28 Mar 2007

एल॰सी॰डी॰ कम्प्यूटर मॉनिटरों से भारी बचत

कम्प्यूटर के एल॰सी॰डी॰ मॉनिटरों से भारी बचत होती है, भले ही इनका मूल्य थोड़ा ज्यादा क्यों न लगे।





पर्सनल कम्प्यूटरों का प्रचलन आरम्भ होने के समय से इनके साथ सी.आर.टी. (CRT = Cathode Ray Tube) वाले मॉनिटरों का उपयोग होता था। इस क्षेत्र में तीव्र प्रगति होने से इनकी रिजोल्यूशन क्षमता 32 बिन्दु प्रति इंच (DPI) से बढ़कर आज 108 (DPI) तक पहुँच गई। किन्तु आजकल नए समतल दृश्यपटल वाले एल.सी.डी (LCD = Liquid Crystal Display) मॉनिटरों को उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। इनकी रिजोल्यूशन क्षमता 200 डीपीआई से भी अधिक हो गई है जिससे अत्यन्त सूक्ष्म दृश्य को भी साफ देखा जा सकता है।

आसानी से उठाकर ले जाने की सुविधा के लिए हल्के तथा कम स्थान घेरने तथा अत्यल्प विद्युत खपत आदि गुणों के कारण सर्वप्रथम एल.सी.डी मॉनिटरों का उपयोग लैपटॉप व नोटबुक कम्प्यूटरों में हुआ। इसके पश्चात आज डेस्कटॉप कम्प्यूटरों में भी उनका उपयोग धड़ल्ले से होने लगा है।

एल.सी.डी. मॉनिटरों का बाजार मूल्य अभी पुराने सी.आर.टी. मॉनिटरों की तुलना में लगभग दुगुने से भी अधिक है, किन्तु निकट भविष्य में उपभोक्ताओं की मांग में वृद्धि के मद्देनजर इनका मूल्य और सस्ता होने की उम्मीद है। फिर भी वर्तमान इन्फोसिस, सत्यम, आईबीएम, विप्रो, डीएसएल आदि सूचना प्रौद्योगिकी कम्पनियों ने अपने कार्यालयों के डेस्टकॉप कम्प्यूटरों के साथ पुराने सी.आर.टी. मॉनिटरों को बदलकर एल.सी.डी. मॉनिटरों की ही स्थापना की है। क्योंकि आरम्भिक लागत अधिक होने के बावजूद समग्र हिसाब लगाने से एल.सी.डी. मॉनिटरों से काफी बचत तथा लाभ स्पष्ट हुए हैं, जिनमें से प्रमुख निम्नवत् हैं :

कम स्थान घेरना : सी.आर.टी. मॉनिटर 3 से 4 वर्गफुट का स्थान घेरते हैं तो एल.सी.डी. मॉनिटर के लिए मात्र 2 से 4 ईंच चौड़ाई का स्थान पर्याप्त है।

स्पष्ट पाठ व चित्र : इनका रिजोल्यूशन अधिक होने के कारण अत्यन्त छोटे अक्षर, चित्र, ग्राफ और अभियान्त्रिकी डिजाइन आदि स्पष्ट देखे जा सकते हैं।

स्वास्थ्य सुरक्षा : सी.आर.टी. मॉनिटरों से विद्युत-चुम्बकीय लहरें एवं इलेक्टॉनिक विकिरण (radiation) उत्सर्जित होते हैं, जिनका मानव-स्वास्थ्य पर अत्यन्त बुरा असर पड़ता है। कम्प्यूटर पर अधिक समय काम करनेवालों की आँखों की दृश्यशक्ति जल्द खराब हो जाती हैं, उन्हें विशेष चश्मे लगाने पड़ते हैं। उनकी अन्य ज्ञानेन्द्रियों पर कुप्रभाव से वे सिरदर्द, तनाव, उच्च-रक्तचाप, स्नायुओं में दर्द व कम्पन, अपच, मस्तिष्क-तंत्रिका शोध आदि के चिर-रोगी बन भी बन सकते हैं। इनकी तुलना में एल.सी.डी. मॉनिटरों से विकिरण नगण्य होते हैं और स्वास्थ्य हानि का खतरा नहीं रहता। एक अनुमान के अनुसार इन विकिरणों के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव से चिकित्सा खर्च लगभग 20 प्रतिशत बढ़ सकता है।

समतल दृश्यपटल : समतल पटल होने के कारण एल.सी.डी. मॉनिटर पर पाठ व चित्र ऐसे प्रकट होते हैं, जैसे सामने खुली पुस्तक में दिखते हैं।

वातानुकूल व्यय कम : सी.आर.टी. मॉनिटर 40 से 90 डिग्री सेंटीग्रेड ताप भी वातावरण में उत्सर्जित करते हैं, जिसके शीतलीकरण हेतु प्रति 7 से 8 कार्यघण्टों के दौरान वातानुकूलन की बाबत लगभग 6 किलोवाट अर्थात् 6 यूनिट बिजली अधिक खर्च होती है। साथ ही वातानुकूलन यन्त्रों से पैदा होनेवाले ग्रीनहाउस प्रभाव तथा हानिकर गैस से वातारवरण को नुकसान का खतरा भी कम होगा। विद्युत उत्पादन हेतु होनेवाले प्राकृतिक संसाधनों की हानि ताथा प्रदूषण फैलने के खतरों से भी बचत होगी।

विद्युत खपत में बचत : विभिन्न मॉडलों के अनुसार एल.सी.डी. मॉनिटरों में मात्र 18 से 25 वाट ही विद्युत खपत होती है जबकि सी.आर.टी. मॉनिटर हेतु 100 से 160 वाट विद्युत की जरूरत होती है, अर्थात लगभग 7-8 गुना अधिक विद्युत खपत होती है। इस प्रकार एल.सी.डी. मॉनिटरों के प्रयोग से 7-8 कार्यघण्टों के दौरान विद्युत खपत की बाबत लगभग 4.00 रु. की बचत हो सकती है।

अनुरक्षण व्यय में कमी : भारत जैसे ग्रीष्म प्रधान देश के परिवेश में सी.आर.टी. मॉनिटर अक्सर अधिक खराब होते पाए गए हैं। किसी की पिक्चर ट्यूब जल जाती है तो किसी का ई.एच.टी. यूनिट खराब हो जाता है। किसी की स्क्रीन का फोस्फोरस खराब हो जाता है। इनकी मरम्मत व पुर्जों के बदलने में भारी लागत आती है। इनकी तुलना में एल.सी.डी. मॉनिटरों के अनुरक्षण की लागत कम आती है। क्योंकि कम वोल्टेज उपयोग के कारण ये अधिक टिकाऊ होते हैं।

हालांकि नई तकनीकी होने के कारण भारत के सामान्य नगरों में एल.सी.डी. मॉनिटरों की मरम्मत हेतु अच्छे सर्विस सेंटरों का अभाव है, और अभी सिर्फ पुर्जों को बदला जा सकता है। किन्तु तेजी से बढ़ती मांग से शीघ्र ही हर स्थान पर सेवा उपलब्ध होगी।

आजकल बाजार में कई बड़े शो-रूम्स में, दुकानों में, घरों में एल.सी.डी. टीवी भी लगे हुए देखने को मिलते हैं, जो दीवारों में कैलेण्डर की तरह टंगे होते हैं। लागत अधिक होने के बावजूद इनके कुल कार्यकाल में होनेवाले प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष खर्च का हिसाब करने पर एल.सी.डी. उपकरण अधिक सस्ते बैठते हैं। एक सामान्य कार्यालय का अनुमान निम्न तालिका में दिया गया है :-

(ब्लॉगर में फिलहाल तालिका (table) प्रविष्टि की सुविधा नहीं होने के कारण यह plain text में बदल गया है)

मद सी.आर.टी.उपकरण मद एल.सी.डी. उपकरण
प्रति एकक विद्युत खपत प्रति एकक विद्युत खपत 150 वाट x 8 घण्टे = 1.2 कि.वा. 20 वाट x 8 घण्टे = 0.16 कि.वा. x रु.3.20 प्रति यूनिट की दर से रु. 3.84 x रु.3.20 प्रति यूनिट की दर से रु. 0.51


वातानुकूलन (A.C.) हेतु विद्युत खपत वातानुकूलन (A.C.) हेतु विद्युत खपत 60 डिग्री सेंटीग्रेड सृजित ताप x 8 घण्टे 5 डिग्री सेंटीग्रेड सृजित ताप x 8 घण्टे1 कि.वा.घं./यूनिट=13 डिग्री शीतलीकरण 1 कि.वा.घं./यूनिट=13 डिग्री शीतलीकरण60-30=30/13xरु.3.20 रु.7.38 5-3=2/13xरु.3.20 रु. 0.49

कुल विद्युत व्यय रु. 8.22 कुल विद्युत व्यय रु. 1.00

विद्युत व्यय अन्तर (प्रति दिन) रु. 7.22 x 5 वर्ष x 290 कार्यदिवस प्रतिवर्ष हेतु रु.10,469.00

वर्तमान बाजार मूल्य (14") रु. 7,200.00 वर्तमान बाजार मूल्य (14") रु. 14,500.00

दोनों का अन्तर रु. 7,300.00

कुल बचत(5 वर्ष में) रु.10,469 - रु. 7,300 = रु. 3,160.00

अप्रत्यक्ष स्वास्थ्य व पर्यावरण सुरक्षा हेतु प्रतिदिन रु.1.00 x 290 दिन/प्रतिवर्षx 5 वर्ष=रु.1450 जोड़ने पर रु. 4,610.00

स्थान किराया रु.10 प्रति माह/वर्गफुट x 2 फुट (अधिक स्थान का अन्तर) x 60 महीने=रु.1200 जोड़ने पर रु. 5,810.00

उपरोक्त अनुमान के अनुसार यदि किसी बड़े कार्यालय में प्रयुक्त लगभग 250 कम्प्यूटरों के सी.आर.टी मॉनिटरों के बदले एल.सी.डी मॉनिटर लगाने पर होनेवाली बचत का हिसाब लगाएँ तो यह राशि रु.14,52,500 और लगभग 1000 कम्प्यटरों का उपयोग करनेवाले कार्यालय के लिए लगभग 50 लाख रुपये हो सकती है। और फिर स्वास्थ्य, विशेषकर आँखों की सुरक्षा का हिसाब लगाएँ तो बचत का हिसाब अनगिनत रुपये के लाभ में प्रदर्शित होगा।

(अक्षर-2004 में प्रकाशित)

24 Mar 2007

इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड ले-आऊट की समस्याएँ

CDAC,Pune के द्वारा भारतीय भाषाओं के कम्प्यूटर में इनपुट के लिए विकसित इन्स्क्रिप्ट(Inscript) की-बोर्ड की सबसे बड़ी खूबी है कि इसमें किसी भी भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटर में इनपुट किया जा सकता है। सभी के लिए एक ही लेआउट है।

लेकिन इसकी सबसे बड़ी खराबियाँ निम्नवत् है:-

(1) मात्राओं को अलग से याद एवं टाइप करना पड़ता है। (जबकि भारतीय भाषाएँ मूल रूप में अंग्रेजी से भी अधिक सरल, सपाट और सीधी हैं। सिर्फ मूल व्यंजन+स्वर+अनुनासिकादि क्रम से समस्त अक्षर और संयुक्ताक्षर स्वयंचालित रूप से प्रकट हो सकते हैं।)

इस प्रकार कुल 16 कुँजिया अनावश्यक रूप से अधिक याद रखनी पड़ती है। जबकि इनकी कोई आवश्यकता ही नहीं है। इन 16 कुँजियों की जगह बहुधा उपयोग के चिह्न या अन्य वर्णों के लिए प्रयोग हो सकता था।

(2) ट, ठ, ड, ढ, नुक्ता, ऑ, य आदि अक्षर दाहिनी ओर कोने में होने के कारण छोटी उंगली से टाइप करना कठिन होता है और बारम्बार त्रुटियाँ होती हैं।

(3) देवनागरी में बहुधा प्रयोग में आनेवाले चिह्नों (punctuation marks = : ; ' " / ? ! आदि) के लिए भी बारम्बार "भाषा/लिपि toggle कुंजी" को दबाकर अंग्रेजी ले-आऊट में अनावश्य रूप से लौटना पड़ता है।

(4) हलन्त का बारम्बार अनावश्यक रूप से प्रयोग करना पड़ता है। उलटा क्रम चलता है। आधे अक्षर के लिए दो कुंजियाँ दबानी पड़ती है, जबकि पूरे अक्षर के लिए सिर्फ एक। जिससे ध्वन्यात्मक इनपुट में भारी बाधा आती है। इस दृष्टि से इन्स्क्रिप्ट को ध्वन्यात्मक आधार पर निर्धारित होना गलत सिद्ध करता है।

(5) यह उच्च गति से टंकण/इनपुट क्षमता प्रदान नहीं कर पाता। गलतियों की सम्भावनाएँ अधिक रहती हैं, विशेषकर दाहिने छोर पर स्थित कुँजियों से बननेवाले शब्दों में।

(6) व्यंजनों को दाहिनी ओर और तथा स्वरों को बाईं ओर उलटे क्रम में रखा गया है। जबकि व्यंजन के बाद ही स्वर लगता है। देवनागरी तथा भारतीय भाषाएँ मुख्यत: बायें से दायें क्रम में लिखी जाती हैं, न कि अरबी-फारसी की तरह दायें से बायें क्रम में। अतः व्यंजनों को बाईं ओर तथा स्वरों को दाहिनी ओर होना चाहिए था।

मेरे विचार में हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं के लिए सर्वश्रेष्ठ IME की अवधारणा 1984-85 में Former-NCST, Mumbai, (वर्तमान CDACMumbai) द्वारा विकसित 'विविधा' नामक सॉफ्टवेयर में प्रयोग की गई थी, जिसकी भारत सरकार के "इलेक्ट्रॉनिक कोर्पोरेशन ऑफ इण्डिया" द्वारा मार्केटिंग की जाती थी और जो सिर्फ 300 रुपये में बेचा जाता था। किन्तु यह DOS में चलता था, और Windows की लोकप्रियता तथा त्रुटिपूर्ण ISCII-1991 के मानकीकरण बाद यह अधिक प्रयोग में नहीं आ सका। आज आवश्यकता है इसको पुनर्जीवित करने की।

(7) इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड में हिन्दी के अक्षर-विन्यास को अलग से तथा अंग्रेजी के अक्षर-विन्यास को अलग से याद करके टंकण अभ्यास की जरूरत होती है, जिससे दिमाग पर दोगुना बोझ पड़ता है।

(8) इन्सक्रिप्ट की-बोर्ड से और भी तेज गति से तथा गलती-रहित इनपुट किया जा सकेगा, यदि इसके लेआऊट में संशोधन किया जाए भारतीय भाषाओं की पूर्ण ध्यन्यात्मकता को ध्यान को रखते हुए। अतः आवश्यकता है इसमें और सुधार करने की।

27 Feb 2007

जवाब : टैग-वार्ता के

ईपण्डित जी ने अपने चिट्ठे पर मुझे टैग कर पाँच यक्ष-प्रश्न पूछे हैं, जिनका सरल, सपाट, जवाब देने का प्रयास कर रहा हूँ।

१. कम्प्यूटर पर हिन्दी टाइपिंग के बारे में सबसे पहले आपने कब सुना और कैसे, अपने कम्प्यूटर में हिन्दी में सबसे पहले किस सॉफ्टवेयर में/द्वारा टाइप किया और कब, आपको उसके बारे में पता कैसे चला ?

उत्तर : सर्वप्रथम 1986 में Apple Machintos कम्प्यूर में हिन्दी डी.टी.पी. में सहयोग करना पड़ा था। 1990 में। जब हमारे कार्यालय में पी.सी. (XT), स्थापित हुए, उस काल में रैम सिर्फ 640K, हार्ड डिस्क सिर्फ 20 MB की आती थी। इस सीमित रिसोर्सेस में जटिल भारतीय भाषाओं/लिपियों का संसाधन सम्भव न था। अतः कानपुर आई.आई.टी. तथा सी-डैक द्वारा विशेष हार्डवेयर (GIST) कार्ड विकसित किया गया था, जिसके रोम-चिप्स में भारतीय भाषाओं के फोंट्स तथा प्रोग्रामों को सज्जित किया गया था। 1986 में भारत सरकार द्वारा सभी कम्प्यूटर प्रणालियाँ द्विभाषी (हिन्दी-अंग्रेजी) ही लगाने के आदेश जारी हो चुके थे। जिसके अनुपालन में 1991 में एक कम्प्यूटर में सी-डैक का हार्डवेयर GIST कार्ड लगाया गया था, जो डैटाबेस को PC-ISCII कूटों में तथा भारतीय भाषाओं के पाठ (Text) ISCII-1991 कूटों में संसाधित करता था।

इस पर सिर्फ INSCRIPT कुँजीपटल में ही काम हो पाता था। पहले से हिन्दी टाइपराइटर में अच्छी गति से टाइप का अभ्यस्त होने के कारण अत्यन्त कष्टकर अनुभव हुआ। हिन्दी टाइपराइटर कुञ्जीपटल को भूलने में काफी परिश्रम करना पड़ा। लगभग दो वर्ष लग गए।

२. आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में आगमन कैसे हुआ, इसके बारे में कैसे पता लगा, पहला हिन्दी चिट्ठा/पोस्ट कौन सा पढ़ा/पढ़ी ? अपना चिट्ठा शुरु करने की कैसे सूझी ?

उत्तर : हिन्दी चिट्ठे पिछले दो वर्षों से देखता/पढ़ता आया था। पहला चिट्ठा किसे कहूँ... किसे नहीं... याद नहीं कर पाता। लेखन का नशा तो बचपन से था। पत्र-पत्रिकाओं प्रकाशित कुछ शोध लेखों की प्रतियों की भारी मांग होती थी। अतः प्रतियाँ भेजने के झण्झट से बचने के लिए अपने कुछ उपयोगी लेख किसी वेबसाइट पर डालने की सोची। पहले याहू के जियोसिटिज में प्रयास किया, किन्तु सफलता न मिली, याहू में हिन्दी ई-मेल के बिगड़ने तथा बारम्बार view->encoding->Unicode/utf8 पर क्लिक करने से से तंग आकर जब जी-मेल में खाता खोला अनुनाद जी के निमन्त्रण पर तो अपना ब्लॉग बनाने का खुल-जा सिम-सिम हुआ। इसके पहले 'हिन्दी देवलोक' नाम ब्लॉग बनाया था old blogger से, id खो जाने के कारण फिर पहुँच नहीं पाया।


३. चिट्ठा लिखना सिर्फ छपास पीडा शांत करना है क्या ? आप अपने सुख के लिये लिखते हैं कि दूसरों के (दुख के लिये ;-) क्या इससे आप के व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन या निखार आया ? टिप्पणी का आपके जीवन में क्या और कितना महत्त्व है?

उत्तर : जिन्दगी में कुछ ठोकरें खाने के तो कुछ गाय की पूँछ पकड़कर आराम से लक्ष्य पर पहुँचने के जो अनुभव हुए हैं, उन्हें दूसरों को बाँट देना चाहता हूँ, ताकि दूसरे लोगों को वैसी ठोकरें न खानी पड़े और वे भी लक्ष्य तक आराम से पहुँच सकें।

टिप्पणियाँ ब्लाग में वैसी ही लगती हैं = जैसे कवि-सम्मलेन में आपकी कविता सुनकर स्रोताओं की तालियाँ

४. अपने जीवन की कोई उल्लेखनीय, खुशनुमा या धमाकेदार घटना(एं) बताएं, यदि न सूझे तो बचपन की कोई खास बात जो याद हो बता दें।

एक बार एक पहाड़ी पर एक पूर्णिमा की शाम को एक और सूर्यास्त हो रहा था, दूसरी ओर चन्द्रोदय। योग और ध्यान में मग्न था कुछ बन्धुओं के साथ... कुछ मिनटों तक सूर्य और चन्द्रमा दोनों ही बिल्कुल एक समान, एक जैसे दिखाई दिए... दिशाभ्रम-सा हो गया... अन्तर ही नहीं कर पाया कोई कि कौन-सा चाँद है और कौन-सा सूरज? दोनों की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से मन-मस्तिष्क के तरल-तन्त्रिका-तत्वों के सरिता-सागर में इतना बड़ा, इतना विशाल ज्वार आया..., आनन्दातिरेक छाया..., मन मस्ताया..., कुण्डलिनी जाग उठी.... सह्स्र-दल-कमल खिलने लगा... ... ...

बस... शब्दों में कैसे?... आप स्वयं अनुभव की परिकल्पना कर सकते हैं...

५. यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे?

उत्तर : हिन्दी समग्र विश्व-ब्रह्माण्ड की मौलिक भाषा हो..., समस्त कम्प्टूर प्रोग्रामिंग सिर्फ हिन्दी में हो.


अब मेरे कुछ प्रश्न हैं जिनका उत्तर अपेक्षित है सभी हिन्दी के विद्वानों से-- (अभी हिन्दी ब्लागिंग गुरुओं से सम्पर्क स्थापित कर रहा हूँ, जिन्हें टैग बाद में करूँगा।)

1. हिन्दी(देवनागरी) में कुल कितने अक्षर हैं? (सन्दर्भ: इस परिचर्चा में देखें।)

2. देवनागरी संगणन की दृष्टि के जटिल complex script में क्यों रखी गई हैं?

3. हिन्दी(देवनागरी) को अंग्रेजी से भी सरल बनाने के लिए क्या सुझाव देना चाहेंगे आप?

4. आपका सपने में किसे देखना पसन्द करेंगे?

5. अंग्रेजों ने भारतीय जनता पर अंग्रेजी थोपने के पहले क्या किया था?

24 Feb 2007

कम्प्यूटर स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग? - व्यंग्य

कार्यालय में नया कम्प्यूटर आया तो अनुभाग प्रमुख श्री दिनेश अग्रवाल को अंग्रेजी स्टेनो सुश्री डी॰ शान्ता ने आकर सूचना दी--

शान्ता: "सर! नई कम्प्यूटर आई है"।

दिनेश : "नया कम्प्यूटर आया है" बोलो, "आई है" नहीं।

शान्ता: "क्यों? इसमें क्या गलती है?"

दिनेश: "कम्प्यूटर" पुल्लिंग है, इसलिए आया है कहा जाएगा।"

शान्ता: "नहीं जी, यह तो एक मशीन है, इसलिए कम्प्यूटर स्त्रीलिंग होगी, "मशीन चलती है" कहते हैं, चलता है नहीं।"

दोनों आपस में झगड़ने लगे। दोनों के झगड़े का कोई भी तर्कपूर्ण समाधान नहीं कर पाया। कार्यालय प्रमुख के बाद यह बात मंत्रालय, और अन्ततः मन्त्री महोदय श्रीमान लालू जी के पास पहुँची सही निर्णय के लिए।

लालू ने पूछा- : "अच्छा! ई कम्प्यूटर है कहाँ, पहले हमें दिखाओ तो।"

लोग उन्हें टेबल पर रखे कम्प्यूटर के पास ले गए। देखकर लालू जी कहा--

लालू : "अरे! इस पर तो कवर ढँका हुआ है, इसे उतार कर सबलोग खुद ही देख लो ना!"

22 Feb 2007

एड्स से बचाती हैं या बढ़ाती है- डिस्पोजेबल सीरिंज?

संयुक्त राष्ट्र एड्स विरोधी अभियान के हिन्दी जालपृष्ठ पर एड्स से बचने के लिए जीवाणुहीन की गई सूई (injection) का प्रयोग करने की सलाई दी गई है। आजकल तो हरेक डॉक्टर या कम्पाउण्डर जब सूई के माध्यम से दवा को शरीर में प्रवेश कराते हैं, तो प्रयोज्य सूई (डिस्पोजेबल सीरिंज) का ही उपयोग करते हैं, जिसकी नली प्लास्टिक की बनी होती है तथा इसके मुहाने पर पतली सूई जंगरोधी इस्पात (स्टेनलेस स्टील) की बनी होती है। बारम्बार उपयोग की जा सकनेवाली काँच की सींरिज अब पुराने जमाने की बात हो गई है। किसी पुराने ग्रामीण अस्पताल में ही शायद देखने को मिले।

इस सूई का दुबारा उपयोग नहीं किया जाता। एक व्यक्ति को लगाने के बाद यह सूई तोड़कर फेंक दी जाती है। इससे किसी एक व्यक्ति के खून में यदि कोई विषाणु हों तो वह दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता। यही इसका लक्ष्य है?

किन्तु प्रश्न उठता है कि क्या यह अपने लक्ष्य में सफल हुई है या असफल? यदि सफल हुई है तो दिनों दिन एड्स आदि महामारियाँ बढ़ती क्यों जा रही है? एड्स से पीड़ित रोगी तो फिर भी कुछ दिन, कुछ माह या कुछ वर्ष तक जी सकता है। किन्तु इससे भी भयंकर और शीघ्र जानलेवा सार्स, चिकनगुनिया, डेंगू आदि बीमारियाँ भी दिनोंदिन क्यों फैलती जा रही हैं?

वास्तविकता क्या है?

प्रत्यक्ष रूप से देखें तो कूड़ेदान में फेंक दी गई इन (use and throw) सीरिंज को पूरी तरह नष्ट नहीं किया जा सकता। वैसे भी विज्ञान के नियम के अनुसार कोई वस्तु कभी नष्ट नहीं होती, सिर्फ उसका रूप ही परिवर्तित होता है।

इन सीरिंजों का भी पुनःचक्रण(recycling) हो जाता है। कूड़ेदान से नगरपालिका के कचरे के डिब्बे में और वहाँ से बड़े-बड़े कूड़े के भण्डारों में फेंक दिया जाता है। किसी कूड़ेखाने के पास दिखाई देता है कि कचरे में से वस्तुएँ चुन-चुन कर उठानेवाले गरीब लोगों की भीड़ लगी रहती है। जो प्लास्टिक तथा अन्य वस्तुएँ चुनकर कबाड़ियों को बेचकर कुछ रोजी-रोटी कमा लेते हैं।

कबाड़ियों के भण्डार से प्लास्टिक, लोहा, काँच, कागज आदि वस्तुएँ विभिन्न कारखानों में पहुँच जाती है, जहाँ उनका पुनःचक्रण (re-cycling) किया जाता है। लोहा आदि धातुओं को तो फिर से उच्च ताप (लगभग 200 से 600 डिग्री सेंटीग्रेड) पिघलाकर पुनरुपयोग किया जाता है। जिससे इनमें विषाणु के रहने के मौके नगण्य ही होते हैं।

लेकिन प्लास्टिक-कूड़े को अल्प ताप (लगभग 45 डिग्री से 75 डिग्री सेंटीग्रेड तक) में ही पिघलाकर पुनरुपयोगी बनाया जाता है। जिसमें विषाणुओं के रहने का खतरा भरपूर रहता है। क्योंकि इससे अधिक ताप पर प्लास्टिक जल जाता है। जलकर प्लास्टिक भयंकर विषैली गैसों में बदलता है, जो वातावरण के लिए अत्यन्त हानिकारक होती हैं।

प्लास्टिक-कचरा तो बहुत ही टिकाऊ वस्तु है। प्लास्टिक बहुकाल तक नष्ट नहीं होती है और शहरों-गाँवों-पर्यटन स्थलों यहाँ तक की हिमालय में भी यत्र-तत्र-सर्वत्र प्लास्टिक-कचरा फैला पाया जाता है। प्लास्टिक का पुनरुपयोग (recycling) ही इससे निपटने का एकमात्र उपाय है।

अल्प ताप पर पिघलाकर रिसाइकल किया हुआ प्लास्टिक विषाणुओं से कदापि मुक्त नहीं हो पाता। प्लास्टिक के धारकों में खाद्य पदार्थ तो आम बात है, प्लास्टिक से निर्मित थैलियों, बर्तनों, कंटेनरों, बोतलों में औषधियाँ तक पैकिंग करके आपूर्ति की जाती है, यहाँ तक कि खून की बोतलें/पाउच भी प्लास्टिक के बने होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा जारी नियमों के अनुसार यह प्लास्टिक मेडिकली रूप से जीवाणुरहित किया गया आई॰एस॰ओ॰/आई॰एस॰आई॰ छाप का होने का दावा किया जाता है। किन्तु चूक हर कहीं होती है। अनेक मामलों में अधिकांश आपूर्तकों द्वारा इनमें प्रयोग किया जानेवाला प्लास्टिक भी पुनःचक्रित (recycled) प्लास्टिक होता है।

हाल ही में एड्स की रोकथाम के सम्बन्ध में आयोजित एक सम्मेलन में यह प्रश्न उठाया गया था। बुद्धिजीवियों ने हरेक खाद्य पदार्थ, औषधि या चिकित्सकीय कल-पुर्जों में प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगाने मांग की।

प्लास्टिक के उपयोग का हर कहीं विरोध हो रहा है। किन्तु यही एकमात्र सस्ता और सुलभ साधन है- मुख्यतः पैकिंग आदि का। अतः इसके उपयोग को बन्द करना सम्भव नहीं हो पा रहा है। इसके कुछ विकल्प आविष्कृत तो हुए हैं, किन्तु व्यावसायिक रूप से सम्भाव्य और सफल नहीं हो पाए हैं।

अतः यहाँ इस सन्दर्भ में विशेषकर डिस्पोजेबल इंजेक्शन सीरिंज में प्लास्टिक के उपयोग को वर्जित किया जाना नितान्त आवश्यक है। इसके विकल्पों पर अनेक चर्चाएँ चलीं।

इस सम्बन्ध में कुछ ठोस तथ्य निम्नवत् हैं--

आजकल आधुनिक सभ्यता के अनुयायी शिक्षित नागरिकों में देखा जाता है कि वे अपने बच्चों के नाक या कान में छेद करवाने डॉक्टरों के पास ले जाते हैं, जो मेडिकली सुव्यवस्थित तरीके से जीवाणु रहित सूई से नाक-कान में छेद करते हैं और प्रोलीन का तार बाँध देते हैं, जो एण्टीसेप्टिक होता है। फिर भी देखा जाता है कि इसे निकालने के कुछ दिन बात नाक-कान के छिद्र में संदूषण (infection) हो जाता है या नाक-कान के छिद्र के घाव पक कर काफी तकलीफ पहुँचाते हैं।

दूसरी ओर प्राचीन परम्पराओं का अनुसरण करनेवाले नागरिक अपने बच्चे को सुनार के पास ले जाकर नाक-कान बिँधवाते हैं। सुनार शुद्ध सोने (लगभग 24 कैरेट) का तार अति गर्म करके ठण्डा करता है और उष्म तार की नोंक से नाक-कान में छेद करके उसी तार को मोडकर तत्काल रिंग जैसा बनाकर नाक या कान में पहना देता है। ऐसे छिद्रित किया नाक-कान संदूषित (infected) होकर कभी नहीं पकता, शायद ही इसके अपवाद स्वरूप एकाध उदाहरण सामने आए हों।

विज्ञान-सम्मत विचार है कि सोना(Gold) सर्वोधिक संदूषण-रोधी (anti-septic) धातु है। दूसरा नम्बर चाँदी(Silver) का आता है। तीसरा नम्बर ताम्बे(Copper) का आता है। आजकल भी कई कम्पनियों के महंगे विभिन्न जलशोधन यन्त्रों (water-filters) में चाँदी का उपयोग किया जाता है। राजा-महाराजा सोने-चाँदी के बर्तनों में भोजन करते थे। कई घरों में देखा जाता है कि वे पीने के पानी के घड़ों में तथा जलशोधकों (water-filters) में सोने या चाँदी तथा ताम्बे के चम्मच या छोटे टुकड़े डालकर रखते हैं। ताकि पानी शुद्ध रहे और उसका स्वाद भी अच्छा महसूस हो और शक्तिवर्द्धक खनिज लवण युक्त हो। इसके विपरीत लोहा सर्वाधिक संदूषण-प्रभावी होता है। वास्तु, फेंगसूई, प्राकृतिक चिकित्सा के नियमों के अनुसार आजकल अनेक सम्पन्न लोग ताम्बे के जग में रखा हुआ पानी चाँदी के गिलास से पीते दिखाई देते हैं। स्टेनलेस स्टील भले ही जंगरोधी हो किन्तु संदूषण-रोधी नहीं।

अधुनातम प्रयोगों में प्लाटिनम् धातु को सर्वाधिक महंगा, मजबूत, टिकाऊ और संदूषण-रोधी माना जाता है। दाढ़ी व बाल काटनेवाली महंगी ब्लेड प्लाटिनम के लेप-युक्त (platinum coated) आती हैं। जो सामान्य ब्लेड की तुलना में अनेक दिनों तक प्रयोग की जा सकती है।

अतः हमारा विनम्र विचार है कि चिकित्सा के क्षेत्र में प्रयोग की जानेवाली सूई (injection syringe) प्लाटिनम् लेपयुक्त शुद्ध सोने (24 कैरेट) की तथा इसकी नली शुद्ध चाँदी की होनी चाहिए, ताकि प्राकृतिक रूप से संदूषण-रोधी हो। सामान्य आग में इसे सामान्य गर्म करके या विभिन्न एण्टी-सेप्टिक औषधियों/रसायनों (chemicals) से धोकर जिसे पूर्ण शुद्ध बनाकर फिर से उपयोग किया जा सके। वैसे भी कोई सोने-चाँदी को कदापि फेंकेगा तो नहीं।

डिस्पोजेबल, प्रयोग करो और फेंको (use and throw) के विचार को जड़ से ही मिटाना आवश्यक है, हर ऐसी वस्तु चाहे वह लिखनेवाली पेन, डॉन पेन की रिफिल्ल ही क्यों न हो। क्योंकि ये हमारी प्यारी पृथ्वी पर सिर्फ कूड़े-करकट के ढेर ही बढ़ाती हैं।

समस्त बुद्धिजीवियों, चिकित्सकों, विश्व स्वास्थ्य संगठन और सभी सम्बन्धित महानुभावों का ध्यानाकर्षण करते हुए अनुरोध है कि यदि संसार भर में बढ़ते जा रहे रोगों को वास्तव में रोकना चाहते हैं तो प्लास्टिक की बनी डिस्पोजेबल सीरिंजों के उपयोग पर तत्काल प्रतिबन्ध लगाया जाए, तथा शुद्ध सोने-चाँदी से निर्मित इंजेक्शन सीरिंज को प्रचलित करने की व्यावहारिकता, व्यावसायिक सम्भाव्यता और कार्यकारिता की ओर खुले दिमाग से विचार करके निर्णय लेकर यथाशीघ्र आदेश जारी किए जाएँ।