, सुख-शान्ति और आनेवाले जन्मों के लिए पुण्यों का अपार खजाना जमा होते रहे, और वह बैटरी निरन्तर चार्ज होती रहे।

शक्ति-अर्चना

जग की रचना की तब, नारी जो तूने ऐसी बनाई।
हे पावन परमात्मा! तुमको है लाखों लाख दुहाई॥

हे भाई‍‍! इन महामाया जी की बातें, तो मैं सुन चकराया।
पूर्णब्रह्म परमात्मा को भी, जिसने पग-पग नाच नचाया॥

साहित्यकारों की चाटुकारिता, जग को विभ्रम में यूँ डाला।
संग्राम समर में पूर्ण निपुण, नारी का नाम दिया क्यूँ अबला??

आठों अवगुण आठ पहर नित, इनके तन में बसा हुआ।
कामदेव धनुष सन्धाने, त्रिनेत्र भृकुटि पर सदा चढ़ा हुआ॥

हरि ने जब अवतार लिया तो, स्वयं राधिका बन आई।
कृष्ण के हाथ में दे बाँसुरी, प्रेम मदमाती धुन सुनवाई॥

ब्रह्मा और शंकर तो क्या, विष्णु भी इनसे न बच पाया।
भाग छिपे क्षीरसागर में, तो शेष सेज में बाँध सुलाया॥

नर हो चाहे नारायण, सब करें सदा गुलामी इनकी।
इसीलिए बड़े भाई जी, पीस रहे इनकी घनचक्की॥

जब साड़ी नई मिल जाती, तब झट लक्ष्मी बन जाती।
बैठ विष्णु के चरण चापती, नई छन छन छवि दिखलाती॥

हे बन्धु सुहृदवर सुनो, 'वो' नाता मत जोड़ो इनसे।
राम को वन में भेजा, दशरथ को मारा कुपद्रव से॥

शादी के पहले तो कन्या वह, दिखती बिल्कुल भोली-भाली।
पर हाय, शादी के बाद वह, निकलती पक्की गजब की गोली॥

कभी खिलखिल हँसती, कभी झिलमिल रोती, नित नवरूप दर्शाती।
कभी मन्द मन्द मुस्का हर्षाती, कभी कुटिल कटाक्ष तीर वर्षाती॥

कभी निर्लज्ज हो बनती शरारती, कभी शरमा कर सिर झुकाती।
नजरें उठाकर ज्यों गिराती, दिल पे गाज गिराती गजब ढाती॥

कभी बन्द न होती इनकी गप्पी, कभी साधती लम्बी चुप्पी।
मन के अन्दर मचे बवण्डर, मुँह फुला लेती ज्यों कुप्पी॥

गुस्सा होकर भड़भड़ बकती, सारा घर सर पर उठा लेती।
जल मरने की धमकी देती, कभी झट अपने मैके भग जाती॥

कहीं तपस्विनी, कहीं मन्दाकिनी, कहीं कुल कल्याणी कहलाती।
कहीं गंगा पावनी पापमोचनी, सबको निर्मल करती बहती॥

कहीं सर्पिणी, कहीं शेरनी, कहीं काली बन कलुष मिटाती।
कहीं सूपर्णखा, कहीं पूतना बनती, कहीं सती सीता बन जाती॥

कभी उन्मत्त, कभी अति संयत, कभी बन जाती शान्ति की मूर्ति।
जगजननी शक्ति शिवा बन, करती भक्तों की मनकामना पूर्ति॥

कभी गरजती, कभी चमकती, कभी करुणा बादल बरसाती।
कभी रण दुर्गावती बनती, झाँसी की रानी-सी तलवार चलाती॥

कभी ममता प्रेम से ओत-प्रोत, बनकर प्रेरणा स्रोत तारती।
सरस्वती, भगवती, पद्मावती, बन पार्वती पाती पूजा आरती॥

कभी डरती, कभी डराती, निज दूध पिला बच्चों को पालती।
सब कुछ वह बस, यूँ सह जाती, ज्यों धरती माता भारती॥

विचित्र चरित्र नारी का गाया, लिख-लिख कवि अब थक आया।
हे जग-निर्माता, इनकी माया, तू भी आज तक समझ न पाया॥

व्याप्त है ब्रह्माण्ड भर में, माया-मोह का इनका अति शासन।
काश! ये 'हरि' को मुक्त रखें, तो पूजूँ इनका पद-आसन॥

"सुधार हेतु सुझाव सादर आमन्त्रित हैं" - हरिराम

शक़ का भूमण्डलीकरण

जब राम वनवास के दौरान पंचवटी में निवास कर रहे थे। रावण ने स्वर्णिम मायामृग के वेश में मारीच को भेजा। सीता ने उसका सुनहरा चमड़ा पाने की इच्छा प्रकट की। राम उसका शिकार करने चले। लक्ष्मण से कह गए कि सीता की रक्षा करे एवं उसे छोड़ कर कहीं न जाए। अंत में राम के तीर से मायामृग ने मरते समय राम की आवाज की नकल करते हुए 'हा लक्ष्मण' 'हा लक्ष्मण' पुकारा। राम की दर्दनाक पुकार सुनकर सीता विचलित हो उठी। उसने लक्ष्मण से तुरन्त राम की सहायता के लिए जाने को कहा। लक्ष्मण ने कहा कि "माता राम का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। आप निश्चिंत रहें, भैया का आदेश है कि मैं आपको छोड़ कहीं न जाऊँ।" लेकिन सीता का मन बिल्कुल नहीं माना। उसे लक्ष्मण पर ही सन्देह हो उठा। उसने लक्ष्मण को तिरष्कृत करते हुए कोसा -- "तुम कितने नीच हो, अपने भाई की संकट में पड़ी चीख सुनकर भी उसकी मदद को नहीं जाते। शायद, तुम्हारे मन में खोट आ गया है। तुम अपने भाई के मर जाने के बाद मुझे लेकर भाग ..... चाहते हो!"

अपनी माँ से कहीं ज्यादा सम्मान करते थे वे सीता का। उसी का इतना गंदा शक़ और कटु मर्म वचन सुनकर उनसे नहीं रहा गया। वे उठ चल दिए, भाई राम की सहायता करने को।
और सीताहरण... रावण मरण ... समग्र रामायण की कथा का कारण बना, यही सीता का शक़। यदि उसने लक्ष्मण पर शक़ न किया होता तो किसी को इतने दुःख न झेलने पड़ते।

शक़ एक बहुत बड़ा विकार है। विशेषकर महिलाओं के एक बड़े अवगुण के रूप में इसका बखान हुआ है। नारी को जगत्-जननी के रूप में पूजनेवाले तुलसीदास ने रामायण में रावण के मुख से कहलवाया, क्योंकि किसी सुपात्र के मुख से वे नारी निन्दा कराकर उसे पाप का भागी नहीं बना सकते थे --

नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुण आठ सदा उर रहहीं।।
संशय अनृत चपलता माया। भय अविवेक अशौच अदाया।।

अर्थात् नारी के हृदय में आठ अवगुण सदा रहते हैं -- सन्देह, असत्य, चञ्चलता, माया, भय (डरपोकपन), अविवेक (मूर्खता), अपवित्रता और निर्दयता।

कुछ नारियाँ बहुत ही शक्की मिज़ाज की होती है। इसका कारण यह है कि कुछ दुर्घटनाओं से वे शारीरिक एवं मानसिक रूप से बहुत कमजोर हो गई होती हैं। यह बात नहीं कि पुरुष सन्देहशील नहीं होते। वे भी सन्देहशील होते हैं। पति-पत्नी के परस्पर सन्देह करने की अनन्तकाल से चलती आई घटनाएँ, एक स्वाभाविक प्रक्रिया बन गई है।

शक और सन्देह के आधार पर ही पुलिस हजारों निर्दोषों को पकड़ कर मार-पीट कर जीवन भर के लिए अपंग बना देती हैं। झूठे सन्देह के आधार पर पकड़ कर हजारों निर्दोषों को दण्ड दे दिया जाता है। तो सन्देह के लाभ में अदालतों से अनेक दोषी व्यक्ति सरेआम अभियोग से बरी हो छूट जाते हैं।

महाराजा दशरथ ने भी जंगली हिंसक जानवर समझ लेने का सन्देह करके श्रवणकुमार पर तीर चलाकर उसे मार डाला था, जिसका दण्ड श्रवण कुमार के माता-पिता के शाप से उन्हें जीवन भर भुगतना पड़ा। पुत्र वियोग सहकर मरे।

शक़ बड़ा ही घृणित अवगुण है। हर किसी पर हो जाता है। इसके कारण हैं विश्वास का अभाव एवं भय। आज के संसार में जब हर कहीं भय का वातावरण व्याप्त है। हर इन्सान किसी न किसी अवगुण से जड़ित है। हर कहीं अशान्ति है। किसी इन्सान का दूसरे इन्सान पर भरोसा नहीं रहा। यहाँ तक कि व्यक्ति को आज अपने आप पर भी सन्देह होने लगा है। अपने मन पर, अपनी शक्ति पर, अपनी बुद्धि पर भी इन्सान का विश्वास नहीं रहा। "पता नहीं मैं यह कार्य सफल कर सकूँगा या नहीं।"

आज शक़ का भूमण्डीकरण हो गया है। क्योंकि चारों ओर अन्याय, अत्याचार, पापाचार फैलने से आतंक व्याप्त है। चोरी, डकैती, बलात्कार आदि आए दिन होते रहते हैं। ट्रांजिस्टर बम, सूटकेश, घड़ी आदि में छुपे बम विस्फोट हो चुके हैं। सरकार द्वारा भी घोषणा की जाती है कि किसी लावारिस पड़ी चीज को न छुएँ -- पता नहीं किस वस्तु में बम फिट हो।

जनता का नेताओं पर विश्वास नहीं कि वे सचमुच जनता के हित में कार्य करेंगे। हर एक मंत्री या राजनेता के भ्रष्ट होने का सन्देह कर रही है जनता। यह स्वाभाविक है, क्योंकि अनेक नेताओं के भ्रष्टाचार के मामले पकड़े गए हैं। आज किसी नेता का भी जनता पर भरोसा नहीं रहा। पता नहीं यह जनता उसे चाहती है, उसे जिताएगी या नहीं। पता नहीं लोग कब रुख बदल कर किसी अन्य को अपना वोट दे जाएँ।

प्रबन्धकों को श्रमिक संघों को एकत्र होते देखकर सन्देह होता है कि पता नहीं ये कहीं हड़ताल आदि की योजना तो नहीं बना रहे। श्रमिकों को प्रबंधन पर सन्देह होता है कि कहीं ये तालाबंदी, छँटनी, उनके हित की हानि की योजना तो नहीं बना रहे। शंकालु मनों में हमेशा दरार पड़ी रहती है। नेताओं में परस्पर सन्देह व अविश्वास से बड़े बड़े संगठन भी टूट जाते हैं।
मंदिर के द्वार पर जूते खोलकर जाते वक्त भी हमें सन्देह होता है कि कहीं कोई चुरा कर न ले जाए।

किसी के प्रति जरूरत से ज्यादा दया दिखा दें, तो वही व्यक्ति दयालु पर सन्देह करने लगता है। किसी भिखारी को लोग पाँच पैसे देते हैं। यदि कोई उसे सौ का नोट पकड़ा दे तो वह यही सन्देह करेगा कि कहीं यह नोट जाली तो नहीं, कहीं वह दाता पागल तो नहीं। जनता की भलाई करनेवाले, अच्छे व्यक्ति की नीयत पर भी सन्देह होने लगता है। प्रेम के अतिरेक में अद्भुत त्याग करनेवाले प्रेमी पर उसकी प्रेमिका ही सन्देह कर बैठती है, उसे गलत समझती है, सारे रिश्ते तोड़ कर खुद तो विरह की आग में जलती है और सबको जलाती है।

कहीं आपने कोई नई बात कही, प्रचलित परम्परा के विरुद्ध, लीक से हटकर कुछ नया करने का प्रयास किया, नए आविष्कार कर जनहित का साहस किया, तो लोग सन्देह कर बैठते हैं -- कहीं इसमें कोई भयंकर चाल तो नहीं।

दूध का जला छाछ को भी फूँक फूँक कर पीता है। सन्देह होता है, डर लगता है कि कहीं इससे भी मुँह जल न जाए।

जो लोग डरपोक होते हैं उन्हें ही सन्देह ज्यादा होता है। कमजोरी भी व्यक्ति को सन्देहशील, चिड़चिड़ा, शंकालु व अति आशंकित बना देती है। कहीं मन्द प्रकाश में रस्सी पड़ी देखकर भी उसे साँप समझकर आशंकित हो घबरा जाता है। आशंकित मन व्याकुल होकर अपनों को भी परे कर लेता है।

जब किसी व्यक्ति पर संकट के बादल मण्डराने लगते हैं, उसे कहीं से धोखा मिलता है, वह टूट पड़ता है, तो उसे हर किसी पर सन्देह होने लगता है। अपने रक्षक पर भी सन्देह होने लगता है। आज के जमाने में किस पर क्या भरोसा? भारत की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के अपने अंगरक्षकों ने ही उनको गोलियों से भून दिया था। फूल माला पहनाने के बहाने एक नारी ने प्रधानमंत्री राजीव गाँधी एवं स्वयं को आत्मघाती बम से उड़ा डाला था। अतः आज विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा हेतु हजारों कमाण्डो लगाए जाते हैं और करोड़ों रुपये खर्च होते हैं।

किसी बच्चे की चाकलेट में धूल या गन्दगी लगी देखकर उसकी माँ उसे रोककर चाकलेट साफ करके देना चाहती है, तो भी वह रो-चिल्लाकर विरोध करता है, उसे सन्देह होता है कहीं माँ चॉकलेट छीन तो नहीं लेगी। कोई कुत्ता कोई सूखी हड्डी लेकर भाग रहा होता है और उसे पानी में दूसरे कुत्ते की छाया भी दिख जाए तो सन्देह हो उठता है कि कहीं वह छीन न ले।

समग्र संसार विश्वास के आधार पर ही टिका है। सन्देह के कारण समग्र संसार का विनाश हो सकता है। यदि दो देशों को एक-दूसरे पर सन्देह गहराने लगे, अपनी असुरक्षा का संकट का सन्देह हो तो सामान्य सी घटना पर ही युद्ध छिड़ सकता है। और फिर यह विश्वयुद्ध में भी बदल सकता है।

सन्देहशील व्यक्ति अपना ही नहीं, अनेकों का नुकसान कर बैठता है। यदि मिसाइल का प्रचालन करनेवाले व्यक्ति की आँखें अचानक कमजोर हों जाएँ, उसे लाल व हरे बटन के हरे व लाल होने का सन्देह होने लगे तो उसकी अंगुली की एक गलत चाल समग्र विश्व को ध्वंश कर सकती है।

शंकालु व्यक्ति कहीं कोई भी कार्य सफल नहीं कर पाता। उसका भगवान पर से भी विश्वास उठ जाता है और भगवान तो विश्वास का ही दूसरा नाम है। अत्यन्त भाव-विह्वल भक्ति, प्रेम एवं आस्था से ही किसी के माध्यम से प्रकट होता है और अन्तर्मन को शान्ति देता है। उसके संकटों का निवारण करता है। शंकालु व्यक्ति की तो एकाग्रता ही नष्ट हो जाती है। वह ईश्वर की ओर ध्यान केन्द्रित ही नहीं कर पाता, शक्ति के अभाव में टूट जाता है। टूट कर बिखर जाता है। और बिखर कर दूसरों के पैरों के नीचे आ, उन्हें भी फिसला कर गिरा देता है।
जब किसी व्यक्ति या जाति या संगठन को हराना होता है, उसका नुकसान करना होता है, उस पर काबू पाना होता है, तो उस स्थान की बिजली पानी की लाइनें काट दी जाती है। बिजली और पानी आज के संसार में विशेषकर शहरी इलाकों में प्राण-स्वरूप हैं। इनके अभाव में हा-हाकार मच जाता है।

इसी प्रकार व्यक्ति के मन में उसके विश्वास व आस्था के आधार को दुश्मन सबसे पहले काटने का प्रयास करते हैं। उसके अपनों पर, उसकी शक्ति के स्रोत पर ही सन्देह पैदा करके बिछुड़ा देते हैं। और जब वह अशक्त हो, टूट कर अधमरा हो उठता है, तो उसपर काबू कर लेते हैं।

मुसलमानों ने सर्वप्रथम इस देश के मन्दिरों पर आक्रमण कर मूर्तियों को तोड़ कर इस देश की जनता की शक्ति के स्रोत ईश्वर पर से उनकी आस्था तोड़कर उन्हें अशक्त बना डाला था। तभी वे इस देश पर राज कर सके। आज भी अनेक विधर्मी लोग धर्मान्तरण कराकर इस देश की भोलीभाली जनता को अन्ततः राष्ट्रविरोधी कार्यों में उत्प्रेरित कर दे रहे हैं।

वैसे सन्देह भी जरूरी तो है ही, क्योंकि सन्देह के आधार पर ही दोषी की तलाश की जाती है। किन्तु केवल सन्देह के आधार पर कोई गलत कार्यवाही न करके, कोई पक्का प्रमाण पाने के बाद ही कार्यवाही करनी चाहिए।

एक कहानी है -- एक जंगल में एक यात्री थककर अनजाने में कल्पवृक्ष के नीचे बैठ गया। जैसे ही उसने सोचा कि पानी मिले, तुरंत पानी सामने आ गया। फिर उसने जैसे ही भोजन की इच्छा की, तो तुरंत भोजन सामने आ गया। अचानक उसे डर कर सोचा कहीं शेर आ जाए और मुझे खा जाए तो। तुरंत शेर आ उसे मार कर खा गया।

वैसे ही कभी कभी कैन्सर की आशंका से पीड़ित व्यक्ति को सचमुच कैन्सर हो जाता है। दृढ़ विश्वास से गोबर लेप कर भी कोढ़ी की रोगमुक्ति होने का दृष्टांत है। अतः भगवान की वाणी है कभी आशंकित मन से अशुभ सोचना तक नहीं चाहिए। व्यापारिक संगठनों के लिए उत्पादों की गुणवत्ता, लाभकारिता पर ग्राहकों का विश्वास, उनकी साख ही सबसे बड़ी पूँजी होती है।
आज इन्सान को भगवान पर भी विश्वास नहीं रहा। उसे हमेशा सन्देह बना रहता है कि अमुक देवता की पत्थर की मूर्ति क्या उसके संकट का निवारण कर पाएगी? यदि भगवान सचमुच में प्रकट हो जायें तो भी लोग कदापि उनपर विश्वास नहीं करेंगे। सन्देह करेंगे कि यह कोई पाखण्डी या पागल ही है। ज्यादा वर्षा से बाढ़ आने का सन्देह होने लगता है तो ज्यादा गर्मी से अकाल की आशंका होने लगती है।

अतः सर्वोपरि व्यक्ति को अपने आप पर से, अपनी क्षमता पर से, अपनी शक्ति पर से, और अपने भाग्य पर से, तथा भाग्याधिपति ईश्वर पर से विश्वास तिल मात्र भी कदापि नहीं तोड़ना चाहिए। यदि व्यक्ति ईश्वर पर ही सन्देह करने लगेगा, तो वह स्वयं ही नहीं, समग्र संसार को भी ले डूबेगा। व्यक्ति को हमेशा यह भरोसा रखना चाहिए कि ईश्वर की छत्रछाया सदा मेरे ऊपर है। वह कभी उसकी कोई हानि नहीं होने देगा। सदा ईश्वर पर सम्पूर्ण समर्पण भाव रखना चाहिए। हे प्रभु! मैं जो भी हूँ, जैसा भी हूँ, तेरा बच्चा हूँ, तेरी शरण में हूँ। अब तू चाहे मार, चाहे बचा। समग्र सृष्टि को अध्यात्म में एक नाटक माना गया है, जो पूर्व-निश्चित है, उसे कोई नहीं टाल सकता। ईश्वर की इच्छा के बिना कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता। यह ज्ञान हमें आश्वस्त कर शान्ति व असीम शक्ति देता है।

संकटकाल में, दुर्दिनों में यही ईश्वर भक्ति एवं विश्वास ही हमें उबार सकते हैं। कम से कम एक सर्वशक्तिमान ईश्वर के प्रति आस्थापूर्ण सर्वसम्बन्ध सदा दृढ़ता से कायम रखना चाहिए। तभी व्यक्ति के संकट मिटेंगे और उसके अच्छे दिन शीघ्र लौटेंगे।

लोग क्या कहेंगे?

बहुत पुरानी कहानी है :--

एक धोबी बाप-बेटा अपने गधे पर कपड़ों गठरी लादे चले जा रहे थे। उन्हें देख एक आदमी ने कहा - "देखो, कितने मूर्ख हैं। सवारी है फिर भी पैदल चले जा रहे हैं।" यह सुन बाप गधे पर बैठ गया, बेटा चलते हुए जाने लगा। कुछ आगे गए तो अन्य एक आदमी ने कहा - "देखो, छोटा-सा बेटा तो चलकर जा रहा है और बाप आराम से बैठा है।" यह देख बाप उतर गया और बेटे को गधे पर बैठा दिया। थोड़ा और आगे चलने पर लोगों ने कहा - "देखो, बूढ़ा बाप तो चल कर जा रहा है और जवान बेटा बैठा हुआ है।" यह सुन बाप-बेटे दोनों गधे पर बैठ कर जाने लगे। थोड़ा और आगे चलने पर लोगों के समूह ने कहा - "अरे, कितने कसाई हैं ये लोग! इतना बोझा ढोकर तो गधा मर ही जाएगा।"

यह सुन बाप-बेटे ने सोचा कि अब गधे को आराम देना चाहिए। उन्होंने गधे के अगले और पिछले पैरों में रस्सी बांधी और उसके बीच में एक डंडा फँसाकर उसे भार की तरह लाद कर ले जाने लगे। यह दृश्य देख तो लोग ठहाके पर ठहाका लगा उन्हें मूर्ख कहने लगे।

सचमुच यह दुनिया एक ऐसी नागिन है जो चलते हुए को डँसती है, सोए हुए को भी तो बैठे हुए को भी। किसी को नहीं छोड़ती। जितने मुँह उतनी बातें होती हैं। इस दुनिया रूपी नागिन को काबू में करना किसी के बस का नहीं।

लोग क्या कहेंगे -- इस डर से सभी डरते हैं। अपने आत्म सम्मान को बचाने के लिए अनचाहे, गैर-जरूरती काम करते हैं। लोकलाज की रक्षा के लिए विभिन्न लोकाचारों, परंपराओं का पालन करते हैं चाहे वे कितने ही अंधविश्वास पूर्ण क्यों न हों। और अपना काफी भयंकर नुकसान करते रहते हैं। दुःख में मरते रहते हैं।

कहा भी गया है चाहे कितना ही अच्छा काम क्यों न हो यदि वह लोकाचार के विरुद्ध है तो उसे कभी अच्छा नहीं कहा जाएगा। बड़े-बड़े वैज्ञानिक ही नहीं राजा-महाराजा भी लोकाचार के अनुसार अपनी इच्छा के विरुद्ध विभिन्न असहनीय कार्य करते हैं। भगवान राम ने भी एक धोबी के उलाहने पर अपनी प्रिय पत्नी सीता का परित्याग कर दिया। जबकि वे विश्वस्त थे कि सीता पूर्ण पवित्र है। क्योंकि वे स्वयं अग्नि परीक्षा कराके लाए थे। क्या वे धोबी को फाँसी पर नहीं चढ़ा सकते थे?

लोकतंत्र में लोगों की इच्छा सर्वोपरि मानी जाती है। ज्यादा लोग अगर गलत बात का पक्ष लें तो उसी को सही माना जाएगा। इसलिए कहा गया है कि प्रजातंत्र मूर्खों की सरकार होती है। भगवान राम लोकतंत्र को मान्यता देते रहे। मर्यादा पुरुषोत्तम होकर भी सदा दुःख झेलते रहे। हर क्षेत्र में आदर्श की स्थापना करने के बावजूद खुद दुःखी रहे तो दूसरों को भी एक प्रकार से दुःखी करते रहे।

इसी प्रकार लोग क्या कहेंगे, इसका ध्यान रखने वाला व्यक्ति पंगु बन कर रह जाता है। कोई नया कार्य नहीं कर पाता। कई उत्तम कार्य में संलग्न व्यक्ति भी लोगों की आलोचना सुनकर अपने लक्ष्य से पिछड़ जाते हैं। कोई कार्य कितना ही अच्छा क्यों न हो, चाहे कितने ही लोग उसकी प्रशंसा क्यों न करें, कोई न कोई तो उसकी आलोचना करेगा ही। इसलिए लोग क्या कहेंगे से डरने वाले व्यक्ति जीवन में कभी सफल नहीं हो सकते।

क्या इस दुनिया रूपी नागिन पर काबू पाने का कोई उपाय नही?

इसी के समाधान हेतु एक घटना उल्लेखनीय है। एक सँपेरन साँप को नचा रही थी। किसी ने पूछा "क्या तुमको साँप से डर नहीं लगता?" सँपेरन ने क्रोध में आकर कहा - "साँप मुझसे डरता है, मैं उससे नहीं।"

अतः देखा गया है कि जो लोग दुनिया से नहीं डरते, दुनिया उनके काबू में रहती है। सारी दुनिया उनके पीछे चलती है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के विपरीत कृष्ण का उदाहरण लें जिन्होंने कालिदमल के सिर पर नाच नाच कर उसको यमुना से भगा दिया। जो चोर भी कहलाए, रणछोड़ भी कहलाए, भँवरे भी कहलाए, गीताज्ञान के प्रवर्तक भी माने गए, तो 16,108 रानियों को अपनाये भी। असुर द्वारा अपवित्र जिन अबलाओं को कोई भी अपनाने के लिए तैयार नहीं हुआ उन्हें अपनी पटरानी बनाया। उन्होंने लोगों की परवाह नहीं की। इसीलिए सदा हँसते रहे, सबको हँसाते रहे। जीवन में सफल हुए।

कुछ सफल महापुरुषों का उदाहरण लें -- समाज सुधार को निकले स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वतंत्रता संग्राम में कूद अछूतोद्धार को निकले महात्मा गांधी, हिंदु संगठन के लिए निकले डॉ. हेडगेवार, .... आदि सभी को लोगों की हजारों आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। पर उन्होंने किसी की परवाह नहीं की, आगे बढ़ते रहे, इसलिए लक्ष्य में सफल हुए।

दूसरी और अमिताभ बच्चन को देखें। लोग क्या कहेंगे - इसकी परवाह न कर उन्होंने हर तरह का अभिनय किया। जोकर बन 'जिसकी बीवी मोटी ...' गाना गाया, तो वह गाना बच्चे-बच्चे की जुबान पर आ गया। सिने अभिनेता जैसी पोषाक पहनते हैं वह फैशन बन जाती है। लोग खुशी खुशी उसे अपना लेते हैं। एक फिल्म का गाना भी उल्लेखनीय है -- "खुल्लम-खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों, इस दुनिया से नहीं डरेंगे हम दोनों।" वह गाना भी बच्चों की जुबान पर आ गया। अतः दुनिया से न डरनेवाले लोगों के पीछे दुनिया चलने लगती है। उसके इशारों पर नाचती है।

इसका मतलब यह नहीं है कि हम भी लोकलाज छोड़कर ऐसे अनोखेपन हेतु छिछोरे कार्य करें। और दुनिया रूपी नागिन को अपना अनुकरण करने व अपने गाने की धुन पर नचाने का प्रयास करें। हमें लोकाचार का पालन करना भी आवश्यक होता है। कार्यालय की मर्यादा का भी ख्याल रखना चाहिए। ऐसी कोई बात न करनी चाहिए जिससे कि हम उपहास के पात्र बनें। लेकिन यदि हमारा लक्ष्य सही है हम अपनी राह पर सही हैं तो हमें लोगों की आलोचना का ख्याल नहीं करना चाहिए। तभी हम जीवन में सफल हो सकेंगे और धुन के पक्के बन अपने मार्ग पर चलते रहे तो एक दिन लोग हमारे पीछे चलने लगेंगे।

भगवान की भूल...

एक विचारपति एक बार एक बरगद के पेड़ के नीचे लेटे हुए विचार कर रहे थे। उन्होंने सोचा-"सचमुच, भगवान बड़ा अन्यायी है। उसने कितनी बड़ी भूल की है। इतने विशाल बरगद के पेड़ को इतने नन्हें-नन्हें फल दिए, और उस बेचारी कुम्हड़े की बेल, जो अपने पाँव पर खड़ी भी नहीं हो पाती, उसको इतने बड़े फल दिए हैं। भगवान की यह बड़ी भूल है। उन्हें इसके लिए कड़ा दंड दिया जाना चाहिए।" भगवान को कैसे दंड दें? सोचा-- उनकी मूर्ति को उलटा लटकाकर कोड़ों से पिटाई की जाए?

इसी बीच बरगद का एक फल टूट कर विचारपति महोदय की नाक पर पड़ा। चौंक पड़े। फिर सोचा -- "अरे! यदि बरगद पर कुम्हड़े जैसे बड़े फल लगे होते तो आज मेरी नाक का क्या हाल होता? नाक तो नाक पूरा चेहरा ही पिचक गया होता। और मैं अभी सीधा भगवान के पास पहुँच गया होता।" उन्होंने तुरंत स्वीकार किया कि वास्तव में भगवान जो करता है, वह सदा ठीक ही करता है। उसका न्याय-तंत्र बिल्कुल उत्तम है।

क्या पाप है, क्या पुण्य है? क्या न्याय है, क्या अन्याय है? क्या धर्म है, क्या अधर्म? इन प्रश्नों पर विचार करते-करते हमारी बुद्धि दर्द करने लगती है। एक विषय पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार करने से स्पष्ट होता है कि पाप और पुण्य, सही और गलत, धर्म और अधर्म का निर्णय देश, काल और पात्र के अनुसार अलग-अलग होता है। कुछ बातों का उदारहण लें --

अधिकांश सभ्य लोग चावल को उबालने के बाद माँड़ फेंक देते हैं और भात खाते हैं। कुछ आदिवासी माँड पी लेते हैं और भात फेंक देते हैं। शहरी लोग उन्हें मूर्ख समझते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो चावल के अधिकांश विटामिन-खाद्यसार माँड में ही रह जाते हैं।

हिन्दू गाय को माता समान मानकर उसकी पूजा करना ही धर्म मानते हैं तो मुसलमान और ईसाई गोमांस खाना अपना उचित समझते हैं। जीवन के हर क्षेत्र में मानव का हित करनेवाली गाय को माँ के समान पूजा करना धार्मिक भावना ही नहीं कृतज्ञता की भी अभिव्यक्ति है। दूसरी ओर इसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मुसलमान और ईसाइयों के लिए गोमांस सर्वोत्तम और शुद्ध मांस है, अन्य किसी पशु का मांस इतना शुद्ध नहीं होता। क्योंकि गाय कोई शुद्ध शाकाहारी होती है, कोई अभक्ष्य आहार नहीं करती।

पाप-पुण्य का निर्णय कभी कभी अत्यंत दुष्कर कार्य हो जाता है। जिसे हम पुण्य या धर्म-कार्य समझते हैं, वही वास्तव में पाप बन जाता है। एक उदाहरण प्रस्तुत हैं :

एक सेठ जी ने एक बार एक गाय दान में दी। पुण्य कमाना चाहा। लेकिन कुछ ही दिनों बाद उनका संपूर्ण कारोबार खत्म हो गया। कंगाल बन गए। उन्होंने बड़े-बड़े ज्योतिषियों, पंडितों से इसका कारण पूछा। एक ने ध्यान कर बताया -- 'यह आपके गोदान का फल है।' सेठ जी हैरान! कहा -- 'पर महाराज! गोदान तो परम पुण्य कार्य है।' ज्ञानी व्यक्ति ने कहा कि -- 'आपने जिस ब्राह्मण को गाय दान की थी, वह अपनी गाय को पाल नहीं सका, उसने वह गाय कसाई को बेच दी। जिसने उसे मार डाला। यह कुपात्र को दान देने के पाप का फल है।'

सेठ जी ने कहा -- 'परंतु महाराज! इसमें मेरा क्या कसूर? मुझे क्या मालूम था कि वह ऐसा करेगा।' ज्ञानी ने उत्तर दिया -- 'आप जान बूझकर जहर खायें या गलती से आपके भोजन में जहर मिला हो, शरीर पर दोनों का समान प्रभाव ही पड़ेगा।'

जाने-अनजाने हमसे अनेक गलतियाँ होतीं हैं। अतः हमें दूसरों की भूलें न निकाल कर अपना आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। परंतु अन्याय को होते देख चुप रहना भी एक प्रकार की गलती है। महात्मा गाँधी ने कहा था कि अन्याय को सहना अन्याय करने से भी बड़ा अपराध है।