16-Jun-2009

बढ़ती वैश्विक गर्मी - जलते जंगल

बढ़ती वैश्विक गर्मी - जलते जंगल
Global Warming - Burning Forests

विश्व का तापमान (global warming) निरन्तर बढ़ता जा रहा है। इसके खतरों से आगाह करते हुए अनेक सचेतनता लाने के कार्यक्रम, सेमिनार, प्रचार आदि किए जा रहे हैं।

वैश्विक तापवृद्धि के अनेक कारणों में से एक प्रमुख कारण है, जंगलों में आग। विशेषकर पतझड़ की ऋतु, अप्रेल-मई के महीने में जंगलों में आग लगी दिखाई देती है। कहते हैं कि गर्मी के कारण हवा से डालियों के परस्पर रगड़ने से चिन्गारी पैदा होकर आग लग जाती है। यह तथ्य काफी हद झूठ और जंगल कर्मचारियों द्वारा प्रचारित बहाना है।

सच तो यह है कि लोग, विशेषकर जंगल के कर्मचारी ही जान-बूझकर जंगल में आग लगा देते हैं। पतझड़ की ऋतु में पेड़ों के पुराने पत्ते झड़ कर पेड़ों के नीचे भारी परिमाण में बिछे रहते हैं। बसन्त ऋतु में नए पत्तों के आगमन के पूर्व वन-कर्मी तथा आसपास के लोग जानबूझ कर इन सूखे पत्तों में आग लगा देते हैं। ताकि परिश्रम नहीं करना पड़े और जंगल साफ हो जाए।

एक फॉरेस्ट रेंजर से इसका कारण पूछा गया -- तो वे बड़ी हेकड़ी के साथ डींग हाँकते हुए कहने लगे -- "अजी साहब! इन पत्तों में लगी आग से पेड़ों का कोई नुकसान नहीं होगा। बस नीचे का कूड़ा-करकट जलकर साफ हो जाएगा। साँप-बिच्छू आदि जहरीले जानवर भी मर-खप जाएँगे। पूरा जंगल साफ हो जाएगा। पेड़ों में लगी दीमक भी खतम हो जाएगी। बस! एक बर्षा होने दीजिए, फिर देखिएगा, असंख्य नई नईं कोंपलें निकलेगी और पूरा जंगल पहले से ज्यादा हरा-भरा हो जाएगा।"

हमने देखा जंगल में पेड़ों के नीचे सूखे पत्तों के ढेर में लगी आग से पूरा जंगल धू-धू कर जल रहा था। ऊपर अनेक हरी-भरी डालियाँ भी झुलस कर मुरझाने लग गईं थी।

यह कैसा सरल उपाय है? जंगल से कूड़ा करकट साफ करने का? अगले पूरे दो महीनों तक पूरा जंगल काली राख से भरा झुलसी हुई डालियों को लिए भूमण्डलीय ताप (global warming) को बढ़ाता रहेगा। कब बर्षात् होगी? कब नईं कोंपलें निकलेंगी?

जबकि जंगल के अपशिष्ट, (Forest waste, Agro waste) सूखे पत्तों, टहनियों, घास-फूस आदि से अनेक तरह के व्यावसायिक उपयोग होते हैं। इनसे प्लाईवुड, पार्टिकल बोर्डस्, कृत्रिम लकड़ी बनती है, बहुमूल्य कम्पोस्ट खाद बनाई जा सकती है। आज अनेक उद्योग जंगली और वनस्पतीय अपशिष्ट, कूड़े को कम्प्रेस करके एक प्रकार के उपले जैसे केक बनाते हैं, जिनको जलाकर बड़े-बड़े कारखानों के पॉवर प्लांट चलते हैं। उनमें कोयला, तेल आदि मूल्यवान ईंधनों की जरूरत नहीं होती, भारी बचत होती है।

सिर्फ जरा-से परिश्रम करने से बचने के लिए इस प्रकार अरबों रुपये के बहुमूल्य वन-अपशिष्ट की ऊर्जा को यों बेकार जलाकर नष्ट कर देना कहाँ की बुद्धिमानी है? जब पूछा जाता है तो वन-कर्मी बहाना बना देते हैं कि साहब आग तो अपने आप लग गई थी। कोई बदमाश सिगरेट पीकर यों ही फेंक गया होगा। तेज धूप के विकिरण से आग लग गई होगी।

कुछ देर बाद देखा कि रेंजर महोदय अपने गन्दे, कुरूप से पैरों को खुजला रहे थे। उन्हें भयंकर खुजली हो रही थी, देखा पैरों में एक्जिमा हो रखा है। हमने पूछा- "क्या कोई इलाज करवाते हैं?" उन्होंने कहा-- "अजी साहब! सारी दवाएँ ले लीं, एलोपैथिक, होमियोपैथिक, आयुर्वेदिक... ठीक ही नहीं हो रहा।"

हमने उनसे कहा-- "एक अत्यन्त सरल उपाय है, रोग एक दम ठीक हो जाएगा। आपके भी एकदम सुन्दर हो जाएँगे, बिल्कुल फिल्मी हीरोईन के पैरों की तरह।"

उन्होंने पूछा-- "तो फिर जल्दी बताइए ना।"

हमने बताया-- "जी! बस अपने पैरों पर जरा-सा पेट्रोल लगा कर माचिस की एक तीली जलाकर दिखा दें। सारा इन्फेक्शन, वायरस, कीटाणु, ऊपर की गन्दी चमड़ी जल कर एकदम साफ हो जाएगी। घबराइए नहीं, पैरों का कोई नुकसान नहीं होगा। बस, एक बर्षात् होने दीजिए, नीचे से इतनी नर्म नर्म, सुन्दर, गुलाबी चमड़ी निकल आएगी। आपके पैर एकदम स्वस्थ और सुन्दर हो जाएँगे।"

उनका चेहरा देखने लायक था, कोई जबाब नहीं दे पा रहे थे।

6 comments:

Science Bloggers Association said...

बहुत चिन्‍ताजन हालात हैं।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

नरेश सिह राठौङ said...

आपकी चिंता जायज है । आपने बहुत सही जवाब दिया है । अगर हम हरियाली के प्रती अभी भी जागरूक नही हुये तो परीणाम बहुत ही भयानक होने वाले है ।

अविनाश वाचस्पति said...

निकम्‍मापन बन जाएगा कमीनापन
समझ न पाया क्‍यों यह मानवमन
आपने भी खूब सुझाया तू जला ले
स्‍वच्‍छ चिकना हो जाएगा तेरा तन

ग्‍लोबल वार्मिंग से अधिक है बना खतरा
झूठ की ढपली जैसे रागों से बना कचरा

इन तथ्‍यों का करना होगा व्‍यापक प्रचार
तभी पा सकेंगे इनसे छुटकारा और भेजना
होगा जेल, जंगल में ऑटोमैटिक आग के लिए
जिम्‍मेदारी तय की जाए और सजा दी जाए तो
इसका हल हो सकता है।

अविनाश वाचस्पति said...

निकम्‍मापन बन जाएगा कमीनापन
समझ न पाया क्‍यों यह मानवमन
आपने भी खूब सुझाया तू जला ले
स्‍वच्‍छ चिकना हो जाएगा तेरा तन

ग्‍लोबल वार्मिंग से अधिक है बना खतरा
झूठ की ढपली जैसे रागों से बना कचरा

इन तथ्‍यों का करना होगा व्‍यापक प्रचार
तभी पा सकेंगे इनसे छुटकारा और भेजना
होगा जेल, जंगल में ऑटोमैटिक आग के लिए
जिम्‍मेदारी तय की जाए और सजा दी जाए तो
इसका हल हो सकता है।

अनुनाद सिंह said...

हरिराम जी,

बहुत ही नीच काम करते हैं ये वन-अधिकारी। इसी को कहते हैं रक्षक ही भक्षक हो जाना।

क्या इसी 'शॉर्टकट' के लिये इतने योग्य लोग लिये जाते हैं?

ललित said...

जंगलों में आग लगाने का कार्य वन प्रबन्धन की एक उपचार पद्धति के अन्तर्गत मान्य है। इस पद्धति को तत्काल आधार पर प्रतिबन्धित करके जंगलों में आग लगाने वालों को मृत्युदण्ड जैसी कठोर सजा देने की घोषणा की जानी चाहिए।