17 Oct 2007

हिन्दुस्तान में हिब्रू, जापानी, फ्रेंच… है, पर हिन्दी नहीं

India has Hebrew, CJK, French… But not Hindi
हिन्दुस्तान में हिब्रू, जापानी, फ्रेंच… है, पर हिन्दी नहीं


हाल ही में मुझे वाराणसी तथा गोरखपुर के एक सप्ताह के दौरे पर जाना पडा, जो हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ज्ञान-केन्द्र माने जाते हैं। वहाँ अपनी ईमेल देखने तथा ब्राउजिंग के लिए कई इण्टरनेट कैफे के चक्कर लगाने पड़े। देखा कि उन कैफे के कम्प्यूटरों में हिन्दी संस्थापित ही नहीं है, जबकि हिब्रू, फ्रेंच, जर्मन, चीनी, जापानी सहित अनेक विदेशी भाषाएँ इनस्टॉल की हुई हैं। हिन्दी में ई-मेल देखने तथा भेजने की सुविधा किसी भी इण्टरनेट कैफे के कम्प्यूटरों में नहीं मिल पाई।

जब मैंने कैफे के मालिकों से हिन्दी की सुविधा के बारे में कहा तो कुछ ने आश्चर्य व्यक्त किया-- "क्या हिन्दी में भी ई-मेल हो सकती है?"

दूसरे ने जबाब दिया—"वाराणसी तो प्रसिद्ध सांस्कृतिक तथा पर्यटन-केन्द्र है। हमारे कैफे में तो अधिकांश विदेशी लोग आते हैं इण्टरनेट ब्राऊसिंग करने। उनकी मांग पर उनकी भाषाओं की सुविधा इन्स्टॉल की गई है। कई वर्षों से हम कैफे चला रहे हैं। किसी ने हिन्दी की सुविधा की मांग की नहीं की। आप ही पहले व्यक्ति हैं, जो हिन्दी में ईमेल की बात कह रहे हैं।"

एक कैफे में जहाँ विण्डोज एक्सपी वाला कम्प्यूटर लगा था। उसके मालिक से मैंने कहा कि मैं आपके कम्प्यूटर में युनिकोड हिन्दी की सुविधा को सक्रिय कर दूँगा, तो उन्होंने स्पष्ट इन्कार कर दिया—“ना बाबा ना, हम ऐसा नहीं करने देंगे। हिन्दी तो कोई भी नहीं माँगता। हमारा कम्प्यूटर खराब हो जाएगा, वायरस घुस जाएँगे। मेमोरी कोर्युप्ट हो जाएगी।"

गोरखपुर में एक कैफे में हिन्दी के नाम पर "आगरा" तथा "अंकुर" नामक 8बिट फोंट मात्र ही मिला। गीताप्रेस, गोरखपुर जो विश्वप्रसिद्ध धार्मिक पुस्तक प्रकाशन संस्थान है। भक्ति-साहित्य को प्रकाशित कर सस्ते से सस्ते मूल्य पर उपलब्ध कराने की स्तुत्य सेवा अनेक वर्षों से करता आ रहा है। वहाँ भी युनिकोड हिन्दी(देवनागरी) के नाम से कोई परिचित तक नहीं मिला।

जब हिन्दीभाषी केन्द्रों के रूप में जाने-माने नगरों का यह हाल है, तो भारतवर्ष के शेष स्थानों का क्या हाल होगा? हिन्दीतर भाषी प्रदेशों में क्या हाल होगा?

हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटिंग की माँग ही नहीं होती। यदि लाखों में कोई एक माँग करता भी है तो कहीँ उपलब्ध नहीं होती। यदि कोई व्यक्ति उन कम्प्यूटरों में हिन्दी की सुविधा निःशुल्क सक्रिय करके देना चाहता है तो भी कोई ऐसा करने ही नहीँ देता।

तमिलनाडु के कई इण्टरनेट कैफे में तमिल-युनिकोड की सुविधा पाई जाती है। कर्णाटक, बैंगलोर के भी कुछेक इण्टरनेट कैफे के कम्प्यूटरों में कन्नड़-युनिकोड इन्सटॉल पाए जाते हैं। बंगाल (यथा-कोलकाता) के कुछे इक्के-दुक्के इण्टरनेट कैफे के कम्प्यूटरों में बँगला-युनिकोड सुविधा इन्सटॉल पाई जाती है। किन्तु ओड़िशा, पंजाब, गुजरात, आन्ध्र तथा अन्य प्रान्तों के अधिकांश इण्टरनेट कैफे के कम्प्यूटरों में वहाँ की प्रान्तीय भाषाओं तथा हिन्दी का नामोनिशान तक नहीं मिलता। आम जनता तो यही समझती है कि कम्प्यूटर केवल अंग्रेजी में ही चलते हैं।

क्या केन्द्र या राज्य सरकारों के स्तर पर ऐसा कोई हुक्म नहीं जारी किया जा सकता कि भारत में प्रयोग हेतु आपूर्ति किए गए सभी कम्प्यूटरों के आपरेटिंग सीस्टम्स में हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की सुविधा डिफॉल्ट रूप में स्वतः संस्थापित मिले?

16 Oct 2007

देवनागरी “श” का रहस्य

Secrets of Devanaagarii Sh
देवनागरी “श” का रहस्य


गूगल हिन्दी चिट्ठाकार चर्चा समूह में देवनागरी लिपि के "श" वर्ण तथा इससे बननेवाले संयुक्ताक्षरों के विविध रूपों के बारे में प्रश्नोत्तर एवं चर्चा चल रही हैं। चूँकि गूगल चर्चा समूह में सचित्र सोदाहरण उत्तर देना सम्भव नहीं हैं, अतः यहाँ समस्या का समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है।

"देवनागरी लिपि का क्रम-विकास" शोध से स्पष्ट होता है कि तालू में जीभ के टकराने के उत्पन्न उष्म ध्वनि अर्थात् तालव्य "श" का लिखित रूप प्राचीन शिलालेखों, ताड़पत्र की पोथियों, भोजपत्र में लिखित पाण्डुलिपियों में निम्नवत् उपलब्ध होता है। कालक्रम में जल्दी लिख पाने के प्रयास में विभिन्न महानुभावों की हस्तलिपि में इसका रूप निम्नवत् स्वतः परिवर्तित होता रहा--

चूँकि देवनागरी के संयुक्ताक्षरों को लिखने के लिए आरम्भ में ऊपर से नीचे का क्रम अपनाया जाता था। अर्थात् एक व्यञ्जन के नीचे दूसरा व्यञ्जन लिखकर संयुक्ताक्षर बनाया जाता था, इसलिए लिखने में रेखांकन क्रम की सुविधा के लिए चित्र का 11वाँ क्रम संख्या वाला स्वरूप उपयुक्त पाया गया।

लेकिन कई संयुक्ताक्षरों को लिखने के लिए बायें से दायें का क्रम अधिक सुविधाजनक होने के कारण श के अधिकांश संयुक्ताक्षर "श” की खड़ी पाई को हटाकर या आधा अक्षर बनाकर प्रयोग करना अधिक सरल महसूस किया गया। यथा-

श्क श्ख श्क श्घ श्ङ
श्च श्छ श्ज श्झ श्ञ
श्ट श्ठ श्ड श्ढ श्ण
श्त श्थ श्द श्ध श्न
श्प श्फ श्ब श्भ श्म
श्य श्र श्ल श्ळ श्व
श्श श्ष श्स श्ह

उपर्युक्त संयुक्ताक्षर विण्डोज के मंगल फोंट में डिफॉल्ट रूप से प्रकट होते हैं। इनमें से अधिकांश बायें से दायें के क्रम में श की खड़ी पाई को हटाकर बनाए गए हैं। किन्तु श्च श्न श्र श्ल और श्व ऊपर से नीचे के क्रम में बनाए गए हैं।

अक्षरों की स्पष्टता तथा सौन्दर्य विधान को दृष्टि में रखते हुए ऊपर से नीचे के क्रम के ये संयुक्ताक्षर आम जनता के सामान्य प्रयोग में बने रहे।

चूँकि हिन्दी मैनुअल टाइपराइटर में 48 कुञ्जियों के अन्दर हिन्दी भाषा के अक्षरों को येन-केन प्रकारेण सीमित करना पडा था। और फिर मैनुअल टाइपराइटर में ऊपर से नीचे के क्रम में संयुक्ताक्षर टाइप करना अत्यन्त दुष्कर कार्य होता इसलिए बायें से दायें क्रम को ही प्राथमिकता दी गई।

“श्च” को “श्‍च” रूप में टाइप किया जाने लगा।
“श्न” को “श्‍न” रूप में टाइप किया जाने लगा।
“श्ल” को “श्‍ल” रूप में टाइप किया जाने लगा।
“श्व” को "श्‍व” रूप में टाइप किया जाने लगा।

किन्तु “श्र” को "श्‍र” रूप में टाइप करना सरल होने के बावजूद प्रचलन में यह नहीं आ पाया, क्योंकि इससे पाठकों को उलझन होती। लोग इसे “रर” अर्थात दो “र” पढ़ लेते।

यदि “श” के नीचे "र-कार” की तिर्यक रेखा लगाकर “श्र” बनाया जाता (देखें चित्र में क्रम सं.8) तो र-कार आधे "श्" को काटकर पीछे निकलता। लोगों को पढ़ने में और ज्यादा उलझन होती।

और फिर भारतीय संस्कृति में संस्कृत का शुभ सूचक (शुभंकर) "श्री" तो हर व्यक्ति तथा देवी-देवता के नाम के पहले जुड़ता है, अतः उसको इसी रूप में रखने का निर्णय लिया गया। एक अतरिक्त एवं स्वतंत्र "श्र" अक्षर का निर्माण करके टाइपराइटर में इसे टाइप करने की व्यवस्था की गई।

तदनुसार ट्रेडल छापेखाने में शीशे के बने टाइप्स का निर्माण किया गया। लेटर प्रेस में कई संयुक्ताक्षरों के टाइप्स अलग से बनाए गए। प्राचीन संस्कृत पाठ को उसी रूप में छापने के लिए "श" के ऊपर से नीचे क्रम में बने संयुक्ताक्षरों के टाइप्स अलग से बनाए गए।

कम्प्यूटरों द्वारा हिन्दी में छपाई की तकनीकी के आविर्भाव के बाद दोनों रूपों में संयुक्ताक्षरों को प्रकट करने की सुविधा देने का प्रयास किया गया। 8बिट अमानकीकृत फोंट्स में येन-केन प्रकारेण अक्षरों के टुकड़ों को जोड़-जाड़ कर हिन्दी पाठ को प्रकट किया जाता है। इसी कारण वहाँ पाठ (text) की वर्णक्रमानुसार छँटाई (alphabetical sorting) तथा खोज (search) करना सम्भव नहीं हुआ, न ही इसकी कोई जरूरत होती थी।

युनिकोड-देवनागरी के प्रचलन के बाद पाठ का भण्डारण तथा कम्प्यूटर के आन्तरिक संसाधन के लिए सिर्फ युनिकोड कोड-नम्बरों की जरूरत होती है। पारम्परिक रूप में देवनागरी पाठ के प्रदर्शन(Display) तथा मुद्रण(printing) के लिए ओपेन टाइप फोंट्स का सहारा लिया जाता है। माइक्रोसॉफ्ट के डिफॉल्ट हिन्दी फोंट में श्च, श्न, श्र, श्ल तथा श्व रूप को डिफॉल्ट रूप में दर्शाने करने का प्रावधान अन्तःनिर्मित है। विशेषकर संस्कृत के पण्डित इसी रूप में प्रयोग करने प्राथमिकता देते हैं।

लेकिन कुछ हिन्दीभाषी लोग मैनुअल टाइपराइटर के अनुक्रम में श्‍च, श्‍न, श्‍ल और श्‍व के रूप में संयुक्ताक्षरों को Display और Print करना चाहते हैं।

अतः निम्न दोनों प्रकार के "श+” के संयुक्ताक्षर प्रयोग में हैं, जो परस्पर के वैकल्पिक रूप ही हैं। कोई अलग अक्षर नहीं।


वैकल्पिक रूप में अक्षरों को प्रकट करने के लिए युनिकोड में दो विशेष कोड की व्यवस्था की गई है।

ZWJ = Zero Width Joiner (U200D)

हलन्त के बाद इसका प्रयोग करके दो व्यञ्जन-वर्णों को सामान्यतया ऊपर-से-नीचे-क्रम (Top to down sequence) मिलकर संयुक्ताक्षर बनाने के बदले बायें-से-दायें-क्रम (Left to right sequence) में मिलकर संयुक्ताक्षर बनाने के लिए किया जाता है। इसे टाइप करने के लिए विण्डोज के Inscript कीबोर्ड-लेआऊट में टाइप करने के लिए Contol+Shift+1 कुञ्जियाँ एक साथ दबानी पड़ती है। उदारहण के लिए “श्व” लिखने के लिए जहाँ श+हलन्त+व तीन कुञ्जियाँ दबानी पड़ती है, वहीँ “श्‍व” वैकल्पिक रूप में लिखने के लिए श+हलन्त+ZWJ+व ये चार कुञ्जियाँ दबानी पड़ती है। “क्ष” को “क्‍ष” के वैकल्पिक रूप में टाइप करना है तो क+हलन्त+ ZWJ+ष ये चार कुञ्जियाँ दबानी होंगी।

ZWNJ = Zero Width Non-Joiner (U200C)

हलन्त के बाद इसका प्रयोग करके दो व्यञ्जन-वर्णों को सामान्यतया संयुक्ताक्षर बनने से रोकने या “नहीं जुड़ने" के लिए अर्थात् मूल रूप में प्रकट करने लिए किया जाता है। इसे विण्डोज के Inscript कीबोर्ड-लेआऊट में टाइप करने के लिए Contol+Shift+2 कुञ्जियाँ एक साथ दबानी पड़ती है। उदारहण के लिए “श्व” को “श्‌व” के वैकल्पिक रूप में टाइप करना है तो श+हलन्त+ZWNJ+व ये चार कुञ्जियाँ दबानी पड़ती है। “क्ष” को “क्‌ष” के वैकल्पिक रूप में टाइप करना है तो क+हलन्त+ ZWNJ+ष ये चार कुञ्जियाँ दबानी होंगी।


बरहा IME में ZWJ को टाइप करने के लिए ^ (SHIFT+6) का तथा ZWNJ के लिए ^^ (दो बार SHIFT+6) का प्रयोग करना पड़ता है।

अन्य हिन्दी IME में इसके लिए अन्य व्यवस्था होगी। यदि ZWJ (U200D) और ZWNJ (U200C) को टाइप करने के लिए उस IME में कोई व्यवस्था नहीं हो तो इसके लिए उनके निर्माता से सम्पर्क करें।

प्रश्न : मंगल फोंट में “शृंगार” शब्द में “शृ” ऐसे डिफॉल्ट रूप में क्यों प्रकट होता है। इसे वैकल्पिक पुराने रूप में कैसे प्रकट किया जाए?

उत्तर : माइक्रोसॉफ्ट के मंगल ओपेन टाइप फोंट में "शृ" के वैकल्पिक रूप वाला वर्णखण्ड (glyph) नहीं है। इसलिए यह इसी रूप में प्रकट होता है। आशा है इसके अगले वर्सन में माइक्रोसॉफ्ट जोड़े। सीडैक के CDAC-GISTSurekh फोंट में भी "शृ” ऐसा ही प्रकट होता है। जबकि उसी सीडैक के CDAC-GISTYogesh फोंट में "शृ” वैकल्पिक रूप में (देखें चित्र-2 में क्रम सं.16) प्रकट होता है।

चूँकि मंगल फोंट में डिफॉल्ट रूप में श्च, श्न, श्र, श्ल, श्व पुराने रूप में प्रकट होते हैं। अतः "शृ" को भी पुराने रूप में ही डिफॉल्ट रूप से प्रकट होना चाहिए। जबकि इसे पुराने रूप में प्रकट करने के लिए कोई वर्णखण्ड की व्यवस्था ही नहीं है।

कई लोग गलती से श्र और श्न को एक समझ लेते हैं। विशेषकर छोटे अक्षरों में दोनों एक जैसे दिखते हैं। लेकिन श्र = श+हलन्त+र होता है। जबकि श्न = श+हलन्त+न होता है।

कई लोग "शृंगार" शब्द में "शृ" को “श्रृ” के रूप में गलती से लिख देते हैं। जबकि “शृ” = श+ृ (ऋ की मात्रा) होता है। “श्रृ” = श+हलन्त+र+ृ (ऋ की मात्रा) होता है, जो कि पूर्णतया गलत है।

“श” का वैकल्पिक रूप चित्र-2 में क्रम सं.3 में दर्शाया गया है। ध्यान से देखें इसमें “र-कार” नहीं लगा है।

कुछ लोग "श” के वैकल्पिक रूप को गलती से आधा "श” मान बैठते हैं जबकि आधा “श्‍” तो “श” के वैकल्पिक रूप की खड़ी पाई को हटा देने से बनेगा। जो निम्नवत् रूप में होगा।

वैकल्पिक रूपों के कारण उपजनेवाली समस्याएँ :

देवनागरी वर्णों या संयुक्ताक्षरों के वैकल्पिक रूप में प्रकट होने के कारण कम्प्यूटिंग में अनेक तकनीकी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। विशेषकर Sorting और Searching में कई समस्याएँ आती हैं। उदाहरण के लिए मान लीजिए किसी शब्दकोश में एक स्थान पर “श्वेता” यों लिखा गया है दूसरे स्थान पर “श्‍वेता” यों लिखा गया है। तो alphabetical order में sorting करने पर दोनों अलग अलग स्थान पर प्रकट होंगे। उदारहण के लिए Google.co.in में इण्टरनेट में "श्वेताम्बर" शब्द से खोज की जाए तो केवल उन्हीं पृष्ठों की सूची प्रकट होगी जिन्होंने "श्व” के लिए "श+हलन्त+व” का प्रयोग किया है।

यदि Google.co.in में इण्टरनेट में "श्‍वेताम्बर" शब्द से खोज की जाए तो केवल उन्हीं पृष्ठों की सूची प्रकट होगी जिन्होंने "श्‍व” के लिए "श+हलन्त+ZWJ+व” का प्रयोग किया है। वे समस्त पृष्ठ गायब रहेंगे जिन्होंने “श्वेताम्बर” के रूप में प्रयोग किया है।

कई Search-engine ZWJ और ZWNJ कुञ्जियों को ignore करके दोनों रूपों में भण्डारित शब्दों वाले वेबपृष्ठों को संसूचित भी करते हैं।

लेकिन यह एक और समस्या बन जाती है कि वैकल्पिक रूपों को Sorting में एक स्थान पर कैसे रखा जाए? क्या ZWJ और ZWNJ कुञ्जियों को Sort-engine द्वारा ignore किया जाए? या इनके लिए कोई अलग अलगोरिद्म बनाया जाए?

अतः आवश्यकता है देवनागरी लिपि के ऐसे वैकल्पिक स्वरूपों वाले वर्णों का एक सर्वमान्य स्वरूप मानकीकृत किया जाए। इसमें विशेषकर कम्प्यूटर और इण्टरनेट तकनीकी की दृष्टि से सरल रूप को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। और सभी को उसे अन्तर्राष्ट्रीय एकरूपता के लिए सहर्ष अपनाना चाहिए।

20 Sept 2007

रामसेतु तोड़ने सम्बन्धी पर्यावरणीय दृष्टि2

कोलकाता से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र 'सन्मार्ग' दिनांक 19 सितम्बर,2007 के पृष्ठ-3 पर रामेश्वरम् से श्रीलंका तक के रामसेतु के तोड़ने से उपजनेवाले पर्यावरण सम्बन्धी नुकसान और कुछ और प्रकाश डाला गया है।

ओड़िशा के केन्द्रापड़ा में विश्व प्रसिद्ध "ओलिव रिडले" प्रजाति के कछुए समुद्री मार्ग से आते हैं तथा यहाँ विहार करते हैं। इन कछुओं के बचाव में लगे वैज्ञानिकों के अनुसार इन बड़े आकार के दुर्लभ कछुओं को "सेतुसमुद्रम्" परियोजना के निर्माण से खतरा है। उनके अनुसार इस समुद्री चैनल के निर्माण के बाद ओलिव रिडले कछुए प्रजनन के लिए ओड़िशा के समुद्री तटों पर नहीं आ पाएँगे क्योंकि "पोल्क स्ट्रीट" मार्ग में जहाजों के आवागमन होगा एवं ये कछुए "गहिरमाथा" एवं प्रान्त के अन्य तटों पर नहीं आ पाएँगे। यह जानकारी बेंगळूरु में पर्यावरण के लिए कार्य करनेवाली संस्था "एंट्री" की वैज्ञानिक आरती श्रीधर ने दी है। चार वैज्ञानिकों सहित इस इलाके का मुआयना करने आयीं श्रीधर ने यह जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि सेतुसमुद्रम् केनाल प्रोजेक्ट 167 किलोमीटर लम्बा है एवं इसके इलाके में विशेष मछलियों, कछुओं, सीपों सहित अनेक दुर्लभ समुद्री जीवों की विलुप्तप्राय हो चुकी प्रजातियाँ रहती हैं। इस प्रोजेक्ट के निर्माण से इन सभी प्रजातियों का नाश हो जाएगा।

इसी कारण उन्होंने मांग की है कि इस प्रोजेक्ट के निर्माण कार्य के पहले केन्द्र सरकार को पूरे इलाके के जीवों के बारे में एवं इस परियोजना से जीवों पर पड़नेवाले प्रभाव की समीक्षा करानी चाहिए।

राज्य वन्यजीव संस्था के सचिव विश्वजीत महान्ति ने भी कहा है कि इन कछुओं पर ट्रांसमीटर लगाकर किए गए परीक्षणों से पता चला है कि ये पोल्क स्ट्रीट के रास्ते से ही ओड़िशा में प्रवेश कर यहाँ के तटों पर प्रजनन करते हैं।

उल्लेखनीय है कि ओड़िशा के समुद्री तटों पर अक्सर बड़े कछुए भी आते हैं। कई कछुओं का आकार तो 9 फीट लम्बाई, 7 फीट चौड़ाई और 5 फीट ऊँचाई तक का भी होता है। जिन्हें रेल-पार्सल द्वारा कोलकाता तथा अन्य महानगरों में भेजते वक्त रेलवे स्टेशनों पर भी देखा गया है।

इस परियोजना से समुद्र में व्यापक प्रदूषण के कारण तटवर्ती वनस्पतियों को भी भारी हानि होने तथा तटवर्ती इलाकों का क्षरण होने की भी आशंका व्यक्त की गई है।

इस सम्बन्धी पिछले लेख की कड़ी रामसेतु तोड़ने सम्बन्धी पर्यावरणीय दृष्टि

18 Sept 2007

रामसेतु तोड़ने सम्बन्धी पर्यावरणीय दृष्टि

हिन्दी चिट्ठाकार गूगल समूह की इस परिचर्चा में रामसेतु को तोड़ने के बारे में कई विचार व्यक्त किए गए हैं। अखबारों में इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क-वितर्क दिए जा रहे हैं। कई लोग इसे राजनीतिक खेल कहते हैं तो कई अन्य इसे धार्मिक और पौराणिक आस्था का प्रतीक मानकर इसकी रक्षा की दुहाई दे रहे हैं।

रामेश्वरम् के धनुषकोड़ि से लेकर श्रीलंका के मुन्नार टापू तक रामसेतु को तोड़ने के मामले को धार्मिक आस्थाओं और राजनैतिक वितर्कों से परे हटाकर शुद्ध वैज्ञानिक तथा तकनीकी दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार ये पत्थर मूँगा (Coral) की चट्टानों के टुक़ड़े हैं। इस क्षेत्र के समुद्र तल में मूँगे की पर्वताकार चट्टानें बहुतायत से पाई जाती हैं। कुछ अन्य वैज्ञानिकों के अनुसार ये विशेष प्रकार के चूना-पत्थर (Lime Stone) हैं।

आज भी वहाँ समुद्र किनारे पर ऐसे पत्थर मिलते हैं जो पानी के ऊपर तैरते हैं। हमारे कुछ मित्र भी एक ऐसा ही 12"x10"x9" के आकार का पत्थर का टुकड़ा वहाँ से उठाकर लाये थे जिसे एक स्थानीय मन्दिर में एक पानी के एक कुण्ड में सुरक्षित रखा गया है। यह पत्थर पानी पर तैरता रहता है। सैंकड़ों लोग, बच्चे से लेकर बूढ़े तक प्रतिदिन आते हैं उस पत्थर को अपने हाथों से पकड़कर पानी में डुबाते हैं और उनके छोड़ते ही वह पत्थर फिर से पानी के ऊपर आ जाता है और तैरने लगता है।

इस पुल के अस्तित्व को व्यावहारिक दृष्टि के अधिक संपुष्टि इस तथ्य से मिलती है कि आज भी सड़क या रेलमार्ग से रामेश्वरम् जाने के लिए 'रामनाथपुरम् मण्डपम्' से लेकर रामेश्वरम् के द्वीप तक समुद्र के ऊपर एक पुल बना हुआ है, जिसके ऊपर से होकर ही मोटरगाड़ियों तथा रेलगाड़ी को गुजरना पड़ता है। इस पुल ऊपर से बस या कार में बैठे बैठे नीचे के छछले समुद्री जल का, रंगारंग मूँगे की चट्टानों का जो सुरम्य दृष्य दिखाई देता है वह चित्ताकर्षक होता है और पर्यटकों तथा श्रद्धालुओं के मन पर अमिट छाप छोड़ जाता है।

इस बारे में रामायण में वर्णन है कि जब रावण सीता का अपहरण करके लंका ले गया था तो भगवान राम सुग्रीव, हनुमान तथा वानर सेना के सहयोग के लंका जाने के लिए प्रस्थान करते हैं किन्तु बीच में समुद्र पड़ता है। जिसे पार करने का उपाय बताते हेतु समुद्र देवता स्वयं प्रकट होकर सागर पर पुल बनाने की सलाह देते हुए कहते हैं कि नल-नील नामक के दो वानर-शिल्पी हैं, जिनके स्पर्श करने पर पत्थर भी पानी पर तैरने लगते हैं। उनके द्वारा सागर पर पुल बनवाइए--

"नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिँ जलधि प्रताप तुम्हारे।।
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।"

ऐसे पानी के ऊपर तिरनेवाले हल्के पत्थर अपने आप में एक आश्चर्य हैं और विज्ञान तथा तकनीकी को चुनौती देते हैं। यदि ऐसे पत्थरों की खान कहीँ आसपास हो, या कृत्रिम रूप से ऐसे पत्थर बनाए जा सकें तो रामेश्वरम् से लंका तक समुद्र पर यह पुल दुबारा बनाया जा सकता है। भले ही पौराणिक कथा कुछ भी हो या न हो, गूगल अर्थ के उपग्रह चित्र में पानी के नीचे डूबा हुआ पुल जैसा कई किलोमीटर लम्बा पहाड़ जैसा उभार स्पष्ट दिखाई देता है।



फिलहाल यह समस्या है वर्तमान ब़ड़े जहाजों को दक्षिणी हिन्दुस्तान के बन्दरगाहों पर आने के लिए पूरे श्रीलंका का चक्कर लगाकर आना पड़ता है। "सेतुसमुद्रम्" परियोजना के अन्तर्गत यहाँ से एक शार्ट-कट समुद्री मार्ग को प्रशस्त करने हेतु समुद्र के नीचे इस पुल जैसे उभार को तोड़कर समुद्र को गहरा बनाने की सलाह दी है कुछ अन्तर्राष्ट्रीय इंजीनियरों ने, ताकि समुद्री मार्ग कुछ किलोमीटर कम हो सके। लेकिन इससे पड़नेवाले पर्यावरणीय खतरों के बारे में भी विचार विमर्श कर लेना चाहिए।

भूस्थैतिकी दृष्टि से यह पुल(Bridge) लंका के टापू (Island) को स्थिर रखने में मदद कर रहा है। अरब सागर और हिन्द महासागर के बीच एक मजबूत बाँध का कार्य कर रहा है। इसके टूट जाने से भारत तथा श्रीलंका के तटवर्ती क्षेत्र में व्यापक हलचल और पर्यावरणीय खतरे पैदा हो सकते हैं। भूस्खलन, भूकम्प तथा सुनामी जैसी विपदाओं के आ़ने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता।

दूसरी ओर प्रगति के लिए यह भी जरूरी है कि अच्छे शार्टकट समुद्री मार्गों, तीव्र गति वाले सड़क मार्गों का निर्माण तथा विकास हो। उदाहरण के लिए अगर स्वेज नहर का निर्माण उस काल में नहीं किया गया होता तो शायद विश्व का समुद्री यातायात भी इतना सुगम नहीं होता। लेकिन स्वेज नहर धरातल की मिट्टी को खोद खोद कर बनाई गई थी। विस्फोटकों से ब्लास्ट करके नहीं। बीच की पूरी खुदाई खत्म होने के बाद ही अन्त में समुद्र से जुड़नेवाले धरातल को खोद कर समुद्र के जल को प्लावित किया गया था इसमें।

किन्तु आज ऐसे कार्य मानवीय श्रम से धीरे धीरे किए जा सकते हैं क्या? और फिर समुद्र के नीचे? यदि किए भी जाएँ तो कितने गोताखोर श्रमिक कितने समय तक पानी के नीचे रहकर पत्थरों को धीरे धीरे खोद पाएँगे? ऐसा कोई खुदाई करनेवाला पनडुब्बीनुमा डोजर भी तो नहीं चलेगा वहाँ। आज सामान्य छोटे नदी- बाँधों में जमी रेत तथा मिट्टी के टापुओं तक तो ड्रेजरों के सहारे खोद-खाद कर हटाया नहीं जा पा रहा है, फिर ऐसे सागर-तलीय परियोजनाओं की परिकल्पना कैसे कर ली जाती है?

सागर तल में खुदाई के साथ साथ तत्काल निर्माण, स्तम्भों की कंक्रीटिंग आदि भी जरूरी होगी। टूटे हुए पत्थरों के टुकड़ों तथा रेत आदि को वहाँ से हटाकर सुरक्षित रूप से कहाँ स्थानान्तरित करना होगा, वह भी इस प्रकार से कि अवांछित से रूप सागर जल में लहरों की चपेट में इधर उधर फैल न जाएँ? इस कार्य में कितने वर्ष लगेंगे? कितना खर्च आएगा? आज के सुविधाखोर या आरामखोर अभियन्तागण तो सिर्फ विस्फोटकों से उड़ाने का सरल तरीका ही अपनाएँगे, जो अत्यन्त खतरनाक होगा।

इस पुल को किसी विशाल आरी जैसे उपकरणों से काट काट कर तो अलग नहीं किया जा सकेगा। न ही मानवीय श्रम द्वारा धीरे धीरे टुकड़े टुकड़े करके खोदा या काटा जाएगा। सिर्फ डायनामाइट आदि विस्फोटकों के माध्यम से ही ब्लास्ट करके विध्वंश करके ही तोड़ा जाएगा। ऐसी हालत में न ही काटे गए या उखाड़े गए पत्थरों को या पहाड के टुकड़ों को बिखरने, गिरने या फैलने से रोका जा सकेगा। न ही इससे समुद्र के जल में पैदा होनेवाले विशाल व भयंकर भँवर या महाज्वार को बाँधा या रोका जा सकेगा। इस आशंका से इन्कार भी नहीं किया जा सकता कि इस प्राकृतिक बाँध या प्राचीनकालीन पौराणिक वानर सेना द्वारा निर्मित इस पुल जैसी चट्टानों को ब्लास्ट करके उड़ाने से पर्यावरण को कितना भयंकर नुकसान होगा। प्रकृति से इस प्रकार छेड़छाड़ करना वास्तव में "विनाश काले विपरीत बुद्धि" ही कही जाएगी।

और फिर इस तोड़ फोड़ तथा समुद्री मार्ग पर बड़े जहाजों की आवाजाही से मूँगे की चट्टानों से लेकर मत्स्यों एवं जल-जीवों की भारी हानि तो होगी ही। समुद्र जल में घुलनेवाले जहरीले एवं दूषित पदार्थों से इस तट का समुद्र जल नहाने लायक भी न रहेगा।

सरकार के सम्बन्धित प्राधिकारियों को इस प्रकार विदेशी दबाव में आकर या अन्तर्राष्ट्रीय अभियन्ताओं की बुद्धि को ही सर्वोपरि मान्यता देकर उतावली में प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कदापि नहीं करनी चाहिए।

प्रकति, पर्यावरण, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों को रोकने के लिए जहाँ सारा विश्व अपनी चिन्ता जता रहा है। इस पृथ्वी को बचाने का भरसक प्रयास कर रहा है। जहाँ अनेक विकसित राष्ट्र पर्यावरण तथा शान्ति की दुहाई देकर परमाणु समझौते कर रहे हैं, वहाँ सागर के नीचे के धरती को इस प्रकार विध्वंश करके कौन-सी बुद्धिमत्ता, कौन-सी विनिर्माणता, कौन-सी रचनात्मकता का परिचय देगे? कई बुद्धिजीवि आशंका व्यक्त करते हैं शायद यह सुझाव भारत और श्रीलंका दोनों को नुकसान पहुँचाने के उद्दश्य से किन्हीं आतंकियों ने दिया हो?

अतः विश्व के बुद्धिजीवियों को पर्यावरणीय दृष्टि से एक बार फिर से इस बारे में विचार करना चाहिए।

इसके साथ-साथ सामरिक सुरक्षा सम्बन्धी खतरों पर भी विचार आवश्यक है। इस शार्टकट समुद्री मार्ग से केवल व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही ही नहीं होगी। भले ही अन्तर्राष्ट्रीय युद्धपोतों को भारत की समुद्री सीमा से न गुजरने दिया जाए, लेकिन मिसाइलों से लैस पनडुब्बियों तथा गुप्तचर पनडुब्बियों को छुपकर निकलने से रोकने में तो चूक होने की आशंका रहेगी ही। जो भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए भयंकर खतरा हो सकता है।

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आगे भाई आशुतोष ने टिप्पणी में बिल्कुल वाजिब प्रश्न किया है कि "तैरनेवाले पत्थरों से बना यह पुल डूब कैसे गया?" इस प्रश्न का उत्तर निम्नवत् है--

यह पुल पानी में पूरा डूबकर सागर तल में नहीं चला गया है, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग आदि के कारण कालक्रम में समुद्र का जल स्तर के बढ़कर ऊपर उठने के कारण पानी के कई फीट नीचे चला गया है। इसके आसपास कई किलोमीटर की धरती में भी सागर जल फैल गया है। यहाँ के आसपास के क्षेत्र में सागर का पानी काफी छिछला दिखाई देता है। कहीं कहीं तो काफी दूर तक सिर्फ तीन-चार फुट सागर जल ही मिलता है।

उदाहरण के लिए गत एक सप्ताह पहले जगन्नाथ पुरी के समुद्र किनारे कई फर्लांग तक फैली विशाल रेत का मैदान तथा इसके किनारे की मेराइन ड्राईव सड़क तक समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण बह गई है। समुद्र किनारे निर्मित बड़े बड़े होटलों, ईमारतों तक समुद्र की लहरें आने लगी हैं। बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन के खतरे उत्पन्न हो रहे हैं। बर्फ पिघलने के कारण धीरे धीरे हिमालय की ऊँचाई कम होती जा रही है तथा सागर का जलस्तर बढ़ता जा रहा है। अतः शास्त्र-पुराणों में वर्णित क्रमशः 'प्रलय' होने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता।

कई ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक शोध इस पुल को लेकर किया जा चुके हैं। कई गोताखोर इसका परीक्षण करके आ चुके हैं।

कुछ विद्वानों तथा शोधकर्ताओं के अनुसार--

इसका पुल का फैलाव तो प्राकृतिक पठार या पहाड़ जैसा ही लगता है। किन्तु दो पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए जो खाँचेनुमा बन्धन (Auto-locking design) दिखाई देते है, उन्हें देखकर अनुमान लगाना पड़ता है कि यह मानव निर्मित ही होंगे, जो विशेष अभियान्त्रिकी कला-कौशल का अद्भुत नमूना है। इस पुल के पुरातात्विक अवशेषों नीचे गहराई तकं फिर अनन्त सागर जल दिखाई देता है।

परीक्षण के लिए यदि ऐसे तैरनेवाले पत्थर को पकड़ कर पानी के अन्दर जब तक डुबोये रखते हैं, तब तक वह पत्थर डूबा रहता है। उसे छोड़ते ही वह पानी से हल्का होने के कारण ऊपर आ जाता है और तिरने लगता है। अतः परस्पर पत्थर जुड़े तथा बन्धे होने के कारण यह पानी के नीचे अदृश्य है। ऐसे तैरनेवाले पत्थर छिद्रोंवाले तथा कुछ भुरभुरे रेशेदार एजबेस्टेस्टस पत्थर की प्रजाति के होते हैं। कुछ पत्थरों को जबरन पानी के अन्दर डुबोने पर हवा के बुदबुदे बाहर आते हैं, जिससे लगता है कि इन पत्थरों के छिद्रों में वायु फँसी होने के कारण ये पानी के आयतन से अधिक स्थान घेरने के कारण हल्के होकर पानी पर तिरते हैं।

यदि इस पुल के पत्थरों के खाँचेनुमा बन्धनों को तोड़ा जाए या अलग किया जाए तो वे तैरने वाले पत्थर ऊपर आकर तिरने लग सकते हैं। कई लोगों को द्वारा इस पत्थर के सैम्पल लेने के ऐसे प्रयास किए जा चुके हैं। पुल के सिरों के नीचे विशाल पर्वतनुमा स्तम्भाकार आधार जैसी चट्टानें होने का भी आभास मिला हैं। इस पर किसी धार्मिक भावना से नहीं, बल्कि शुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार किया जाना अपेक्षित है।

रामायण तथा महाभारत आदि सन्त-महात्माओं, ऋषि-मुनियों द्वारा रचित प्रेरक और पूज्यनीय महाकाव्य हैं, इन्हें अच्छा साहित्य माना जाना चाहिए, किन्तु ठोस तथ्यपूर्ण इतिहास नहीं। हमें किसी राजनैतिक दल द्वारा प्रचारित धार्मिक भावनाओं, आस्थाओं पर कोई टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।

1 Sept 2007

देवनागरी संयुक्ताक्षर "ज्ञ" का रहस्य

देवनागरी संयुक्ताक्षर "ज्ञ" का रहस्य
Secret of Devanaagarii Conjunct "jna"


हिन्दी चिट्ठाकार गूगल समूह में इस परिचर्चा कड़ी में "ज्ञ" के शुद्ध रूप तथा उच्चारण के बारे में कई प्रश्नोत्तर चल रहे हैं।

कुछ लोग इसका उच्चारण "ग्य" जैसा करते हैं, कुछ लोग "ग्यँ" उच्चारण करते हैं, कुछ "द्‍न्य" जैसा, कोई "ग्न" जैसा तो कोई "ज्न्य" जैसा उच्चारण करते हैं। भारत के विभिन्न स्थानों पर इस देवनागरी संयुक्ताक्षर का लोग विविध प्रकार से उपयोग करते हैं।

विविध विद्वानों ने अपने विचार निम्नवत् व्यक्त किए हैं--

विज्ञान शब्द को

-- कुछ उत्तर भारतीय 'विग्यान' (vigyan) पढ़ते है।
-- कुछ दक्षिण भारतीय 'विज्नान' (vijnaan) पढ़ते हैं।
-- कुछ अन्य लोग 'विज्यान' (vijyan) पढ़ते हैं।
-- गूगल के ट्रांस्लिट्रेशन सेवा में "vigyaan" टाइप करने पर "विज्ञान" प्रकट होता है।
-- कुछ अन्य IME में "vijyaan* टाइप करने पर भी "विज्ञान" प्रकट होता है
-- महाराष्ट्र में कुछ मराठी लोग "विज्ञान" को "vidnyan" बोलते हैं। जैसे "ज्ञानेश" को "dnyanesh".
-- कुछ मराठी "विग्न्यान" (vignyaan) उच्चारित करते हैं।
-- गुजरात में "विग्नान" (vignan) उच्चारित होता है।

अधिकांश लोग यज्ञ को "यग्यँ" उच्चारित करते हैं।

"ज्ञ" का असली उच्चारण खो गया है। आज लोगों को तलाश है इसके मूल व शुद्ध रूप की। सभी हिन्दी, संस्कृत, नेपाली, राजस्थानी, मराठी विद्वानों तथा देवनागरी लिपि के विभिन्न भाषी उपयोगकर्ताओं की जानकारी के लिए यहाँ "ज्ञ" संयुक्ताक्षर की व्युत्पत्ति के बारे में कुछ प्रकाश डाला जा रहा है।

जैसे क्ष= क्+ष्+अ को मिल कर बना है, परन्तु कुछ लोग उसे "छ" या ख" या "ख्य" जैसा उच्चारित करते हैं। अछर, अख्यर, लछमी आदि।

उसी तरह "ज्ञ"= ज्+ञ्+अ अर्थात ज+्+ञ (091C+094D+091E) मिल कर बना है। इसका शुद्ध रूप "ज्‍ञ" होता है।
"विज्ञान" शब्द का शुद्ध रूप "विज्‍ञान" है जिसे रोमन(Extended Latin with diacirtic marks) में "vijñān" लिखा जाता है।

लेकिन Basic Latin में "vijnaan" लिखकर काम चलाया जा सकता है, जो निकटतम शुद्ध रूप होगा। कुछ वैदिक संस्कृत पण्डित ही "ज्ञ" का शुद्ध उच्चारण (ज्+ञ) कर पाते हैं।

भारत में संविधान की 8वीं अनुसूची में घोषित 22 अधिकारिक (official) भाषाएँ हैं तथा भारत में सैंकड़ों बोलियाँ हैं। हर 20 कोस में भाषा बदल जाती है, हर 4 कोस में पानी। भौगोलिक, सांस्कृतिक कारणों से उच्चारण बदल जाता है तदनुसार लिपि/लेखन क्रम भी। परन्तु भाषा में आए "विकार" को भी विकास माना गया है।

"ज्ञ" की व्युत्पत्ति के बारे में "देवनागरी लिपि का क्रमविकास" नामक शोध में स्पष्ट उल्लेख है।

प्राचीन संस्कृत-आधारित वर्ण-परम्परा के अनुसार देवनागरी तथा अन्य भारतीय लिपियों में संयुक्ताक्षर ऊपर से नीचे के क्रम में संयुक्त करके लिखे जाते थे। किन्तु आधुनिक युग में जब देवनागरी तथा अन्य भारतीय लिपियों के टंकण यन्त्रों का आविष्कार हुआ, तो भारतीय लिपियों के वर्णों को अंग्रेजी के 52 अक्षरों की सीमित कुञ्जियों के ऊपर ही येन-केन-प्रकारेण काट-छाँट कर पैबन्द की तरह चिपका कर समयोजित करना पड़ा। टंकण यंत्रों की सुविधा के लिए देवनागरी लिपि में बायें से दायें क्रम में व्यंजन की खड़ी पाई को हटाकर संयुक्ताक्षर निर्माण का सरल उपाय अपनाया गया।

किन्तु कालक्रम में "ज्ञ" का सही उच्चारण गुप्त हो गया। तथा देवनागरी टाइपराइटर में सीमित कुञ्जियों के कारण "ञ" अक्षर को नहीं रखा जा सका था। इसलिए इसे ज्‍ और ञ को जोड़कर टाइप करने के शुद्ध रूप के वजाय एक स्वतन्त्र संयुक्ताक्षर के रूप में लगाया गया।

ज+ञ = ज्ञ की व्युपत्ति कैसे हुई, इसे स्पष्ट करने के लिए नीचे के चित्र में लिखते वक्त रेखाओं(strokes) के क्रम को दर्शाया गया है। (1) ज के नीचे ञ लिखकर, (2) कलम की नोंक को उठाए बिना जल्द लिखते वक्त इसकी रेखाएँ जुड़ीं (3) अन्तिम रेखा खड़ी पाई से न मिलकर नीचे लटकी रह गई, (4) और संक्षिप्त रूप इस प्रकार बन गया (5) फिर संयु्क्ताक्षर का यह रूप बना, (6) एक व्यक्ति की लिखावट में ऐसा रूप प्रकट हुआ, (7) अन्य व्यक्ति की लिखावट में ऐसा रूप प्रकट होता है, (8) माईक्रोसॉफ्ट के मंगल फोंट में यह रूप प्रकट होता है। (9) भारत सरकार के CDAC-GISTSurekhN.TTF फोंट में ऐसा रूप प्रकट होता है।




इसी प्रकार देवनागरी लिपि का क्रमविकास हुआ। जल्द लिखने के उद्देश्य से धीरे धीरे संयुक्ताक्षर अपने आप बनते चले गए। कालक्रम में उनका असली उच्चारण तथा मूल रूप लोप हो गया। यह बिगड़ते बिगड़ते आज इण्टरनेट तथा युनिकोड के युग में जटिल लिपियों (Complex Scripts) के समूहों में शामिल होने को मजबूर हो गई है। जबकि आरम्भ में यह रोमन व लेटिन लिपि से भी सरल, सपाट और एकमुखी थी।

देवनागरी लिपि के अन्य वर्णों तथा संयुक्ताक्षरों के रहस्यों पर इस आलेख-शृङ्खला के अगले अंकों में प्रकाश डाला जाएगा।