11 Jun 2007

सूरज पर दाग - बढ़ती गर्मी का कारण

सूरज पर दाग - बढ़ती गर्मी का कारण

चाँद पर दाग हैं, सभी इसे देख लेते हैं। चाँद पर दाग विषय पर अनेक कवियों की कलम चल चुकी है। दाग तो सूर्य पर भी होते हैं। चाँद के दाग तो सभी देख लेते हैं, किन्तु सूरज के दाग कौन देखे? जो सूरज के दाग देखने जाएगा, उसकी आँखें फूट सकती है उसके प्रखर व अनन्त प्रकाश से। शायद इसीलिए कहा गया है कि "बड़ों की गलतियाँ नहीं देखी जाती।"

आजतक दूरदर्शन चैनल पर एक समाचार में बताया गया कि अब वैज्ञानिकों ने आधुनिक वेधशालाओं में देखने पर पाया है कि आजकल सूरज पर दो बड़े काले धब्बे दिखाई दे रहे हैं। चेतावनी भी दी गई है कोई इन धब्बों के लिए सूरज की ओर झाँकने का भी प्रयास नहीं करे। सूरज की ओर नंगी आखों से कदापि नहीं देखना चाहिए। उगते हुए बाल-सूर्य को भले की कुछ मिनट नंगी आँखों से देखा जा सकता है। किन्तु जब सूरज की लालिमा कम होने लगे तो और सूरज की ओर निहारना नहीं चाहिए।

वैज्ञानिकगण आजकल सूरज पर दिखाई दे रहे इन काले धब्बों को पृथ्वी की गर्मी बढ़ने (ग्लोबल वार्मिंग) का कारण भी मान रहे हैं। आँकड़ों के आधार पर वे बताते हैं कि जिस वर्ष सूरज पर कोई धब्बा नहीं दिखाई दिया, उस वर्ष बहुत कड़ाके की ठण्ड पड़ी थी। सूरज पर निरन्तर होते रहनेवाले परमाणुओं के विखण्डन तथा संलयन की प्रक्रिया के कारण अनन्त ऊर्जा उत्पन्न होती है और ये काले धब्बे उसके ईँधन भण्डार भो हो सकते हैं या कोई बड़े गड्ढे भी हो सकते हैं। सूर्य से जो प्रकाश धरती पर पहुँचता है, उसे पृथ्वी के चारो ओर स्थित ओजोन आयाम छानकर धरती तक पहुँचाता है। हानिकारक तत्व छिटक कर पृथ्वी के दोनों ध्रुवों की ओर विसर्जित हो जाते हैं।

जिस प्रकार सूर्यग्रहण के वक्त सूर्य का प्रकाश हानिकारक माना जाता है। उसी प्रकार काले धब्बों के प्रकट होने के दौरान भी सूर्य का प्रकाश हानिकारक माना जाता है। इसे समझाने का सरल तरीका निम्नवत् है:

जैसे- लकड़ी के चूल्हे पर जब रोटी पकाई जाती है तो रोटी को पहले तवे पर आधा सेक कर उतार लिया जाता है, और फिर रोटी को दहकते कोयले/अंगारों पर रखकर उलट-पलट कर सेंका जाता है। वह रोटी स्वादिष्ट और स्वास्थ्यकर होती है। यदि रोटी को लकड़ी जलने पर पैदा होनेवाली आग की लपटों में सेंका जाए तो रोटी कड़ुई(खारी) हो जाती है तथा कुछ जहरीली भी हो सकती है, कुछ काली भी पड़ सकती है। इसी प्रकार सूर्यग्रहण के वक्त सूर्य का मुख्य (अँगारों जैसा) प्रकाश छिप जाता है, बाहरी प्रकाश जो लपटों जैसा होता है, वही हम तक पहुँचता है, जिसमें वैसे ही कुछ जहरीले तत्व पाए जाते हैं। इसलिए सूर्यग्रहण के समय पेट खाली रखने की सलाह दी जाती है।

अतः काले धब्बे दिखाई पड़ने के दौरान सूर्य का प्रकाश कुछ कटु होता है जो आर्द्रता, गर्मी तथा उमस बढ़ाने वाला होता है। इस दौरान कई स्थानों पर भयंकर चक्रवात, ओलावृष्टि तथा अम्लवर्षा होने के भी उदाहरण मौसम विभाग के आँकड़ों में पाए जाते हैं।

यदि ग्लोबल वार्मिंग इन्हीं सौर कारणों से बढ़ रही है तो मानव के वश में क्या है? मानव इसका क्या उपाय कर सकता है?

5 Jun 2007

पर्यावरण दिवस.... कुछ विशेष उपाय...

पर्यावरण संरक्षण हेतु कुछ विशेष उपाय....

आज विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर अखबारों, वेबपृष्ठों में काफी सामग्री प्रकाशित हुई है। अनेकों जनसभाओं में भाषण दिए गए हैं। कुछ संस्थाओं द्वारा पौधे रोप कर रस्म निभा ली गई है। किन्तु वस्तुतः ठोस कदम उठानेवाले बहुत कम ही हैं।

पर्यावरण की हानि, वनों की अन्धाधुन्ध कटाई, प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु-परिवर्तन के दुष्परिणामों से उपजने वाले विनाशकारी संकटों की झलकियाँ महाप्रलय के स्पष्ट संकेत दे रही हैं, फिर भी लोग 'कोमा' में पड़े व्यक्ति की तरह अचेत या निश्चिन्त हैं। धरती पर बढ़ते जा रहे तापमान के कारण कई क्षेत्रों की जलवायु बदलने लगी है। कर्करेखा एवं विषुवत् रेखा के मध्य के क्षेत्रों में गर्मियों की ऋतु में दिन में दोपहर बाद तक भारी गर्मी और चौथे प्रहर तेज आँधी तूफान और उसके बाद भारी वर्षा तथा ओले गिरने की घटनाएँ आए दिन होने लगी हैं। रोजाना आँधी तूफान में अनेकों पेड़ तथा बिजली के खम्भे उखड़ते जाते हैं, घण्टों बिजली गायब रहती है। और फिर अगले दिन और तेज गर्मी पड़ती है। सुलतानपुर के पास एक क्विंटल की बर्फ की सिल्ली 'ओलावृष्टि' में गिरने का भी समाचार अखबारों में छपा है। मुख्यतः गर्मियों के मौसम में ही होनेवाली वर्षा के दौरान ओले गिरते हैं।

मनुष्य को अपना भोजन, रसोई पकाने के लिए लकड़ी, औषधि, वस्त्र, मकान-निर्माण सामग्री आदि सबकुछ वृक्षों से ही मिलता है। अन्त में मरने पर शव को जलाने के लिए भी लगभग 400 किलोग्राम लकड़ी की जरूरत पड़ती है। अतः औसतन एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में 400 टन वनस्पतियों (पेड़-पौधे-लकड़ी) आदि का उपभोग कर डालता है।

किन्तु क्या हरेक व्यक्ति अपने जीवनकाल में 400 पेड़ लगाकर उनके बड़े होने तक पालन-पोषण, सुरक्षा, सिंचाई आदि भी करता है? अतः वनों की हानि होना स्वाभाविक है।

पर्यावरण-संरक्षण हेतु कुछ कठोर कदम उठाए जाने की नितान्त आवश्यकता है।

1. वृक्षारोपण हेतु नियमों में सुधार की जरूरत :

ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए सिर्फ पेड़-पौधे की सकारात्मक भूमिका निभाते हैं, जो सूर्य की किरणों को सोखकर अपना भोजन बनाते हैं। कार्बन-डाई-ऑक्साइड को सोखकर ऑक्सीजन छोड़ते हैं। अतः वनीकरण एवं वृक्षारोपण नियमों में निम्नवत् कुछ कठोर सुधार लाने की नितान्त आवश्यकता है।

-- इतने व्यापक परिमाण में वृक्ष रोपे जाएँ, कहीं भी धरती का कोई भी टुकड़ा खाली दिखाई न दे।

-- कोई भी व्यक्ति कहीं भी खाली पड़ी जमीन में पेड़ लगा सके, ऐसा अधिकार हर व्यक्ति को हो, उसे रोकने का अधिकार किसी को भी न हो।

-- मकान/सड़क/रेलमार्ग/कारखाने आदि के निर्माण के लिए जमीन को खाली करने की जरूरत पड़ने पर पेड़ काटने की अनुमति तभी दी जाए, जबकि पहले उतने नए पेड़ लगा दिए जा चुके हों, जितने पत्ते उस काटेजानेवाले पेड़ में हैं। क्योंकि बडे पेड़ का एक पत्ता जितनी गर्मी सोखता है, नया रोपा गया सम्पूर्ण पौधा भी उतनी गर्मी नहीं सोख पाता।


वृक्षों का प्रतिरोपण

-- जहाँ भी सड़कें आदि चौड़ी/दोहरी करने के लिए, नई सड़कों/रेलमार्गों/भवनों आदि के निर्माण के लिए वहाँ उगे पेड़ को काटने की जरूरत पड़े, वहाँ उस पेड़ को काटने के लिए अनुमति कदापि न दी जाए। बल्कि दूसरे स्थान पर बड़ा गड्ढा खोदा जाए, उस गड्ढे में पर्याप्त खाद डाली जाए, फिर बुलडोजरों के सहारे उस पेड़ को जड़-मिट्टी सहित सावधानी से उखाड़कर वहाँ रोपा जाए, अर्थात् स्थानान्तरित/प्रतिरोपित किया जाए। तथा उस पेड़ से नए पत्ते व डालियाँ निकलने तक नियमित रूप से पर्याप्त जल-सिंचाई व्यवस्था की जाए।

ऐसे कार्य का श्रेष्ठ उदाहरण है यह है कि दिल्ली में 1980 में हुए एशियाई खेलों के लिए खेलगाँव के निर्माण के दौरान भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इन्दिरा गान्धी जी ने बड़े बड़े पेड़ ऐसे ही रातों रात प्रतिरोपण करवा कर हरी-भरी विशाल कॉलोनी का निर्माण करवाकर आदर्श स्थापित किया था।

जो वृक्ष ज्यादा विशाल हों, उनकी कुछ डालियाँ काट कर मुख्य जड़ एवं तने का प्रतिरोपण किया जा सकता है। कुछ दिन की सिंचाई के बाद इनमें नई कोंपलें, डालियाँ निकलकर तेजी से फैलेंगी, जो नए रोपे गए पौधे की तुलना में कई गुना तेजी से फैलेंगी और गर्मी सोखेंगी। नए पौधे को उस उम्र तक पहुँच कर बड़ा होने और पर्याप्त छाया देने, गर्मी सोखने, फलने फूलने में कई वर्ष लग सकते हैं। जबकि प्रतिरोपित वृक्ष एक-दो महीने में ही फिर से हरा-भरा हो सकता है।

अतः जंगलों में भी जहाँ लकड़ी के लिए पेड़ों की कटाई हो, वहाँ उसकी जड़ को कदापि न उखाड़ा जाए, बल्कि जड़ एवं लगभग 4-5 फुट ऊँचे तने को छोड़ दिया जाए, उस पर गोबर, खाद, रसायनों के लेप द्वारा नए डालियों और कोंपलों को उगाया जाए और पर्याप्त सिंचाई द्वारा तेजी से विकास किया जाए।

इस प्रकार लकड़ी की जरूरत के लिए जहाँ आवश्यक हो पेड़ों की कटाई केवल वर्षा ऋतु में की जानी चाहिए, ताकि कटे पेड़ से नए कोंपलें व डालियाँ निकल कर विकसित हो सके।

जंगलों में जिन पेड़ों को काटने के लिए चिह्नित किया जाए, उसकी जड़ से 3-4 फुट ऊपर मुख्य तने में विभिन्न खाद तथा रसायनों का प्रयोग करके पहले नए कोंपलें, डालियाँ उगाई जाए। उन नई उगी कोंपलों व डालियों को सुरक्षित रखते हुए मुख्य तने को कुछ ऊपर के काटा जाना चाहिए।

भगवान जगन्नाथ जी की मूर्तियों के निर्माण के लिए भी जिस नीम के वृक्ष का चयन होता है, कुछ दिन पहले से विधिवत् उसकी पूजा-अर्चना की जाती है, उसके तने से नई कोंपलें उगाईं जाती हैं, उसके बाद ही शुभ मुहूर्त्त में मुख्य तने को ऊपर से काटा जाता है।


-- जहाँ भी दोहरी सड़कें हों, आने व जानेवाली अलग अलग सड़कों के बीच में नारियल, देवदारू जैसे सीधे खड़े होनेवाले कम चौड़े अधिक ऊँचे पेड़ हर 10 फुट की दूरी पर लगाना अनिवार्य किया जाए।

-- चोरी से पेड़ काट ले जानेवालों को कठोर दण्ड दिया जाए। उन्हें सश्रम कारावास की सजा में उनसे बंजर भूमि में पेड़ उगवाने तथा नियमित सिंचाई करने का ही काम लिया जाए।

-- शहरों में पक्के मकानों, कंक्रीट/एज्बेस्टस/टाइल की छत वाले मकानों, बहुमंजिली इमारतों की छतों पर बड़े गमलों में और खिड़कियों, बालकोनियों पर छोटे गमलों में उगाकर लताएँ आच्छादित करना विभिन्न नगरपालिकाओं, नगरनिगमों, आवास-विकास-बोर्ड द्वारा अनिवार्य घोषित किया जाए। बहुमंजिली इमारतों पर लताओं को गमलों में लगाकर खिड़कियों/बालकोनी में रखकर नीचे लटककर स्वतः फैलने दिया जा सकता है, इन्हें ऊपर चढ़ाने के लिए किसी सहारे के लगाने के जरूरत नहीं है। ऐसे गमलों चौकोर (कम ऊँचे अधिक चौड़े) होने चाहिए, ताकि आँधी-तूफान के वक्त लुढ़ककर गिर न जाएँ।


2. अपशिष्ट जल (Swerage) का पुनःउपयोग :


-- शहरों से अपशिष्ट जल (Swerage) के उपचार हेतु अनिवार्य व्यवस्थाएँ की जाए। संयंत्रों द्वारा छाना हुआ/शुद्ध किया हुआ पानी विभिन्न खाली पड़ी जमीनों में वृक्षों की सिंचाई के लिए उपयोग किया जाए। इससे दोहरी समस्या का समाधान होगा। एक ओर मलजल के निपटान में सहयोग मिलेगा, दूसरी ओर व्यापक वनीकरण में सहयोग मिलेगा।

पुरी (जगन्नाथ पुरी, ओड़िशा) नगर के समग्र मल-जल को समुद्र में नहीं छोड़ा जाता, बल्कि एक बड़े तालाब में भण्डारित करके मलजल उपचार संयंत्र से विशोधित किया जाता है। तथा इस पानी को समुद्र किनारे "झाऊँ" वक्षों की 'हरित पट्टी' में सिंचाई में उपयोग किया जाता है। इससे समुद्र तट सुरम्य तथा गर्मीरहित शीतल बना रहता है। भारत के समग्र समुद्रतटों में नहानेयोग्य सबसे अधिक शुद्ध पानी पुरी के समुद्र का ही माना जा चुका है। अन्य समुद्रतटीय नगरों को भी इसका अनुकरण कर सागर को 'नर्क' बनाने से बचाना चाहिए।


शहरों के गन्दे नालों नदियों में छोड़ने पर तत्काल प्रतिबन्ध लगाया जाए। नदी में निष्कासित होनेवाले नालों को तत्काल बन्द करके शहर के बाहर निचली जमीन में तालाब खोदकर उसमें उस गन्दगी को संग्रहीत किया जाए तथा इसके जल को विशोधित कर वृक्षारोपण एवं वनीकरण में उपयोग किया जाए। मल को खाद बनाने हेतु उपयोग किया जाना चाहिए और वनीकरण में इसका उपयोग किया जाना चाहिए।

-- हर राष्ट्र के कुल बजट का 2 प्रतिशत वृक्षारोपण तथा टैंकरों/पाइपलाइन/वाष्पीकरण/कृत्रिम-वर्षा के द्वारा नए वृक्षों में पानी डालकर सिचाई करने की व्यवस्था में खर्च किया जाए।

-- बेकार श्रमिकों/ रोजगार कार्यालयों में बेकार युवाओं को कुछ निर्धारित पारिश्रमिक पर अनिवार्य रूप से वृक्षारोपण के कार्य में लगाया जाए। अधिकाधिक पेड़ लगाने और उनके बड़े होने तक देखभाल करनेवाले युवाओं को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जाए।

-- चाहे सरकारी भूमि हो, या निजी भूमि हो, जो भी भूमि पेड़-पौधों या फसल से रहित दिखाई दे, बंजर जैसी दिखाई दे, उस पर अतरिक्त कर(tax) प्रभार लगाकर कठोरता से वसूल किया जाए। इस प्रकार कर-वसूली से हुई आय में से उन व्यक्तियों को पुरस्कार/पारिश्रमिक दिए जाएँ जो अपनी समग्र जमीन को हरा-भरा रखते हों।


3. कूड़ा-करकट को जलाना प्रतिबन्धित घोषित किया जाए तथा पुनःउपयोग की व्यवस्था की जाए:

शहरों में देखा जाता है कि नगरपालिका के कर्मचारी ही कूड़ा-करकट ढोकर ले जाने हेतु पर्याप्त गाड़ियों आदि की व्यवस्था के अभाव में हो या आलस्यवश हो गलियों में इकट्ठा करके आग लगाकर भाग जाते हैं, जो घण्टों तक सुलगता रहता है, भयंकर धुआँ और दुर्गन्ध फैलाता है। इससे वातावरण में गर्मी बढ़ती है, वायु-प्रदूषण बढ़ता है, बीमारियाँ फैलती हैं। विशेषकर प्लास्टिक के जलने के उपजनेवाला धुआँ जहरीला होता है तथा सैंकड़ों लाइलाज व जानलेवा बीमारियों को फैलाता है।

सिंगापुर, न्यूयार्क, मुम्बई, बेंगलोर आदि कई शहरों में कूड़ा-करकट जलाने पर प्रतिबन्ध लगा हुआ है। अतः संसार के हर स्थान पर कूड़ा-करकट जलाने पर ऐसे ही प्रतिबन्ध अनिवार्य रूप से लगाए जाने चाहिए। संयुक्त राष्ट्र संघ की सम्बन्धित संस्थाओं को कठोर आदेश जारी करने चाहिए।

कूड़ा-करकट का पुनःउपयोग करने के लिए विभिन्न व्यवस्थाओं में खाद बनाने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। क्योंकि कूड़ा-करकट में 80% कचरा वनस्पति-जन्य होता है। कूड़े से निकले प्लास्टिक को तो अनिवार्य रूप से पुनचक्रित कर फिर से काम में लगाना अत्यन्त आवश्यक है। कूड़े में मिली बेकार प्लास्टिक की पतली थैलियों को कोलतार में मिलाकर सड़क निर्माण के काम लगाना एक अच्छा उपाय है।

-- कूड़ा-करकट को पुनःचक्रित (recycle) करने के लिए संस्थाओँ तथा निजी उद्यमियों को आकर्षित करने के लिए सरकारी स्तर पर व्यापक प्रोत्साहन, तकनीकी तथा आर्थिक सहायता देने की नई योजनाओं के प्रवर्तन और इनको लागू करने की नितान्त आवश्यकता है।

-- कूड़ा-करकट को जलाकर बिजली बनाने का काम करना एक घटिया उपाय है। इससे प्रदूषण बढ़ेगा, ग्लोबल वार्मिंग बढ़ेगी। अतः यह अन्तिम उपाय के रूप में ही किया जाना चाहिए। ऐसे कूड़े को पहले सोलर कन्सेन्ट्रेटर द्वारा पर्याप्त सुखाने के बाद में भट्ठियों में बड़े इण्डस्ट्रियल फैन से पर्याप्त हवा पम्प करते हुए जलाना चाहिए ताकि कम से कम धुआँ व कार्बन-डाई-ऑक्साइड निष्कासित हो और अधिकतम ताप उपलब्ध हो तथा बॉयलर पूरी क्षमता से चल सकें।

4. विद्युत पर निर्भरता कम की जाए :

आज संसार के अधिकांश लोग बिजली (Electricity) के गुलाम हो चुके हैं। विशेषकर शहरों में तो लोगों को बिना बिजली के एक मिनट रहना भी दूभर लगता है। प्रकाश(वाल्व, ट्यूबलाइट..) हवा (पंखे, कूल, ए.सी.), पानी (मोटर पम्प के द्वारा), भोजन (हीटर द्वारा), मनोरंजन (दूरदर्शन चैनल के कार्यक्रम), संचार, कम्प्यूटर सब कुछ विद्युत पर ही निर्भर होता है।

बिजली की मांग दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। नदी-बाँधों से पन-बिजली और पवनचक्कियों से सृजित बिजली या सौर ऊर्जा से सृजित विद्युत जनता की मांग को पूरा नहीं कर पाती। इसलिए कोयला जलाकर या गैस या पेट्रोलियम तेल जलाकर बड़े ब़ड़े ताप विद्युत सृजन कारखानों से बिजली सृजित कर वितरित की जाती है, जो प्राकृतिक सम्पदा की भारी खपत साथ साथ पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचाती है।

अक्सर देखा जाता है कि शहरों में लोग टी.वी. के सामने ड्राईंग रुम सीरियल, फिल्म या समाचार देखने ही सारा समय बिता देते हैं। पड़ोसी का नाम तक मालूम करने की कोशिश नहीं। बच्चे भी पढ़ाई भूलकर टी.वी. पर कार्टून आदि देखने में काफी समय बिताते हैं। हाँ, जब कभी विद्युत-प्रवाह कट जाता है, बिजली चली जाती है, तभी लोग घरों से बाहर बालकोनी या गलियों में निकलते हैं, पड़ोसियों से बात करते हैं या छत पर जाकर अड़ोस-पड़ोस में निहारते हैं।

अतः लोगों को बिना बिजली के कुछ दशकों पहले जैसा प्राकृतिक जीवन यापन करने की याद दिलाने तथा वैसा ही अभ्यास बनाए रखने के लिए हर स्थानों पर रोजाना एक घण्टे सुबह (कार्यालय समय के पहले) तथा शाम को (कार्यालय समय के बाद) बिजली कटौती अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। ताकि लोग घरों से बाहर निकलने को मजबूर हों और प्राकृतिक जीवन बिताने का कुछ अभ्यास करें।


5. विश्व पर्यावरण दिवस एक धार्मिक पर्व के रूप में मनाया जाए :

आज भी विश्व की आधी जनसंख्या धार्मिक आस्थावादी है। धर्म के लिए बहुत कुछ न्यौछावर करती है। विभिन्न धर्मों में वृक्षों की पूजा करने का विधान रहा है। हिन्दू धर्म में तो तुलसी, बरगद, पीपल, केले, आम, शमी आदि वृक्षों/पौधों की पूजा की जाती है। कई प्रकार की ग्रह-दशाओं से, संकटों से मुक्ति के लिए बरगद एवं पीपल के पेड़ लगाने तथा रोज सींचने की सलाह ज्योतिषियों/पण्डितों द्वारा दी जाती है।

ऋग्वेद में कहा गया है :

यत ते भूमे विश्‍वनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु।

मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयमर्पिपम।।

इसका अर्थ कुछ यूँ है :

हे धरती माता, जब मैं भोजन, औषधि आदि के लिए वनस्पतियों को काटता हूँ, तुम्हारे तन को खोदता हूँ, तो तुम्हारे घाव जल्दी भरें, अनेक गुना वनस्पतियाँ बढ़ें।


मत्स्य पुराण में कहा गया है:

“पानी के अभाव के स्थान पर जो व्यक्ति एक कुँवा खुदवाता है, वह उतने वर्षों तक स्वर्ग में निवास करता है, जब तक कि उस कुँए में पानी की बूँदें रहें। एक तालाब बनवाने से ऐसे दस कुँए खुदवाने के बराबर फल मिलता है और एक गुणवान पुत्र को जन्म देकर पोषण करने से ऐसे दस तालाब खुदवाने के बराबर फल मिलता है। और दस पुत्रों का पोषण करने के बराबर फल मिलता है एक वृक्ष को लगाकर उसको पालने पर।" और ऐसे दस वृक्षों को लगाने/पालने के बराबर फल मिलता है, एक पीपल का पेड़ लगाने/पालने पर।

क्योंकि पीपल के वृक्ष की महिमा तो स्वयं भगवान ने श्रीमद्भगवद्गीता में की है।

"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्" गीता-15.1

"अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां न नारदः", गीता- 10.26


वैज्ञानिकों ने भी अनेक शोध के बाद पाया है कि एकमात्र पीपल का वृक्ष ही ऐसा पेड़ है जो रात को भी कार्बन-डाई-ऑक्साइड शोखकर ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है। अन्य सभी पेड़ केवल दिन के समय धूप के प्रकाश को संश्लेषित कर कार्बन-डाई-ऑक्साइड अवशोषित कर अपना भोजन बनाने में उपयोग कर पाते हैं।

तुलसीदास जी ने भी कहा है :

उत्तम खेती, मध्यम वाणी। अधम चाकरी, भीख निदानी।।

अर्थात् सबसे उत्तम कार्य कृषि कार्य है, क्योंकि एक बीज बोयें तो अनेक/लाखों/करोड़ों बीज वापस मिल सकते हैं। मध्यम कार्य वाणिज्य या व्यापार है, जो अच्छा लाभ देता है। अधम कार्य नौकरी करना है। सबसे निकृष्ट कार्य है भीख माँगना।

अतः हर व्यक्ति को प्रतिदिन कुछ समय निकालकर कृषि/बागवानी के लिए अवश्य लगाना चाहिए।

अतः धर्मनेताओं, धर्मगुरुओं, शंकराचार्यों, स्वामियों, संन्यासियों आदि को चाहिए कि ऐसी पौराणिक मान्यताओं को फिर से प्रचलित/प्रचारित/प्रसारित करें और "सबसे बड़ा पुण्य" वृक्षारोपण एवं प्रदूषण-नियन्त्रण को बताते हुए कुछ व्याख्यान दें। समस्त पूजा-पाठ, योग, जप, तप, दान से बढ़कर कार्य वृक्षों को लगाने, पालपोस कर बड़ा करने, सींचने से होगा, यही प्राचीन धार्मिक उपदेश फिर से प्रचारित करने में जी-जान से लग जाएँ। वायु प्रदूषण सबसे बड़ा पाप है, इसका व्यापक प्रचार करें और लोगों को पर्यावरण को शुद्ध रखने को प्रेरित करें।

सभी पाठक बन्धुओं से अपील है कि वे इस लेख की जितनी चाहें कापियाँ कर सकते हैं, जिसको चाहें पढ़ने के लिए आमन्त्रित कर सकते हैं। चाहें तो नकल करके अपने नाम भी प्रकाशित कर सकते हैं। वे चाहें तो इसे अन्य भाषाओं में अनुदित कर सकते हैं। यदि वे इसे सरकारों, धार्मिक संस्थाओं, संयुक्त राष्ट्र संघ - पर्यावरण संस्थान, जी-8 सम्मेलन के पदाधिकारियों .... विभिन्न सम्बन्धित संस्थानों को प्रेषित करें, कुछ कार्यवाही करवाएँ तो वे भी परम पुण्य के अधिकारी होंगे।

यह लेख मुक्त स्रोत के अन्तर्गत समर्पित हैं। कोई कॉपीराइट नहीं है। इसकी नकल करने का पूरा अधिकार दिया जाता है। पाठक इसकी सामग्री को अपने ब्लाग में भी डाल सकते हैं। चाहें तो इसकी कड़ी भी दे सकते हैं।

जो पाठक पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियन्त्रण के नए नए व्यावहारिक उपाय टिप्पणी में सुझायेंगे, वे इस परम पुण्यकार्य का विशेष फल पाने के हकदार होंगे।

24 May 2007

तपती गर्मी में बहुमंजिली इमारतों को शीतल रखने का सरल उपाय...


तपती गर्मी में बहुमंजिली इमारतों को शीतल रखने का सरल उपाय...

तपती गर्मी में मकानों को ठण्डा रखने के कुछ उपाय पिछले लेखों में बताए गए थे। कई लोगों ने प्रश्न किया था कि बहुमंजिली इमारतों में, जहाँ लोग फ्लैट्स में रहते हैं। उनके पास बागवानी के लिए पर्याप्त स्थान नहीं होता। सिर्फ बालकोनी में दो-चार गमले रखे जा सकते हैं। वहाँ बाहरी दीवारों को धूप से बचाकर ठण्डा रखने का कोई सरल उपाय नहीं है? पेड़ पौधों के द्वारा गगनचुम्बी इमारतों को ठण्डा कैसे रखा जाए?

इसका यह जबाब सुनकर आश्चर्य होगा कि बहुमंजिली इमारतों पर लताएँ लहराकर शीतल रखना तो और भी ज्यादा सरल और सस्ता है। कैसे?

बहुमंजिली इमारतों को धूप से बचाकर ठण्डा रखने का एक सरल उपाय है कि हर फ्लैट की बालकोनी में दो चार गमले रखें, जिनमें लताओं के पौधे उगाएँ। इन लताओं को ऊपर की ओर चढ़ाने के लिए रस्सी आदि का सहारा लगाने में बेकार परिश्रम और धन खर्च करने की भी कोई जरूरत नहीं है। इन्हें नीचे लटकने दें। ये लताएँ अपने आप नीचे की ओर लटक फैलेंगी और नीचे के फ्लैट्स की दीवारों पर आच्छादित होती चली जाएँगी।

सबसे ऊपर की मंजिल में रहनेवाले यदि कुछ बड़े आकार के गमले में लताओं के पौधे उगाएँ और उपयुक्त खाद पानी देते रहें तो ये लताएँ लटक कर निचली मंजिल तक स्वतः फैल सकती हैं।

बहुमंजिली इमारतों की छत पर मुँडेर के किनारे कुछ बड़े गमले रखे जाएँ। यदि 3 फीट व्यास वाले कंक्रीट की नाँद के गमले हों तो उत्तम है। इनमें लताएँ के पौधे उगा दिए जाएँ और इन्हें मुँडेर पार करके अपने आप नीचे की ओर लटक कर फैलने दिया जाए। इससे लताओँ के झुरमुटों को ऊपर चढ़ाने में कोई परिश्रम और खर्च भी नहीं करना पड़ेगा। लताओँ के पत्ते धूप को सोखकर अपना विकास करने में उपयोग करेंगे और तथा इनके फूल सुगन्ध भी फैलाएँगे और रंग-बिरंगी शोभा भी बढ़ाएँगे। लेकिन आवश्यकता है बहुमंजिली इमारतों के सभी फ्लैट्स में रहनेवालों को मिलकर प्रयास करने की।

ऊपर से नीचे लटकी हुई लताओं के तने पुराने होने पर मजबूत रस्सी जैसे हो जाते हैं। नीचे धरती में लताएँ उगाकर भी इनके सहारे बिना परिश्रम के ऊपर चढ़ाकर आच्छादित किया जा सकता है।

ऐसी लताओं में एक सबसे लोकप्रिय है मनी प्लाण्ट। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है -- यह घर में धन तथा समृद्धि बढ़ानेवाली लता मानी जाती है। अनेक लोग इसे वास्तु अनुकूल मानते हैं। घर में सुख-शान्ति बढ़ानेवाला मानते हैं। तथा पानी की बोतलों में, गमलों में उगाते हैं। कुछ लोग तो ड्राईंग रुम में भी इसे उगाते हैं। इसके लिए कोई विशेष रख-रखाव की जरूरत नहीं पड़ती। सिर्फ पर्याप्त पानी मिले तो यह अपने आप फैलते जाती है।

मनी प्लांट की बेल का एक टुकड़ा तोड़कर एक सिरा सिर्फ पानी में डुबा कर कुछ दिन रखने से स्वतः जड़ें निकल आती है और पौधा विकसित होने लगता है। इसके कोई फूल, फल या बीज नहीं होते। किन्तु ठण्डक फैलाने में यह बहुत प्रभावी होता है।

अन्य लताओं में मालती, मल्ली (चमेली-लता), जास्माइन, श्वेत व नीली अपराजिता, भृंगराज, कन्नैर-लता, राधा-तमाल, बेगुनिया-बेनसर, जूही-जाई... इत्यादि प्रमुख हैं, जिनसे बहुमंजिली इमारतों को अच्छादित किया जा सकता है। ओड़िशा के कुछ स्थानों में "पोई" नामक एक विशेष लता को लोग शौक से उगाते हैं, जिसके पत्तों तथा डण्खल की स्वादिष्ट सब्जी बनती है। इसमें कई विटामिन, खाद्य लवण अधिक मात्रा में होते हैं। कोई कीड़ा काट लेने पर जलन या खुजली आदि होने पर इसके पत्ते को मसलकर रस लगा देने से कुछ ही मिनटों में अद्भुत राहत मिलती है।

इस तरह लताएँ नीचे लटका कर बहुमंजिली इमारतों को शीतल रखना सबसे सरल और पर्यावरण अनुकूल उपाय है।

23 May 2007

तपती गर्मी से मकान बचाएँ और बिजली भी बनाएँ...

तपती गर्मी से मकान को बचाएँ और बिजली भी बनाएँ...

मेरे पिछले लेख तपती गर्मी में भी मकान को रखें ठण्डा
में कुछ उपाय बताये गए थे। यहाँ प्रस्तुत है एक और दोहरे लाभ वाला उपाय।

आज का सभ्य समाज बिजली का गुलाम बन चुका है। बिजली (Electricity) के बिना पानी तक नहीं मिल पाता। क्योंकि बिजली के मोटर-पम्प से ही पानी ऊपर उठाया जाता है। कम्प्यूटर और इण्टरनेट तो बिना विद्युत के बेजान हैं। गर्मियों में बिजली कटौती की समस्या आम बात है। बिजली कटते ही लगता है जैसे धर्मराज के दरबार में पहुँच गए हैं अपने सारे पापों की सजा भुगतने के लिए। हमें गर्म तेल की कड़ाही में डाल कर तला जा रहा है।

मकान की छत पर पड़नेवाली धूप की गर्मी से मकान को बचाने के लिए एक अच्छा उपाय यह भी है कि मकान की छत पर उपयुक्त आकार के फोटोवॉल्टिक सेल वाले सोलर पैनल लगा दें, जो सूर्य के प्रकाश को विद्युत में बदलकर बैटरी को चार्ज करते रहें। बिजली कटौती के वक्त आप इससे घर में बल्ब या पंखे चला सकेंगे।

खर्च बचाने के लिए यदि बैटरी नहीं भी खरीदें, तो कम्प्यूटर का यू.पी.एस. तो चार्ज कर ही सकते हैं, जिससे कम्प्यूटर और इण्टरनेट तो चला ही सकेंगे। और अपने ब्लॉग पर लेख, कहानी, कविता, व्यंग्य आदि लिखकर समय तो बिता ही सकेंगे और साथ ही अपने महत्त्वपूर्ण विचारों से जगत को अवगत करा सकेंगे।

अगर आपकी छत 1000 वर्ग फुट की है और इसके आधे 500 वर्गफुट के सोलर पैनल लगाएँ जाएँ तो शायद आपकी कुल बिजली की आवश्यकता का आधा हिस्सा सूर्य के प्रकाश से ही सृजित किया जा सकता है। प्रति माह बिजली के बिल में तो आधी कटौती हो सकेगी।

है ना दोहरा लाभ। गर्मी से भी मकान रहेगा कुछ ठण्डा और विद्युत की जरूरत भी होगी पूरी। आम के आम, गुठली के भी दाम।

हालांकि अभी सोलर पैनल कुछ महंगे अवश्य हैं। लेकिन गैर-परम्परागत ऊर्जा विभाग द्वारा इनमें लगभग 50% की सबसिडी/अनुदान दिया जाता है। अर्थात् आधे दाम में मिलते हैं। आदित्य सोलर, गायत्री सोलर, टाटा सोलर आदि कई संस्थाओं के सोलर पैनल बाजार में उपबल्ध हैं। लेकिन कई स्थानों पर इनकी खरीदी पर सबसिडी सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में लगाने के लिए ही दी जाती है। लेकिन कई लोग अपने गाँव के पते पर लगाने के लिए खरीद कर शहर के मकान की छत पर स्थापित कर लेते हैं।

सोलर पैनलों की कोई खास रख-रखाव, मरम्मत आदि की भी जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि बैटरी तथा इन्वर्टर सर्किट यूनिट आदि की अवधिवार जाँच करना तथा बदलना पड़ सकता है। सोलर पैनल एक परिष्कृत तथा प्रदूषण रहित ऊर्जा सृजन का माध्यम है। यदि समग्र पृथ्वी पर पड़ने वाली सूर्यकिरणों के दस प्रतिशत का भी उपयोग किया जाए तो समग्र विश्वि की बिजली की आवश्यकता पूरी की जा सकती है। तथा अति विशाल परिमाण में विद्युत सृजन के लिए खपत होनेवाले कोयला, पेट्रोलियम आदि की भारी बचत हो सकती है।

सोलर पैनलों की स्थापना करना सदा लाभजनक ही होता है। हालांकि एकबारगी खर्च कुछ ज्यादा अवश्य लगता है, किन्तु दो वर्ष में इनकी लागत का निवेश व्यय बिजली के बिल में होनेवाली कटौती से लगभग पूरा हो सकता है।

विभिन्न प्रकार के उपलब्ध होनेवाले सोलर पैनलों में आभासी त्रि-आयामी होलोग्राम तकनीकी पर आधारित "इनवर्टेड पिरामिड" आकार के सर्किट-डायग्राम वाले पैनल सर्वाधिक ऊर्जा प्रदान करते हैं तथा सबसे कुशल होते हैं।


22 May 2007

तपती गर्मी में भी मकान को रखें ठण्डा...

तपती गर्मी में भी मकान को कैसे रखें ठण्डा...

धरती की गर्मी बढ़ती जा रही है। ग्लोबल वार्मिंग की कहर से सारा संसार त्रस्त है। विशेषकर शहरों में तो कंक्रीट की छतों वाले पक्के मकान होते हैं, जिनमें रहनेवालों की हालत बहुत बुरी हो जाती है।

मकानों को गर्मियों में ठण्डा रखने के निम्नलिखित उपाय अपनाए जा रहे हैं।

(1) ए. सी. लगाना

धनी लोग मकान के कुछ कमरों में वातानुकूलन (Air Conditioner) लगा कर ठण्डक पा लेते हैं। अधिकांश कार्यालय भवन सेण्ट्रली एयर कण्डीशण्ड होने लगे हैं। बड़ी दुकानें, शो-रूम आदि एयर कण्डीशण्ड होना तो आज की संस्कृति बन गया है। कारें, बसें, रेलगाड़ियाँ में भी ए.सी. लगे होते हैं। अब एयर कण्डीशण्ड हेलमेट भी आ गया है बाजार में। मध्यम वर्ग के हर घर में एयर कूलर तो लगभग आम रूप से पाया जाता है।

बिना एयर कण्डीशनर लगाए अपने मकान को ठण्डा रखने के भी कई उपाय हैं।

(2) छत पर ग्लेज्ड सेरामिक टाइल बिछाना

कंक्रीट की छत को धूप की गर्मी सोखकर गर्म होने से बचाने के लिए एक अच्छा उपाय है कि छत के आँगन में सफेद ग्लेज्ड (चमकदार, चिकनी) सेरामिक टाइलें बिछा दी जाएँ, जिससे धूप परावर्तित हो (reflect) हो जाए, ताप छत से होकर मकान के अन्दर न फैलने पाए। बड़े बड़े कोर्पोरेट घरानों के कार्यालय भवनों पर ऐसा ही किया गया है। हालांकि यह काफी महंगा सौदा है।

(3) छत पर ग्लेज्ड सेरामिक टाइलों के टुकड़ों का आँगन

इससे कुछ सस्ता उपाय है 'सेरामिक टाइल्स' विक्रेताओं के पास से टूटी-फूटी ग्लेज्ड टाइलों के रद्दी टुकड़े इकट्ठे करके ले आएँ। कुछ विक्रेता टूटी-फूटी टाइलें कूड़े में फेंक देते हैं। कुछ विक्रेता ऐसे रद्दी टुकड़े 50 रुपये प्रति बोरी की दर से भी बेचने लगे हैं। इन टुकड़ों को छत पर सफेद सीमेण्ट के गारे पर यथासंभव पास-पास बिछाकर इनके बीच में सफेद सीमेण्ट का गारा भर कर समतल करके जमा दें। इस विधि से लगभग 80 से 90 प्रतिशत तक धूप परावर्तित हो जाएगी। गर्मी घर के अन्दर प्रवेश नहीं करेगी।

(4) छत पर सफेद चमकीले चूने का लेप करना

आजकल की रंग रोगन कम्पनियों द्वारा शीतल चूना (Sun cooling lime) उपलब्ध कराया जा रहा है जो हार्डवेयर दुकानों में मिलता है। यह महीन तथा चमकदार होता है जो सूर्य के प्रकाश को परावर्तित कर देता है। इस श्वेत रंगरोगन के लेप को मकानों की छत तथा बाहरी दीवारों पर लगाया जाता है, जिससे धूप की गर्मी दीवारों को भेदकर मकान के अन्दर फैल नहीं पाती और अन्दर से मकान अपेक्षाकृत ठण्डा रहता है।

किन्तु यह सफेद रंग कुछ दिनों के बाद मैला हो जाता है। विशेषकर छत पर धूल जमा होने तथा वर्षा से धुलने आदि कारणों से छूट जाता है। अतः यह एक अस्थायी उपाय है।

उपरोक्त सभी उपाय़ भले ही मकान के अन्दर ताप को फैलने से रोकते हैं, किन्तु बाहर के वातावरण की गर्मी बढ़ाते ही हैं। ए.सी. यन्त्र गर्म हवा को बाहर फेंकता है तथा इसके निकास से स्वास्थ्य के लिए हानिकारक गैसें भी निकलती है।

अतः तलाश है ऐसे उपायों की जिससे मकान की ठण्डा रहे और वातावरण में भी गर्मी नहीं फैले। बल्कि वातावरण की गर्मी को भी सोखने में मदद करे।

(5) छत पर पुआल बिछाना

गर्मी के दिनों में कुछ लोग अपने मकान की कंक्रीट की छत या टिन या एजबेस्टस की छत पर पुआल बिछा देते हैं, जो गर्मी को सोख लेता है तथा न तो अन्दर फैलता है और न ही बाहर छितराता है।

(6) छत पर मोटे पत्तों वाले पौधों के गमले रखना

सबसे अच्छा उपाय है गर्मी के दिनों में अधिकाधिक संख्या में यथासंभव मोटे पत्तों वाले पौधों के गमले रखकर मकान की छत को अधिकाधिक भर दें। ये पौधे धूप को अधिकाधिक सोख लेंगे तथा न तो छत से होकर मकान के अन्दर गर्मी नहीं फैलेगी न ही बाहर वातावरण में फैलेगी।

(7) मकान की छत और दीवारों लता-गुल्म आच्छादित करना।

इससे भी सस्ता और सरल उपाय है कि कंक्रीट की छत पर कुछ बड़े गमले रखें, जिनमें मोटे पत्तों वाली लताओं के पौधे उगा दें। बाँस, टहनियों, रस्सी की जालियाँ बनाकर इनके ऊपर बेलों को चढ़कर फैलने दें। सुन्दर, सुगन्धित फूलों व पत्तों वाली बेलें आच्छादित होकर न केवल आपके मकान का सौन्दर्य बढ़ाएँगी, बल्कि मकान के साथ साथ वातावरण को ठण्डा रखने में भी भरपूर मदद करेंगी।

एक तल या दो तल्ले वाले मकानों में तो नीचे जमीन में सिर्फ एक फुट भर की जगह में भी बेल उगाई जा सकती हैं, तथा बाँस तथा रस्सी के सहारे इसे छत पर चढ़ाकर फैलाया जा सकता हैं। टिन, एजबेस्टस, खपरैल, टाइल आदि की छतों पर कुछ पुआल डालकर उसपर बेलें लहराई जा सकती हैं। लताएँ दीवारों पर लहराने से दीवारें भी गर्म होने से बचती हैं और फूलों वाली लताएँ हों तो सौन्दर्य भी बढ़ाती हैं।

कुछ लोगों ने तो अपने मकान की छत पर बाँस, टहनियों और रस्सियों की जालियों पर लौकी, तुरई, ककड़ी, सेम, बीन.. आदि सब्जियों की बेलें चढ़ाकर लहरा रखीं हैं, जो न केवल मकान तथा वातावरण को ठण्डा रखती हैं, बल्कि आवश्यक परिमाण में सब्जियाँ की फसल भी प्रदान कर रही हैं। कुछ लोगों ने मूल्यवान औषधीय हर्ब "पीपल" की लताएँ फैला रखीं हैं। ये न केवल बचत करती हैं, बल्कि कुछ लोग इन सब्जियों को बेचकर कुछ कमाई भी कर लेते हैं।

(8) छत पर पुदीना उगाना

जिन कंक्रीट की छतें अनुकूल ढलान के साथ निर्मित हैं, अर्थात् जिन पर पानी अटकता या जमा नहीं होता हो, वे लोग अपने मकान की छत पर सिर्फ रेत बिछा कर उसमें पुदीना उगा सकते हैं। पुदीना गर्मियों की फसल है, गर्मियों में तेजी से फैलता है। पुदीना न केवल मकान तथा वातावरण में ठण्डक फैलाएगा, बल्कि शर्बत, चटनी, औषधि आदि बनाने में भी काम आएगा। पुदीना का पौधा उगाने में कोई विशेष परिश्रम नहीं करना पड़ता। सिर्फ बालू या रेत में इसके पौधे के एक एक डण्खल एक एक इञ्च की दूरी पर रोप दें और रोजाना सुबह शाम पानी से सींचते रहें। इसकी बेलें निकल कर फैलने लगेंगीं। रेत में थोड़ी गोबर की खाद मिलाएँ तो तेजी से बेलें बढ़ेंगी। इससे छत को भी कोई नुकसान नहीं होगा क्यों कि रेत में पानी नहीं जमेगा। साथ ही पुदीने की सुगन्ध से वातावरण महक उठेगा।

जिस मकान की छत पर्याप्त ढालू नहीं हो, वहाँ चौड़े-चौड़े गमलों या मिट्टी की परातों में पुदीना उगाया जा सकता है।

(9) छत पर वास्तु अनूकल शुभ वनस्पतियाँ उगाना।

अनेक लोग अपने मकान की छत पर वास्तु अनुकूल पौधें और बेलें उगाते तथा फैलाते हैं, जिससे मानसिक शान्ति ही नहीं मिलती, बल्कि समृद्धि भी आती है।

रोजाना थोड़ा सा समय निकाल कर अपने घर की छत पर बागवानी में लगाएँ, तो न केवल हमारा शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहेगा, बल्कि आसपास का वातावरण भी शीतल और सुखद होगा।

इस प्रकार मकान को गर्मी से न बचाया जा सकता है, बल्कि यथासम्भव बचत और अर्थोपार्जन भी किया जा सकता है। प्रकृति के साथ जीने में ही मानव को सच्चा सुख और शान्ति मिल सकते हैं।